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मृगेन्द्र आगम: विद्या एवं योग पाद (भट्ट नारायणकण्ठ वृत्ति सहित प्राचीनतम कामिक आगम परिशिष्ट)

मृगेन्द्र आगम: विद्या एवं योग पाद (भट्ट नारायणकण्ठ वृत्ति सहित प्राचीनतम कामिक आगम परिशिष्ट)

Mrigendra Tantra / Agama with Narayanakantha Vritti

महर्षि मृगेन्द्र (टीकाकार: भट्ट नारायणकण्ठ) द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

पृष्ठ 333, कुल 448 में से

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पृष्ठ 333

श्रीमद्भट्टनारायणकण्ठविरचितवृत्त्युपेते । ३०३
सुरभ्यब्जच्छन्नं भद्रकाख्यं सरः। साम्प्रतमि-
लावृतादिद्वीपनिवासिनो जनस्याहारायुःका-
न्त्यादिवर्णनम् ॥ ८० ॥
त्रयोदशसहस्रायु-
र्जम्बूफलरसाशनः ।
मेर्वालोकोपलब्धार्थो
जनः सुत्वगिलावृते ॥ ८१ ॥
मेर्वालोकेन च दीपेन प्रकाशेनाधिगतप-
दार्थः । सुत्वगिति कान्तच्छविः ॥ ८१ ॥
वर्षायुतायुर्नीलाब्ज-
द्युतिः पनससारभुक् ।
केतुमाले जनो दिव्य-
देहबन्धः सुखी बली ॥ ८२ ॥
वर्षाणामयुतं दशसहस्राणि आयुर्यस्य स
तथा । पनसाख्यानि फलानि तेषां सारो निः-
ष्यन्दस्तं भुङ्क्ते इति पनससारभुक् ॥ ८२ ॥
चन्द्रबिम्बद्युतिर्नीला-
ब्जाशनो भद्रवाजिनि ।

मृगेन्द्र आगम: विद्या एवं योग पाद (भट्ट नारायणकण्ठ वृत्ति सहित प्राचीनतम कामिक आगम परिशिष्ट) · पृष्ठ 333, कुल 448 में से · SarvaKosh