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मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi

विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र) द्वारा

स्रोत: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

पृष्ठ 119, कुल 173 में से

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पृष्ठ 119

१२२ मुद्राराक्षस-

यह भी है ? (राक्षस के पहने हुए आभरण को देख कर
आप ही आप) क्या यह पिता के पहने हुए आभरण है ?
(प्रकाश) आर्य, यह आभरण आपने कहा से पाया ?
राक्षस। — जौहरी से मोल लिया था ।
५ मलयकेतु। — विजये ! तुम इन आभरणों को पहचानती हौ ?
प्रतिहारी। — देख कर आसू भर के) कुमार ! हम सुगृहीत
नामधेय महाराज पर्व्वतेश्वर के पहिरने के आभरणों को
न पहिचानैगे ?
मलयकेतु। — (आखों मे आसू भर के)
१० भूषण प्रिय ! भूषण सबै, कुल भूषण ! तुव अङ्ग ।
तुव मुख ढिग इमि सोहतो, जिमि ससि तारन सङ्ग ॥
राक्षस। (आपही आप) य पर्व्वतेश्वर के पहिने हुए आभरण
हैं ? (प्रकाश) जाना, यह भी निश्चय चाणक्य के भेजे हुए
जौहरियों ने ही बेचा हे ।
१५ मलयकेतु। — आर्य ! पिता के पहने हुए आभरण और फिर
चन्द्रगुप्त के हाथ पडे हुए जौहरी बेचै, यह कभी हो नही
सकता । अथवा हो सकता है ।
अधिक लाभ के लोभ सों, क्रूर ! त्यागि सब नेह ।
बदले इन आभरन के तुम बेच्यौ मम देह ॥
२० राक्षस। — (आपही आप) अरे ! यह दाव तो पूरा बैठ गया ।
मम लेख नहि यह किमि कहैं मुद्रा छुपी जब हाथ की ।
विश्वास होत न शकट तजि हे प्रीति कबहु साथ की ॥
पुनि बेचि हैं नृप चन्द्र भूषण कौन यह पतियाइहैं ।
तासों भलो अब मौन रहनो कथन तैं पति जाइ है ॥
२५ मलयकेतु। — आर्य ! हम यह पूछते हैं । -
राक्षस। — जो आर्य हो उस से पूछो, हम अब पापकारी अनार्य
हो गये है ।