मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)
Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya
महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा
स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 451, कुल 804 में से
संदर्भ में पढ़ें७ ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः ३९९
भा० प्र०—"अपि वा" = पूर्व पक्ष के निवारण अर्थ को कह रहा है, "कारणा-
ग्रहणे" = कारण का अर्थात् स्मृति विहित कर्म के अप्रामाण्य का कारण जो लोभ मोह
आदि हैं, उनके अग्रहण में अर्थात् ग्रहण या ज्ञान न होने पर, "प्रयुक्तानि" = स्मृति-
प्रयुक्त अर्थात् स्मृति से विहित आचमन आदि कर्म, "प्रतीयेरन्" = अविरुद्ध अर्थात्
प्रमाण या अनुष्ठेय के रूप में प्रतीत होंगे ।
स्मृति विहित कर्म के अप्रामाण्य का कारण जो लोभ मोह आदि हैं उनकी सम्भावना
न रहने पर श्रौत क्रम आदि के विरोधी होने पर भी आचमन आदि स्मार्तं कर्म को
प्रमाण अर्थात् अनुष्ठेय समझना चाहिए ।
आशय यह है कि सूत्र में "अपि वा" इस शब्द से पूर्वपक्षी की आशङ्का का निवारण
किया गया है । श्रौतकर्म काल एवं परिमाण आदि के विरोधी होने पर भी आचमन
आदि स्मार्तं पदार्थ अर्थात् कर्म अनुष्ठेय होगा, क्योंकि इन कर्मों के अप्रामाण्यका कोई
कारण नहीं है । लोभ, मोह आदि ही अप्रामाण्य का कारण है; किन्तु आचमन दक्षिणाचार
आदि स्मार्तं कर्म लोभादिमूलक नहीं है । अत एव उनका अप्रामाण्य नहीं है, अपितु प्रमाण
होने से अनुष्ठेय हैं । इस स्थल में आचमन आदि पदार्थ अर्थात् पदप्रतिपाद्य कर्मफल
धर्मी है और आनन्तर्य आदि उस पदार्थ के आश्रित धर्म है । अतः धर्म और धर्मी में
विरोध होने पर धर्मी ही निर्बाध होता है । क्योंकि, धर्मिरूप आश्रय के बाधित होने पर
धर्मरूप आश्रित रह ही नहीं सकता है । इसलिए पदार्थ (कर्म) में आश्रित आनन्तर्य
आदि क्रम श्रौत होने पर भी उसके द्वारा स्मृतिविहित आचमन आदि कर्मों की बाधा
नहीं हो सकती है । धर्मी के आविर्भाव के बाद धर्म का आविर्भाव होने से आचमन आदि
धर्म के पूर्व में या एक समय में आनन्तर्य आदि रूप क्रम आदि उपस्थित ही नहीं है ।
सभी शास्त्रीय कर्मों का शुद्ध होकर अनुष्ठान करना पड़ता है—यही नियम है । आचमन
यज्ञोपवीतित्व, दक्षिणाचारता आदि शुद्धि या शौच का हेतु है, अतः ये कर्म के ही अङ्ग
है । अङ्ग प्रधान या अङ्गी की परिपूर्णता का ही साधन करता है, प्रधान का बाधक
नहीं होता है, क्योंकि जो जिसका अङ्ग नहीं होता है ऐसा समकक्ष पदार्थ (कर्म) एक
में दूसरे की बाधा को उत्पन्न कराता है । किन्तु आचमन आदि स्वतन्त्र कर्म नहीं हैं,
ये सभी कर्म के ही अङ्ग हैं । इसलिए ये समय में ही अनुष्ठेय हैं । इसीलिए शास्त्रकार
ने कहा है—
सदोपवीतिना भाव्यं सदा बद्धशिखेन तु ।
विशिखोव्युपवीतश्च यत्करोति न तत्कृतम् ॥
अर्थात् "सदा उपवीति अर्थात् बायें कन्धे पर यज्ञोपवीत को धारण करे एवं
सभी कार्य शिखा को बांधकर करे शिखाहीन होकर एवं उपवीती हुए बिना, जो कुछ
भी करता है, वह न करने के समान है इस प्रकार वामहाथ से किया गया कार्य भी