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सर्वकोश
मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary

दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished207 पृष्ठ

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पृष्ठ 198

यात्राप्रकरण १८९
जीते ॥ ५२ ॥ ऐसे ही हस्त नक्षत्र में अपने घर से चलकर चित्रा, स्वाती
इन दो नक्षत्रों में कहीं टिककर विशाखा नक्षत्र में वहाँ से भी यात्रा करे
और धनिष्ठा, रेवती, पुष्य इन नक्षत्रों में अपने घर से चलकर गाँव की
सीमा पर एक रात्रि टिककर वहाँ से यात्रा करे तो वह राजा शत्रु का राज्य
जीत लेता है ॥ ५३ ॥
समयबल
उषःकालो विना पूर्वा गोधूलिः पश्चिमां विना ।
विनोत्तरां निशीथः सन् याने याम्यां विनाऽभिजित् ॥ ५४ ॥
अन्वयः—पूर्वां विना उषःकालः, पश्चिमां विना गोधूलिः, उत्तरां विना निशीथः याने
[यात्रायां] सन् स्यात्, तथा याम्यां विना अभिजित् (मुहूर्तः) सन् स्यात् ॥ ५४ ॥
पूर्व दिशा को छोड़ अन्य दिशाओं को यात्रा करने के लिए प्रातःकाल,
पश्चिम को छोड़ अन्य दिशाओं को यात्रा करने के लिए गोधूलिकाल, उत्तर
दिशा को छोड़ अन्य दिशाओं को यात्रा करने के लिए आधी रात का समय
और दक्षिण दिशा को छोड़ अन्य दिशाओं को यात्रा करने के लिए अभिजित्
मुहूर्त्त शुभ होता है, अर्थात् प्रातःकाल पूर्व दिशा को, सायंकाल पश्चिम दिशा
को, आधीरात में उत्तर दिशा को, मध्याह्न में दक्षिण दिशा को अभिजित्
मुहूर्त्त में यात्रा न करनी चाहिए ॥ ५४ ॥
लग्नादि बारह भावों के नाम
लग्नाद्भावाः क्रमाद्देह १ कोश २ धानुष्क ३ वाहनम् ४ ।
मन्त्रो ५ ऽरि ६ मार्ग ७ आयुश्च ८
हृत् ९ व्यापारा १० गम ११ व्ययाः १२ ॥ ५५ ॥
अन्वयः—देहकोशधानुष्कवाहनम्, मन्त्रः, अरिः, मार्गः, आयुः च [तथा] हृद्व्या-
पारागमव्ययाः [इमे] क्रमात् लग्नात् भावाः (ज्ञेयाः) ॥ ५५ ॥
लग्नादि क्रम से देह १, कोश २, धानुष्क ३, वाहन ४, मन्त्र ५, अरि ६,
मार्ग ७, आयु ८, हृदय ९, व्यापार १०, आगम ११, व्यय १२ ये बारह
भाव होते हैं, अर्थात् लग्न की देह, दूसरे की कोश, तीसरे की धानुष्क,
चौथे का वाहन, पाँचवें की मन्त्र, छठे की अरि, सातवें की मार्ग, आठवें की
आयु, नवें की हृदय, दशवें की व्यापार, गेरहवें की आगम, बारहवें की व्यय
संज्ञा है ॥ ५५ ॥