मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)
Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi
विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र) द्वारा
स्रोत: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपंचम अङ्क । १२३
मलयकेतु ।—स्वामि पुत्र तुव मौर्य्य हम, मित्र पुत्र सह हेत ।
पैहो उत वाको दियो इत तुम हम कोँ देत ॥
सचिवहु भे उत दास ही, इत तुम स्वामी आप ।
कौन अधिक फिर लोभ जो, तुम कीन्हो यह पाप ॥
राक्षस ।—( आखों मे आसू भरके ) कुमार ! इस का निर्णय ५
तो आप ही ने कर दिया—
स्वामि पुत्र मम मौर्य्य तुम, मित्र पुत्र सह हेत ।
पैहैं उत वाको दियो, इत हम तुम को देत ॥
सचिवहु भे उत दास ही, इत हम स्वामी आप ।
कौन अधिक फिर लोभ जो, हम कीन्हो यह पाप ॥ १०
मलयकेतु ।—( चिट्ठी, पेटी इत्यादि दिखला कर ) यह सब
क्या है ?
राक्षस ।—( आखों मे आसू भर के ) यह सब चाणक्य ने
नही किया, दैव ने किया ।
निज प्रभु सोँ करि नेह जे भृत्य समर्पत देह । १५
तिन सौं अपने सुत सरिस सदा निबाहत नेह ॥
ते गुण गाहक नृप सबे जिन मारे नुन माहि ।
ताही विधि को दोस यह औरन को कछु नाहि ॥
मलयकेतु ।—(क्रोधपूर्वक) अनार्य्य ! अब तक छल किए जाते
हौ कि यह सब दैव ने किया । २०
विष कन्या दै पितु हत्यौ, प्रथम प्रीति उपजाय ।
अब रिपु सोँ मिलि हम सबन, बधन चहत ललचाय ॥
राक्षस ।—( दुःख से आप ही आप ) हां ! यह और जले पर
नमक है । (प्रगट कानों पर हाथ रख कर ) नारायण ! देव
पर्व्वतेश्वर का कोई अपराध हम ने नही किया । २५
मलयकेतु ।—फिर पिता को किसने मारा ?
राक्षस ।—यह दैव से पूछो ।