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सर्वकोश
मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Mundaka Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished134 पृष्ठ

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पृष्ठ 106
९६मुण्डकोपनिषद्[ मुण्डक ३
शाठ्याहंकारदम्भानृतवर्जिता ह्याप्तकामा विगततृष्णाः सर्वतो यत्र यस्मिंस्तत्परमार्थतत्त्वं सत्यस्योत्तमसाधनस्य सम्बन्धि साध्यं परमं प्रकृष्टं निधानं पुरुषार्थरूपेण निधीयत इति निधानं वर्तते । तत्र च येन पथाक्रमन्ति स सत्येन वितत इति पूर्वेण सम्बन्धः ॥ ६ ॥रहित तथा सब ओरसे पूर्णकाम और तृणारहित ऋषिगण—[अतीन्द्रिय वस्तुको] देखनेवाले पुरुष [उस पदपर] आरूढ होते हैं, जिसमें कि सत्यसंज्ञक उत्कृष्ट साधनका सम्बन्धी उसका साध्यरूप परमार्थतत्त्व जो पुरुषार्थरूपसे निहित होनेके कारण निधान है वह परम यानी प्रकृष्ट निधान वर्तमान है । 'उस पदमें जिस मार्गसे आरूढ होते हैं वह सत्यसे ही विस्तीर्ण हो रहा है'—इस प्रकार इसका पूर्व-वाक्यसे सम्बन्ध है ॥ ६ ॥

परमपदका स्वरूप

किं तत्किन्धर्मकं च तदित्युच्यते—वह क्या है और किन धर्मोंवाला है ? इसपर कहा जाता है—

बृहच्च तद्दिव्यमचिन्त्यरूपं

सूक्ष्माच्च तत्सूक्ष्मतरं विभाति ।

दूरात्सुदूरे तदिहान्तिके च

पश्यत्स्विहैव निहितं गुहायाम् ॥ ७ ॥

वह महान् दिव्य और अचिन्त्यरूप है । वह सूक्ष्मसे भी सूक्ष्मतर भासमान होता है तथा दूरसे भी दूर और इस शरीरमें अत्यन्त समीप भी है । वह चेतनावान् प्राणियोंमें इस शरीरके भीतर उनकी बुद्धिरूप गुहामें छिपा हुआ है ॥ ७ ॥