मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)
Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary
दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा
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अन्वयः—यदि सितातिरिक्तपक्षे शशाङ्कः तनुगृहतः समराशिगः अशुभखचरवीक्षितः
(सन्) अरिरन्ध्रे भवति तदा अयं विवाहविनाशकारको भवति ॥ ६ ॥
कृष्णपक्ष हो, चन्द्रमा वृष और कर्क आदि सम राशियों में, प्रश्नलग्न
से छठे वा आठवें स्थान में स्थित हो और अशुभ ग्रहों से देखा जाता हो,
तो विवाहभंगयोग होता है ॥ ६ ॥
जन्मकालिक बालविधवायोग के विचारने का उपदेश
करते हुए उसके शान्त होने का उपाय
जन्मोत्थं च विलोक्य बालविधवायोगं विधाय्य व्रतं
सावित्र्या उत पैप्पलं हि सुतया दद्यादिमां वा रहः ।
सल्लग्नेऽच्युतमूर्तिपिप्पलघटैः कृत्वा विवाहं स्फुटं
दद्यात्तां चिरजीविनेऽत्र न भवेद्दोषः पुनर्भुभवः ॥ ७ ॥
अन्वयः—जन्मोत्थं चकारात् (प्रश्नलग्नोत्थं) बालविधवायोगं विलोक्य हि
[निश्चयेन] सुतया सावित्र्या व्रतं, उत [वा] पैप्पलं व्रतं विधाय्य इमां चिरजीविने
(वराय) दद्यात् । वा, सल्लग्ने रहः अच्युतमूर्ति-पिप्पलघटैः स्फुटं विवाहं कृत्वा तां
चिरजीविने दद्यात् । अत्र पुनर्भुभवः दोषः न भवेत् ॥ ७ ॥
उक्त रीति से प्रश्नकालिक बालविधवायोग और जातकोक्त रीति से
कन्या के जन्मकालिक बालविधवायोग का विचार करके कन्या का पिता
एकान्त में कन्या से सावित्री* व्रत या पीपर† वृक्ष का व्रत कराके शुभ लग्न
में चिरजीवी वर के साथ उस कन्या का विवाह कर दे, अथवा चतुर्भुजी
विष्णु की सोने की मूर्ति वा पीपर का वृक्ष वा मिट्टी का घड़ा, इन तीनों
में से किसी के साथ शुभ लग्न में कन्या का विवाह करे और फिर
चिरजीवी वर के साथ विवाह कर दे, ऐसा करने से पुनर्भू‡ दोष नहीं
लगता ॥ ७ ॥
प्रश्न के समय प्रथम सन्तान का विचार
प्रश्नलग्नक्षणे यादृशापत्ययुक्स्वेच्छया कामिनी तत्र चेदाव्रजेत् ।
कन्यका वा सुतो वा तदा पण्डितैस्तादृशापत्यमस्या विनिर्दिश्यते ॥ ८ ॥
अन्वयः—तत्र प्रश्नलग्नक्षणे चेत् स्वेच्छया यादृशापत्ययुक् कामिनी आव्रजेत् तदा
कन्यका वा सुतः तादृशापत्यं अस्याः पण्डितैः विनिर्दिश्यते ॥ ८ ॥
*व्रतखण्ड में इसका विधान लिखा है। †ज्ञानभास्करनामक ग्रन्थ में इसका विधान लिखा है।
‡विवाहित पति को छोड़ दूसरे के साथ विवाह करना ।