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सर्वकोश
मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary

दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished207 पृष्ठ

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पृष्ठ 199

१९० मुहूर्त्तचिन्तामणि
यात्रा में ग्रहों का शुभाशुभफल
केन्द्रे कोणे सौम्यखेटाः शुभास्स्युर्याने पापास्त्र्यायषट्खेषु चन्द्रः ।
नेष्टो लग्नान्त्यारिरन्ध्रे शनिः खेस्ते शुक्रो लग्नेट् नगान्त्यारिरन्ध्रे ॥ ५६ ॥
अन्वयः—केन्द्रे कोणे सौम्यखेटाः, त्र्यायषट्खेषु पापाः याने शुभाः स्युः, लग्ना-
न्त्यारिरन्ध्रे चन्द्रः नेष्टः (स्यात्), खे शनिः नेष्टः, अस्ते शुक्रः नेष्टः, नगान्त्यारिरन्ध्रे
लग्नेट् नेष्टः स्यात् ॥ ५६ ॥
यात्रा में लग्न से पहिले, चौथे, सातवें, दशवें, पाँचवें, नवें इन स्थानों
में स्थित शुभग्रह और तीसरे, छठे, दशवें, गेरहवें इन स्थानों में स्थित
पापग्रह शुभ होते हैं। लग्न, बारहवें, छठे, आठवें, इन स्थानों में स्थित
चन्द्रमा, दशवें स्थान में स्थित शनैश्चर, सातवें स्थान में स्थित शुक्र और
सातवें, बारहवें, छठे, आठवें इन स्थानों में स्थित लग्न का स्वामी अशुभ
होता है ॥ ५६ ॥
यात्रा के अधिकारी
योगात्सिद्धिर्धरणिपतीनामृक्षगुणैरपि भूदेवानाम् ।
चौराणामपि शकुनैरूक्ता भवति मुहूर्त्तादपि मनुजानाम् ॥ ५७ ॥
अन्वयः—धरणिपतीनां योगात्, भूदेवानां ऋक्षगुणैः, अपि चौराणां शुभशकुनैः
सिद्धिः उक्ता, मनुजानां मुहूर्त्तात् अपि सिद्धिः भवति ॥ ५७ ॥
आगे कहे हुए योग-लग्न-बल से राजाओं की, चन्द्र-तारा-बल-सहित
विहित नक्षत्रादि में की हुई यात्रा ब्राह्मणों की, आगे कहे हुए शकुनों से चोरों
की और मुहूर्त्त-बल से अन्य मनुष्यों की यात्रा सिद्धिदायक होती है ॥ ५७ ॥
योगयात्रा
सहजे रविर्दशमे शशी तथा शनिमङ्गलौ रिपुगृहे सितः सुते ।
हिबुके बुधो गुरुरपीह लग्नगः स जयत्यरीन् प्रचलितोऽचिरान्नृपः ॥ ५८ ॥
अन्वयः—रविः सहजे, शशी दशमे, तथा शनिमगलौ रिपुगृहे, सितः सुते, बुधः
हिबुके, गुरुः अपि लग्नगः (यदि स्यात्) इह (अस्मिन् समये यः) नृपः प्रचलितः स
अचिरात् अरीन् जयति ॥ ५८ ॥
यदि लग्न से तीसरे स्थान में शुक्र और दशवें स्थान में चन्द्रमा हो,
छठे स्थान में शनि, मंगल ये दोनों हों, पाँचवें स्थान में शुक्र, चौथे स्थान
में बुध, लग्न में बृहस्पति हो, ऐसे योग में चला हुआ राजा शीघ्र ही अपने
शत्रुओं को जीतता है ॥ ५८ ॥