मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयोऽङ्कः १६७
वृक्षवाटिकापरिसरे सन्धिं कृत्वा प्रविष्टोऽस्मि मध्यमकम। तद्याव-
दिदानीं चतुःशालकमपि दूषयामि। भोः !
कामं नीचमिदं वदन्तु पुरुषाः स्वप्ने च यद्वर्द्धते,
विश्वस्तेषु च वञ्चनापरिभवश्चौर्यं न शौर्यं हि तत् ।
स्वाधीना वचनीयतापि हि वरं बद्धो न सेवाञ्जलिः,
मार्गो ह्येष नरेन्द्रसौप्तिकवधे पूर्वं कृतो द्रौणिना ॥ ११ ॥
से 'वीर' शब्द का पूर्वनिपात होने से 'वीरैक' ऐसा ही होना चाहिये ? इसका समा-
धान यह है कि 'विशेषणं विशेष्येण बहुलम्' ( पा सू. २।१।५७ ) के बहुलग्रहण से
'एक' शब्द का भी पूर्वनिपात हो सकता है । अतः यह रूप भी कथञ्चित् शुद्ध ही
समझना चाहिये । तत्त्वबोधिनी में--एकेषु = मुख्येषु वीरयते = पराक्रमते-यह व्युत्पत्ति
दी है । जिस प्रकार दुष्ट भी सन्तान की रक्षा माता करती है उसी प्रकार रात्रि
भी अन्धेरे के द्वारा चोर की रक्षा करती है । अतः उपमा अलंकार है । पुष्पिताग्रा
छन्द है ॥ १० ॥
अर्थ--फुलवारी की चहारदीवार में सेंध फोड़ कर मध्यमक = बीच के महल में
घुस आया हूँ । अब चतुःशालक = चौसाल में भी सेंध फोड़ता हूँ ।
अन्वयः--स्वप्ने, विश्वस्तेषु, च, वञ्चनापरिभवः, चौर्यम, च, यत् वर्द्धते,
इदम्, पुरुषाः, कामम्, नीचम्, वदन्तु, हि, तत्, शौर्यम्, न, ( अस्ति ), स्वाधीना,
वचनीयता, अपि, हि, वरम्, बद्धः, सेवाञ्जलिः, न, ( वरम् ), हि, एषः, मार्गः,
पूर्वम्, द्रौणिना, नरेन्द्रसौप्तिकवधे, कृतः ॥ ११ ॥
शब्दार्थ--स्वप्ने = सोने पर, नींद के समय में, च = और, विश्वस्तेषु = विश्वास
किये हुये लोगों में, वञ्चनापरिभवः = ठगाई के द्वारा अपमान, और चौर्यम् = चोरी,
यत् वर्द्धते = जो अधिक होती है, इदम् = इसको, पुरुषाः = सज्जन लोग, कामम् =
अपनी इच्छानुसार, नीचम् = निकृष्ट, वदन्तु = कहें, हि = क्योंकि, तत् = वह चोरी
करना, शौर्यम् = बहादुरी का कार्य, न = नहीं है (क्योंकि शूर तो सामने आक्रमण
करते हैं ।) तथापि, स्वाधीना = अपने अधीन, वचनीयता = चोरी आदि की निन्दा,
अपि = भी, वरम् = अच्छी है, परन्तु,, बद्धः = बांधी गई, जोड़ी गई, सेवाञ्जलिः =
धनिकों की सेवा के लिये अञ्जलिपुट, न = नहीं, वरम् = ठीक है । हि = क्योंकि,
एषः = यह मेरे द्वारा किया जाने वाला, मार्गः = चोरी करना रूपी मार्ग, तो, पूर्वम् =
बहुत पहले ही, द्रौणिना = द्रोणपुत्र अश्वत्थामा ने, नरेन्द्रसौप्तिकवधे = राजा
( युधिष्ठिर ) के सोये हुये सैनिकों या पुत्रों के वध के लिये, कृतः = अवलम्बित
किया था । ( अतः ब्राह्मण होकर मेरा यह कार्य निन्दित नहीं है ) ॥ ११ ॥