मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)
Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary
दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविवाहप्रकरण १०३
प्रश्नमुहूर्त्त में जैसी सन्तान लिये हुई कोई स्त्री या कन्या ज्योतिषी के
समीप अपनी इच्छा से आ जाय वैसी ही प्रथम सन्तान उस कन्या के
होती है जिसके विवाह का प्रश्न हो। कन्या लेकर आवे तो कन्या और पुत्र
लेकर आवे तो पुत्र होता है ॥ ८ ॥
प्रश्नकाल में साधारण शुभाशुभ निमित्त
शङ्खभेरीविपञ्चीरवैर्मङ्गलं जायते वैपरीत्यं तदा लक्षयेत् ।
वायसो वा खरः श्वा शृगालोऽपि वा प्रश्नलग्नक्षणे रौति नादं यदि ॥ ९ ॥
अन्वयः—प्रश्नलग्नक्षणे शंखभेरीविपञ्चीरवैः मङ्गलं जायते । वायसः वा खरः श्वा
शृगालः अपि यदि रौति वा नादं करोति तदा वैपरीत्यं लक्षयेत् ॥ ६ ॥
यदि प्रश्नकाल में अकस्मात् शंख, तुरही वा वीणा का शब्द सुन पड़े तो
वर-कन्या का मंगल होता है, और यदि कौआ, गदहा, कुत्ता वा सियार शब्द
करने लगें तो उससे विपरीत अर्थात् अमंगल होता है ॥ ९ ॥
कन्यावरण-मुहूर्त्त
विश्वस्वातीवैष्णवपूर्वात्रयमैत्रैर्वस्वाग्नेयैर्वा करपीडोचितऋक्षैः ।
वस्त्रालङ्कारादिसमेतैः फलपुष्पैः सन्तोष्यादौ स्यादनु कन्यावरणं हि ॥ १० ॥
अन्वयः—विश्वस्वातीवैष्णवपूर्वात्रयमैत्रैः वस्वाग्नेयैः वा करपीडोचितऋक्षैः हि
(निश्चयेन) आदौ वस्त्रालंकारादिसमेतैः फलपुष्पैः (कन्यां) संतोष्य अनु कन्यावरणं
स्यात् ॥ १० ॥
उत्तराषाढ़, स्वाती, श्रवण, तीनों पूर्वा, अनुराधा, धनिष्ठा वा कृत्तिका
नक्षत्र में, अथवा विवाहोक्त नक्षत्रादि में, वस्त्र, आभूषण अथवा फल, फूल
आदि से कन्या को संतुष्ट करके फिर उसका वरण करे ॥ १० ॥
वरवरण अर्थात् फलदान का मुहूर्त्त
धरणिदेवोऽथवा कन्यकासोदरः शुभदिने गीतवाद्यादिभिः संयुतः ।
वरवृतिं वस्त्रयज्ञोपवीतादिना ध्रुवयुतैर्वह्निपूर्वात्रयैराचरेत् ॥ ११॥
अन्वयः—शुभदिने ध्रुवयुतैः वह्निपूर्वात्रयैः धरणिदेवः अथवा कन्यकासोदरः गीत-
वाद्यादिभिः संयुतः सन्, वस्त्रयज्ञोपवीतादिना वरवृतिं आचरेत् ॥ ११ ॥
रोहिणी, तीनों उत्तरा, कृत्तिका और तीनों पूर्वा नक्षत्र, शुभ दिन, तिथि,
लग्नादि में गीत-वाद्य आदि के साथ ब्राह्मण अथवा कन्या का भाई वस्त्र,
यज्ञोपवीत, द्रव्य, फल, फूलादि से वर का वरण करे ॥ ११ ॥