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सर्वकोश
मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary

दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished207 पृष्ठ

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पृष्ठ 117

१०८ मुहूर्तचिन्तामणि
कन्या के जन्म-नक्षत्रों की परस्पर योनिमैत्री रहते चार गुण, वर-कन्या के
जन्मराशीश ग्रहों की परस्पर मित्रता रहते पाँच गुण, वर-कन्या के जन्म-
नक्षत्रों की परस्पर गणमैत्री रहते छः गुण, वर-कन्या की जन्मराशि की
परस्पर शुभ संख्या रहते सात गुण और वर-कन्या के जन्मनक्षत्रों की नाड़ी
भिन्न रहते आठ गुण होते हैं। सब मिलकर छत्तीस गुण जिस वर-कन्या के
हों उनका विवाह बहुत शुभ होता है ॥ २१ ॥
वर्णकूट
द्विजा झषालिकर्कटास्ततो नृपा विशोऽङ्घ्रिजाः ।
वरस्य वर्णतोऽधिका वधूर्न शस्यते बुधैः ॥ २२ ॥
अन्वयः—झषालिकर्कटाः द्विजः (ज्ञेयाः) ततः नृपाः [क्षत्रियाः] ततः विशः
[वैश्याः] ततः अंघ्रिजाः [शूद्राः] । वरस्य वर्णतः अधिका वधूः बुधैः न शस्यते ॥ २२ ॥
मीन, वृश्चिक, कर्क ये तीन राशियाँ ब्राह्मणसंज्ञक; मेष, धनु, सिंह,
ये तीन क्षत्रियसंज्ञक; वृष, मकर, कन्या, ये तीन वैश्यसंज्ञक और मिथुन,
कुम्भ, तुला, ये तीन शूद्रसंज्ञक हैं। इन चारों में पहिले से दूसरा, दूसरे से
तीसरा और तीसरे से चौथा वर्ण नीच है। यदि वर की जन्मराशि के वर्ण
से कन्या की जन्मराशि का वर्ण श्रेष्ठ हो तो उस कन्या के साथ उस वर का
विवाह न करना चाहिए। ब्राह्मणवर्ण कन्या और क्षत्रियादि वर्ण वर हो तो
उनका परस्पर विवाह योग्य नहीं होता ॥ २२ ॥
वर्णबोधक चक्र
| १२ | ४ | ८ | ब्राह्मण |
| १ | ५ | ९ | क्षत्रिय |
| २ | ६ | १० | वैश्य |
| ३ | ७ | ११ | शूद्र |
वश्यकूट
हित्वा मृगेन्द्रं नरराशिवश्याः सर्वे तथैषां जलजास्तु भक्ष्याः ।
सर्वेऽपि सिंहस्य वशे विनालिं ज्ञेयं नराणां व्यवहारतोऽन्यत् ॥ २३ ॥
अन्वयः—मृगेन्द्रं हित्वा सर्वे नरराशिवश्याः तथा एषां [नरराशीनां] जलजाः