मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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दारिका, व्यापादिता, जीवतु मे दीर्घायुः । अन्यच्च अर्थिप्रत्यर्थिनोर्व्यवहारः अहम-
र्थिनी, तत् मुञ्चत एनम् । )
शकारः- अवेहि गब्भदाशि ? गच्छ, किं तव एदिणा ? ( अपेहि
गर्भदासि ! गच्छ, किं तव एतेन ? )
अधिकरणिकः- आर्ये ! गम्यताम् । हे राजपुरुषाः ! निष्क्रामयतैनाम् ।
वृद्धा -- हा जाद ! हा पुत्तअ ! । ( हा जात ! हा पुत्रक ! ) ( इति रुदती
निष्क्रान्ता । )
शकारः- ( स्वगतम् ) किदं मए एदश्श अत्तणो शलिशं । शम्पदं
गच्छामि । ( कृतं मया एतस्य आत्मनः सदृशम् । साम्प्रतं गच्छामि । ) ( इति
निष्क्रान्तः । )
अधिकरणिकः- आर्यचारुदत्त ! निर्णये वयं प्रमाणम्, शेषे तु राजा ।
तथापि शोधनक ! विज्ञाप्यतां राजा पालकः—
अयं हि पातकी विप्रो न वध्यो मनुरब्रवीत् ।
राष्ट्रादस्मात्तु निर्वास्यो विभवैरक्षतैः सह ॥३६॥
वादी और प्रतिवादी का मुकदमा है । मैं वादी हूँ । अतः इसको छोड़ दीजिये ।
शकार— अरे गर्भदासी ! दूर हट जा, चली जा, तुझे इससे क्या ?
अधिकरणिक— आर्ये ! आप जाइये । हे सिपाहियो ! इसको बाहर करो ।
वृद्धा— हाय बेटी ! हाय बेटा ! ( ऐसा कहती हुई रोती हुई निकल गयी ।)
शकार— (अपने में) मैंने इस चारुदत्त के लिये अपनी इच्छानुसार काम कर
लिया है । अब चलता हूँ । ( यह कहकर चला जाता है । )
अन्वयः- अयम्, विप्रः, पातकी, ( तथापि ) वध्यः, न, इति, मनुः, अब्रवीत्,
तु, अक्षतैः, विभवैः, सह, अस्मात्, राष्ट्रात्, निर्वास्यः ॥ ३९ ॥
शब्दार्थ - अयम्= यह, विप्रः=ब्राह्मण, पातकी=पापी है. ( तथापि=फिर भी )
वध्यः=वधयोग्य, न=नहीं है, इति=ऐसा, मनुः=मनु ने, अब्रवीत्=कहा है, तु=लेकिन
अक्षतैः=बिना हानि के सम्पूर्ण, विभवैः=धनादि के, सह=साथ, अस्मात्=इस,
राष्ट्रात्=राष्ट्र से, निर्वास्यः=बाहर करने योग्य है ॥ ३६ ॥
अर्थ--अधिकरणिक--आर्य चारुदत्त ! निर्णय करने में हम प्रमाण
( अधिकारी ) हैं, शेष में अर्थात् दण्ड देने में राजा । तथापि शोधनक ! राजा
पालक से निवेदन कर दो –
यह ब्राह्मण पातकी है फिर भी वधयोग्य नहीं है--ऐसा मनु ने कहा हैं
किन्तु सम्पूर्ण सम्पत्ति के साथ यह इस राष्ट्र (राज्य) से बाहर करने योग्य है
अर्थात् इसे सम्पूर्ण सम्पत्ति के साथ राज्य से बाहर निकाल दीजिये ॥ ३६ ॥