मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)
Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary
दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविवाहप्रकरण १५१
मंडप के खम्भ गाड़ने का मुहूर्त्त
सूर्येऽङ्गनासिंहघटेषु शैवे स्तम्भोऽलिकोदण्डमृगेषु वायौ ।
मीनाजकुम्भे निर्ऋतौ विवाहे स्थाप्योऽग्निकोणे वृषयुग्मकर्कै ॥ ९८ ॥
अन्वयः—अंगनासिंहघटेषु (स्थिते) सूर्ये शैवे (ईशानकोणे) अलिकोदण्डमृगेषु
वायौ, मीनाजकुम्भे निर्ऋतौ वृषयुग्मकर्कै अग्निकोणे विवाहे स्तम्भः स्थाप्यः ॥ ६८ ॥
कन्या, सिंह और तुला में सूर्य के स्थित रहते घर के ईशानकोण में;
वृश्चिक, धनु, मकर में स्थित रहते वायव्यकोण में; मीन, कुम्भ, मेष में
स्थित रहते नैर्ऋत्यकोण में और वृष, मिथुन, कर्क में स्थित रहते आग्नेय-
कोण में खम्भ गाड़ना चाहिए ॥ ९८ ॥
स्तम्भचक्र
| सिंह | कन्या | तुला | ईशान |
|---|---|---|---|
| वृश्चिक | धन | मकर | वायव्य |
| कुम्भ | मीन | मेष | नैर्ऋत्य |
| वृष | मिथुन | कर्क | आग्नेय |
गोधूलिप्रशंसा
नास्यामृक्षं न तिथिकरणं नैव लग्नस्य चिन्ता
नो वारो न च लवविधिर्नो मुहूर्त्तस्य चर्चा ।
नो वा योगो न मृतिभवनं नैव जामित्रदोषो
गोधूलिः सा मुनिभिरुदिता सर्वकार्येषु शस्ता ॥ ९९ ॥
अन्वयः—अस्यां (गोधूल्यां) ऋक्षं न (चिन्त्यं) तिथिकरणं न, लग्नस्य चिन्ता नैव,
वा वारः न, च लग्नविधिः न, मुहूर्त्तस्य चर्चा नो, नो वा योगः, मृतिभवनं नैव, जामित्र-
दोषः नैव, (यतः) सा गोधूलिः मुनिभिः सर्वकार्येषु शस्ता उदिता ॥ ६६॥
सम्पूर्ण कार्यों में गोधूलि को मुनियों ने ऐसी शुभ कही है कि इसमें
नक्षत्र, तिथि, करण, वार नवांशविधान, योग, आठवें स्थान की शुद्धि,
जामित्रदोष ये सब विशेष नहीं विचारे जाते । लग्न का भी विशेष विचार
नहीं किया जाता, और मुहूर्त्त का तो कुछ चर्चा ही नहीं है । इस श्लोक का
तात्पर्य यह है कि बहुत से सुयोगों के रहते कोई एक कुयोग भी हो तो
गोधूलि में विवाह शुभ होता है । अथवा अन्य समय के लग्न में सब सुयोग
ही हों और गोधूलि की लग्न में कुछ दोष भी हो तो गोधूलि ही श्रेष्ठ होती