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सर्वकोश
मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary

दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished207 पृष्ठ

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पृष्ठ 72

संक्रान्तिप्रकरण ६३
सूर्यादि के बली रहते कार्य और संक्रान्ति करते हुए
ग्रहों का बल
नृपेक्षणं सर्वकृतिश्च संगरः शास्त्रं विवाहो गमदीक्षणे रवेः ।
वीर्येऽथ ताराबलतः शुभोविधुर्विधोर्बलेऽर्कोऽर्कंबले कुजादयः ॥ १९ ॥
अन्वयः—रवेः (सकाशात्) वीर्ये (क्रमेण) नृपेक्षणं, सर्वकृतिः, संगरः, शास्त्रं,
विवाहः, गमदीक्षणे (शुभे भवतः), ताराबलतः (विधुः) (शुभः), विधोः बलात् रविः
(शुभः), तद्बलतः कुजादयः शुभाः (भवन्ति) ॥ १९ ॥
सूर्य के बली रहते अथवा रविवार को राजा का दर्शन, चन्द्रमा के बली
रहते अथवा सोमवार को सब कार्य, मङ्गल के बली रहते अथवा मङ्गल के
दिन युद्ध, बुध के बली रहते अथवा बुधवार को शास्त्र पढ़ना, बृहस्पति
के बली रहते अथवा बृहस्पति के दिन विवाह करना, शुक्र के बली रहते
अथवा शुक्र के दिन यात्रा करना और शनैश्चर के बली रहते अथवा
शनैश्चर के दिन यज्ञादि की दीक्षा लेना चाहिए । यदि चन्द्रमा की
संक्रान्ति के काल में तारा बली हो तो अशुभ भी चन्द्रमा सवा दो दिन
तक शुभदायक होता है । सूर्य की संक्रान्ति के समय यदि चन्द्रमा बली हो
तो अशुभ भी सूर्य एक महीने तक शुभ होता है । मंगल की संक्रान्ति के
काल में यदि सूर्य बली हो तो अशुभ भी मंगल डेढ़ महीने तक शुभ होता
है । ऐसे ही बुधादि को भी जानना चाहिए ॥ १९ ॥
अधिकमास और क्षयमास का निर्णय
स्पष्टार्कसंक्रान्तिविहीन उक्तो मासोऽधिमासः क्षयमासकस्तु ।
द्विसंक्रमस्तत्र विभागयोः स्तस्तिथेर्हि मासौ प्रथमान्त्यसंज्ञौ ॥ २० ॥
इति मुहूर्त्तचिन्तामणौ संक्रान्तिप्रकरणं समाप्तम् ॥ ३ ॥
अन्वयः—स्पष्टार्कसंक्रान्तिविहीनः मासः अधिमासः उक्तः, तु (तथा) द्विसंक्रमः
मासः क्षयमासकः (स्यात्) तत्र तिथेः विभागयोः प्रथमान्त्यसंज्ञौ मासौ स्तः ॥ २० ॥
शुक्लपक्ष की परीवा से लेकर अमावास्या पर्यन्त चान्द्रमास होता है ।
जिस चान्द्रमास में स्पष्ट सूर्यसंक्रान्ति न हो वह मास अधिमास अर्थात्
मलमास कहा जाता है और जिस मास में स्पष्ट सूर्य की दो संक्रान्तियाँ
हों वह क्षयमास कहा जाता है । क्षयमास में तिथि के पूर्वार्द्ध उत्तरार्द्ध भागों
के सम्बन्ध से पहिला और दूसरा मास जानना चाहिए अर्थात् उस एक ही