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सर्वकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 282, कुल 760 में से

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पृष्ठ 282

तृतीयाऽङ्कः । १६५

गच्छामि भूमिपरिसर्पणघृष्टपार्श्वो निर्मुच्यमान इव जीर्णतनुर्भुजङ्गः ॥६॥

कृत्वा, भूमिपरिसर्पणघृष्टपार्श्वः, (कञ्चुकेन) निर्मुच्यमानः, जीर्णतनुः, भुजङ्गः, इव, गच्छामि ॥ ९ ॥

**शब्दार्थ—**शिक्षाबलेन = (चोरी करने के लिये सीखी गई) शिक्षा के बल से, च = और, बलेन = अपने शारीरिक बल से, च = भी, शरीरपरिणाह-सुख-प्रवेशम् = अपने शरीर की लम्बाई चौड़ाई के अनुसार आराम से भीतर घुस जाने योग्य, कर्ममार्गम् = चोरीरूप कर्म के लिये रास्ता को, कृत्वा = बनाकर, भूमिपरिसर्पण-घृष्टपार्श्वः = जमीन पर घिसटने के कारण रगड़ खाये हुये पार्श्व = कुक्षि वाला, (केंचुल से) निर्मुच्यमानः = मुक्त होता हुआ, जीर्णतनुः = जर्जर देह वाले, भुजङ्गः इव = साँप के समान, गच्छामि = जा रहा हूँ ॥ ६ ॥

अर्थ——(चोरी करने के लिये सीखी गई) शिक्षा के बल से और (शारीरिक) बल से, अपने शरीर के परिमाण के अनुसार सुख से प्रवेश करने योग्य, चौर्यकार्य करने के लिये रास्ते को बनाकर, जमीन पर सरकने के कारण रगड़ खायी हुई कोखों (कुक्षियों) वाला मैं केंचुल से मुक्त होते हुये, जीर्ण शरीर वाले साँप के समान (भीतर) जा रहा हूँ ॥ ६ ॥

**टीका—**सम्प्रति चौर्यकर्मनिपुणः शर्विलकः स्वकीयं कर्त्तव्यं वर्णयन्नाह—कृत्वेति । शिक्षाबलेन = चौर्यकर्मज्ञानसामर्थ्येन, बलेन = शारीरिकशक्त्या, च = तथा, शरीरस्य = देहस्य, परिणाहः = विशालता, तस्य, सुखेन = अकष्टेन, प्रवेशः = अन्तर्गमनम्, यत्र तं तथाविधम्, कर्ममार्गम् = चौर्यकर्मणः पन्थानं सन्धिमित्यर्थः, कृत्वा = विधाय, भूमिपरिसर्पणघृष्टपार्श्वः = भूमेः = पृथवीतलात्, भूमौ = पृथिव्यां वा यत् परिसर्पणम् = सन्ध्यन्तरेण गृहमध्यप्रवेशः, तेन घृष्टौ = प्राप्तघर्षणौ, कक्षौ = कक्षाधोभागौ यस्य सः तथाभूतः, सन्, अत एव, निर्मुच्यमानः = कञ्चुकात् हीयमानः, स्वयमेव परित्यक्तनिर्मोक्त इत्यर्थः, अत्र कर्मकर्त्तरि शानज् बोध्यः, जीर्णतनुः = जीर्णा = जर्जरीभूता तनुः = शरीरं यस्य स तादृशः, भुजङ्ग इव = सर्प इव (अहम् = शर्विलकः) गच्छामि = प्रविशामि । अत्र घृष्टपार्श्वशर्विलकस्य त्यक्तनिर्मोकभुजङ्गेन साम्यकथनादुपमालङ्कारः । वसन्ततिलकं वृत्तम् ॥ ६ ॥

विमर्श——परिणाह--शरीर की लम्बाई चौड़ाई 'परिणाहो विशालता-' (अमरकोश--२।६।११४) पार्श्व--कुक्षि के नीचे का भाग । निर्मुच्यमानः--यहाँ कर्मकर्तृ अर्थ में शानच् समझना चाहिये--केंचुल द्वारा स्वयं छोड़ा जाता हुआ। यहाँ शर्विलक और साँप का साम्य होने से उपमा अलंकार है और वसन्ततिलका छन्द है ॥ ९ ॥