मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)
Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary
दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८ मुहूर्त्तचिन्तामणि
गिनने से तीन संख्या हुई । इसको दो से गुणा तो छः हुए, यही छठा
मुहूर्त्त कंटक दोष हुआ । ऐसे ही अन्य दिनों से उक्त दिनों तक गणना
करने से कुलिकादि स्पष्ट होंगे । दिन के सोलहवें अंश को मुहूर्त्त कहते हैं ।
कुलिक मुहूर्त्त में शुभ कर्म करने से सर्वथा नाश, यमघण्ट में दरिद्रता,
कालवेला में मृत्यु और कंटक में विघ्न होता है । परन्तु ये रात्रि में दूषित
नहीं हैं । यदि अति आवश्यक कार्य हो तो इन दोषों का उत्तरार्द्ध त्यागना
चाहिए ॥ ३७ ॥
कुलिक आदि दुष्टमुहूर्त्तचक्र
| रविवार | सोमवार | मंगल | बुधवार | बृहस्पति | शुक्रवार | शनैश्चर | वार | |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| मुहूर्त्त | १४ | १२ | १० | ८ | ६ | ४ | २ | कुलिक |
| मुहूर्त्त | ८ | ६ | ४ | २ | १४ | १२ | १० | कालवेला |
| मुहूर्त्त | १० | ८ | ६ | ४ | २ | १४ | १२ | यमघण्ट |
| मुहूर्त्त | ६ | ४ | २ | १४ | १२ | १० | ८ | कण्टक |
प्रकारान्तर से वर्जित मुहूर्त्त
सूर्ये षट्स्वरनागदिङ्मनुमिताश्चन्द्रेऽब्धिषट्कुञ्जरां-
कार्का विश्वपुरन्दराः क्षितिसुते द्व्यग्न्यब्धितर्का दिशः ।
सौम्ये द्व्यब्धिगजाङ्कदिङ्मनुमिता जीवे द्विषड्भास्कराः
शक्राख्यास्तिथयः कलाश्च भृगुजे वेदेषु तर्कग्रहाः ॥ ३८ ॥
दिग्भास्करा मनुमिताश्च शनौ शशिद्वि-
नागा दिशो भवदिवाकरसंमिताश्च ।
दुष्टः क्षणः कुलिककण्टककालवेला-
स्युश्चार्धयामयमघण्टगताः कलांशाः ॥ ३९ ॥
**अन्वयः—**सूर्ये षट् स्वरनागदिङ्मनुमिताः, चन्द्रेऽब्धिषट्कुञ्जराङ्कार्का विश्व-
पुरन्दराः, क्षितिसुते द्व्यग्न्यब्धितर्काः दिशः, सौम्ये द्व्यब्धिगजाङ्कदिङ्मनुमिताः, जीवे
द्विषड्भास्कराः, शक्राख्याः, तिथयः कलाः च भृगुजे वेदेषुतर्कग्रहाः दिग्भास्कराः
मनुमिताः च शनौ शशिद्विनागा दिशा भवदिवाकरसंमिता च कलांशाः (मुहूर्ताः) दुष्टः
क्षणः स्यात् कुलिककण्टककालवेलाः स्युः । अर्धयामयमघण्टगताः स्युः ॥ ३८-३९ ॥
रविवार को छठा, सातवाँ, आठवाँ, दशवाँ, चौदहवाँ मुहूर्त्त; सोमवार
को चौथा, छठा, आठवाँ, नवाँ, बारहवाँ, तेरहवाँ, चौदहवाँ मुहूर्त्त; मंगल को
दूसरा, तीसरा, चौथा, छठा, दशवाँ मुहूर्त्त; बुधवार को दूसरा, चौथा,