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सर्वकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 94, कुल 760 में से

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पृष्ठ 94

प्रथमोऽङ्कः ५

वृद्धि । नन्द एव नान्दः—'प्रज्ञादिभ्योऽण्' इति स्वार्थेऽणि ततो ङीपि 'नान्दी' इति सिध्यति ।

विमर्श—देवता, ब्राह्मण अथवा राजा आदि को प्रसन्न करने के लिये नाटकादि के प्रारम्भ में आशीर्वाद से युक्त जो स्तुतिपाठ किया जाता है उसे नान्दी कहा जाता है। आचार्य भरत ने लिखा है—

आशीर्वचनसंयुक्ता स्तुतिर्यस्मात् प्रयुज्यते ।
देवद्विजनृपादीनां तस्मान्नान्दीति संज्ञिता ॥ [ साहित्यदर्पण ६।२४ ]
देवद्विजनृपादीनामाशीर्वचनपूर्विका ।
नन्दन्ति देवता यस्यां तस्मान्नान्दीति कीर्तिता ॥

नान्दी के विस्तार के विषय में यह है—

अष्टाभिर्दशभिर्वाऽपि नान्दी द्विदशभिः पदैः ।
आशीर्नमस्क्रिया वस्तुनिर्देशो वापि तन्मुखम् ॥

यहाँ अष्टपदा नान्दी है क्योंकि दो श्लोकों में ४+४=८ पाद हैं। यहाँ कथावस्तु के बीज का सङ्केत होने से पत्रावली नामक 'नान्दी' है—

यस्यां बीजस्य विन्यासो ह्यभिधेयस्य वस्तुनः ।
श्लेषेण वा समासोक्त्या नान्दी पत्रावलीति सा ॥

सर्वत्र नाट्य ग्रन्थों में नान्दीपाठ के बाद सूत्रधार का उल्लेख प्राप्त है। अतः यह शंका स्वाभाविक है कि तब इस नान्दी का पाठ कौन करता है ? समाधान यह है कि सूत्रधार ही नान्दी का पाठ करता है। परन्तु शास्त्रीय परम्परानुसार सर्वप्रथम मंगलाचरण का उल्लेख होना चाहिये अतः पहले नान्दी श्लोकों का उल्लेख करके सूत्रधार शब्द का उल्लेख किया जाता है।

रङ्गशाला का प्रधान व्यवस्थापक सूत्रधार कहा जाता है। यह सूत्रधार ही नान्दी का पाठ करता है। सूत्रधार का यह लक्षण है —

नाट्योपकरणादीनि सूत्रमित्यभिधीयते ।
सूत्रं धारयतीत्यर्थे सूत्रधारो निगद्यते ॥

अर्थात् नाट्य के उपकरण एवं अभिनय के निर्देशन आदि को 'सूत्र' कहा जाता है, इसको धारण करने वाला 'सूत्रधार' कहा जाता है। इस प्रकार रंगमञ्च की व्यवस्था का अधिकारी और अभिनेताओं को निर्देशित करने वाला व्यक्ति सूत्रधार कहा जाता है। मातृगुप्ताचार्य ने सूत्रधार का विशद रूप लिखा है—

चतुरातोद्यनिष्णातोऽनेकभूषासमावृतः ।
नानाभाषणतत्त्वज्ञो नीतिशास्त्रार्थतत्त्ववित् ॥
नानागतिप्रचारज्ञो रसभावविशारदः ।
नाट्यप्रयोगनिपुणो नानाशिल्पकलान्वितः ॥