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सर्वकोश
मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Mundaka Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished134 पृष्ठ

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पृष्ठ 105

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९५


येनाक्रमन्त्यृषयो ह्याप्तकामा

यत्र तत्सत्यस्य परमं निधानम् ॥ ६ ॥

सत्य ही जयको प्राप्त होता है, मिथ्या नहीं । सत्यसे देवयान-मार्गका विस्तार होता है, जिसके द्वारा आप्तकाम ऋषिलोग उस पदको प्राप्त होते हैं जहाँ वह सत्यका परम निधान ( भण्डार ) वर्तमान है ॥६॥


मूल भाष्यभाष्यार्थ
सत्यमेव सत्यवानेव जयति नानृतं नानृतवादीत्यर्थः । न हि सत्यानृतयोः केवलयोः पुरुषानाश्रितयोर्जयः पराजयो वा सम्भवति । प्रसिद्धं लोके सत्यवादिनानृतवाद्यभिभूयते न विपर्ययोऽतः सिद्धं सत्यस्य बलवत्साधनत्वम् ।<br><br>किं च शास्त्रतोऽप्यवगम्यते सत्यस्य साधनातिशयत्वम् । कथम् ? सत्येन यथाभूतवादव्यवस्थया पन्था देवयानाख्यो विततो विस्तीर्णः सातत्येन प्रवृत्तः येन यथा ह्याक्रमन्ति क्रमन्त ऋषयो दर्शनवन्तः 'कुहकमाया-सत्य अर्थात् सत्यवान् ही जयको प्राप्त होता है, मिथ्या यानी मिथ्यावादी नहीं । [ यह ‘सत्य’ और ‘अनृत’ का सत्यवान् और मिथ्यावादी अर्थ इसलिये किया गया है कि ] पुरुषका आश्रय न करनेवाले केवल सत्य और मिथ्याका ही जय या पराजय नहीं हो सकता । लोकमें प्रसिद्ध ही है कि सत्यवादीसे मिथ्यावादीको ही नीचा देखना पड़ता है, इसके विपरीत नहीं होता । इससे सत्यका प्रवल साधनत्व सिद्ध होता है ।<br><br>यही नहीं, सत्यका उत्कृष्ट साधनत्व शास्त्रसे भी जाना जाता है । किस प्रकार ? [ सो बंतलाते हैं— ] सत्य अर्थात् यथार्थ वचनकी व्यवस्थासे देवयानसंज्ञक मार्ग विस्तीर्ण यानी नैरन्तर्यसे प्रवृत्त होता है, जिस मार्गसे कपट, छल, शठता, अहङ्कार, दम्भ और अनृतसे