मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)
Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary
दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५० मुहूर्तचिन्तामणि
अशुभ, फिर चार नक्षत्र शुभ, फिर छः नक्षत्र अशुभ, फिर तीन नक्षत्र शुभ,
फिर एक नक्षत्र अशुभ, फिर तीन नक्षत्र शुभ होते हैं। ऐसे ही त्रिपदीचक्र में
भी ये नक्षत्र क्रम से अशुभ और शुभ होते हैं ॥ ९५ ॥
सूर्य के नक्षत्र से अशुभ और शुभ नक्षत्र
| ४ | २ | ३ | १ | १ | ४ | ६ | ३ | १ | ३ |
| अ० | शु० | अ० | शु० | अ० | शु० | अ० | शु० | अ० | शु० |
विवाह से पूर्व होनेवाले कार्यों का मुहूर्त
विधोर्बलमवेक्ष्य वा दलनकण्डनं वारकं
गृहांगणविभूषणान्यथ च वेदिकामण्डपान् ।
विवाहविहितोडुभिर्विरचयेत्तथोद्वाहतो न
पूर्वमिदमाचरेत्त्रिनवषण्मिते वासरे ॥ ९६ ॥
अन्वयः—विधोः बलं अवेक्ष्य विवाहत्रिहितोडुभिः दलनकण्डनं वारकं गृहाङ्गण-
विभूषणानि (कार्याणि) अथ वेदिकामण्डपान् च विरचयेत् तथा उद्वाहतः पूर्वं
त्रिनवषण्मिते वासरे इदं (पूर्वोक्तं कर्म) न आचरेत् ॥ ९६ ॥
विवाह के लिए जो नक्षत्र शुभ कहे गये हैं उन नक्षत्रों में तथा वर-कन्या
के चन्द्रबल को विचारकर विवाह दिन से पूर्व तीसरे, छठे, नवें दिन को
छोड़ अन्य दिनों में, आटा पीसना, दाल दलना, चावल कूटना, कलशस्थापन
करना, घर और आँगन की सफाई करना, वेदी बनाना, मंडप छवाना आदि
कार्य करे ॥ ९६ ॥
वेदी के लक्षण तथा मंडप का उद्वासन
हस्तोच्छ्राया वेदहस्तैः समन्तात्तुल्या वेदी सद्मनो वामभागे ।
युग्मे घस्रे षष्ठहीने च पञ्चसप्ताहे स्यान्मण्डपोद्वासनं सत् ॥ ९७ ॥
अन्वयः—सद्मनः वामभागे हस्तोच्छ्राया समन्तात् वेदहस्तैः तुल्या वेदी (कार्या),
च षष्ठहीने युग्मे घस्रे पञ्चसप्ताहे मण्डपोद्वासनं सत् स्यात् ॥ ९७ ॥
घर के बायें भाग में हाथ भर ऊँची, हाथ भर लम्बी और हाथ भर
चौड़ी वेदी बनाना चाहिए, और विवाह के दिन से छठे दिन को छोड़ सम
दिनों में तथा विषम दिनों में पाँचवें या सातवें दिन मंडप का विसर्जन करना
चाहिए ॥ ९७ ॥