मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)
Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary
दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११० मुहूर्त्तचिन्तामणि
अन्वयः—अश्विन्यम्बुपयोः हयः निगदितः । स्वात्यर्कयोः कासरः, वस्वजपाङ्घ्रयोः
सिंहः समुदितः, याम्यान्त्ययोः कुञ्जरः, देवपुरोहितानलभयोः मेषः, कर्णाम्बुनोः वानरः
स्यात् । तथैव वैश्वाभिजितोः नकुलः, चान्द्राब्जयोन्योः अहिः, ज्येष्ठामैत्रभयोः कुरंगः
उदितः तथा मूलाद्र्योः श्वा, अदितिसार्पयोः मार्जारः । अथ तथैव मघायोन्योः उन्दुरुः,
द्वीशभचित्रयोः व्याघ्रः, अपि च आर्यम्णबुध्न्यर्क्षयोः योनिः गौः (कथिता), पादगयोः
भयोन्त्योः परस्परं महावैरं भवेत् ॥ २५-२६ ॥
अश्विनी और शतभिष घोड़ा योनि, स्वाती और हस्त भैंसा योनि,
धनिष्ठा और पूर्वाभाद्रपद सिंह योनि, भरणी और रेवती हाथी योनि,
पुष्य और कृत्तिका मेढ़ा योनि, श्रवण और पूर्वाषाढ़ वानर योनि, उत्तरा-
षाढ़ और अभिजित् न्योला योनि, मृगशिरा और रोहिणी सर्प योनि,
ज्येष्ठा और अनुराधा हरिण योनि, मूल और आर्द्रा कुक्कुर योनि, पुनर्वसु
और आश्लेषा बिलार योनि, मघा और पूर्वाफाल्गुनी मूस योनि, चित्रा
और विशाखा व्याघ्र योनि, उत्तराफाल्गुनी और उत्तराभाद्रपद गौ योनि
कहे जाते हैं। यहाँ एक श्लोक के एक पाद में कहे हुए चार नक्षत्रों की दो
योनियों का परस्पर महावैर होता है। यथा “अश्विन्यम्बुपयोर्हयो निगदितः
स्वात्यर्कयोः कासरः” इस एक पाद में कहे हुए घोड़ा और भैंसा का परस्पर
वैर होता है। इसलिये वैर योनिवाले वर-कन्या का विवाह उचित नहीं
है। भिन्न-भिन्न पाद में कही हुई योनिवाले वर-कन्या का विवाह करना
चाहिए ॥ २५-२६ ॥
| वैर | वैर | वैर | वैर | वैर | वैर | वैर | |||||||
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| घो० | भैंसा | सिंह | ह० | मे० | वानर | न्यो० | साँ | हरि० | कु० | बिलार | मूस | व्याघ्र | गौ |
| अ० | स्वा० | ध० | भ० | पु० | श्रवण | उ०षा | मृ० | ज्ये० | मू० | पु० | म० | वि० | उ.भा. |
| श० | ह० | पू.भा. | रे० | कृ० | पू०षा | अभि. | रो० | अनु० | आ० | ऽश्लेषा | पूफा | चि० | उ.फा. |
ग्रहमैत्रीकूट
मित्राणि द्युमणेः कुजेज्यशशिनः शुक्रार्कजौ वैरिणौ
सौम्यश्चास्य समो विधोर्बुधरवी मित्रे न चास्य द्विषत् ।
शेषाश्चास्य समाः कुजस्य सुहृदश्चन्द्रज्यसूर्या बुधः
शत्रुः शुक्रशनी समौ च शशभृत्सूनोः सिताहस्करौ ॥ २७ ॥
मित्रे चास्य रिपुः शशी गुरुशनिक्ष्माजाः समा गीष्पते-
र्मित्राण्यर्ककुजेन्दवो बुधसितौ शत्रू , समः सूर्यजः ।