सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya

महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा

स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished804 पृष्ठ

पृष्ठ 281, कुल 804 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 281

३९ ] प्रथमाध्याये द्वितीयपादः २२९
त० वा०—अदितिद्यौरदितिरिति । नात्र द्युत्वादीनि विवक्षितानि । किं
तर्हि ? अदितौ प्रकाशयितव्यायामविद्यमानविप्रतिषिद्धधर्मोपादानं स्तुत्यर्थम् ।
गुणवादेन त्वौदुम्बराधिकरणवत्संवादो योजयितव्यः ॥ ३९ ॥
न्या० सु०—यस्त्वर्थविप्रतिषेधः शङ्कितः, स गौणत्वात्परिहर्त्तव्य इत्येवं सूत्रं
व्याख्यातुमदितिरित्यादिभाष्यं व्याचष्टे—अदितिरिति । स्तुतिविषयत्वाद गौणत्वस्य स्तुतित्वस्य
चार्थवादाधिकरणव्युत्पादितस्याप्यौदुम्बराधिकरणविधित्वशङ्कानिराकरणेन प्रतिष्ठानार्थमुदुम्ब-
राधिकरणवदित्युक्तम् ॥ ३९ ॥
भा० प्र०—गुणात् = गौण प्रयोग होने से, अप्रतिषेधः = विरोध नहीं है।
“अदितिद्यौरदितिरन्तरिक्षम्” इत्यादि मन्त्रों में जो विरोध प्रदर्शन किया गया है
वह ठीक नहीं है आप ही 'माँ-बाप हैं' इस लौकिक वाक्य के समान ही यह गौणार्थक
है, अतः किसी तरह का विरोध नहीं है ।
एको रुद्रः एवं सहस्राणि सहस्रशो ये रुद्राः आदि मन्त्रों का भी विरोध नहीं है,
क्योंकि एक रुद्र जिस कर्म का देवता है 'एको रुद्रः' यह मन्त्र उसी में पढ़ना चाहिए
एवं जो कर्म शतरुद्रदैवत्य है, उसमें 'सहस्राणि सहस्रशो ये रुद्राः' आदि मन्त्र उसी में
पढ़ना चाहिए। अतः कर्मभेदनिबन्धन देवता का भेद होने से किसी प्रकार का
असामञ्जस्य नहीं है।
इस प्रसङ्ग में वेदान्तियों ने कहा है कि रुद्र अनेक नहीं हैं, किन्तु एक ही रुद्र हजार
या करोड़ मूर्तियों को धारण करता है—यह एक ही रुद्र की महिमा या विभूति के
अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। इसीलिए बृहदारण्यक उपनिषद् में कहा है कि “त्रयश्च त्री च
शता च त्रयश्च त्री च सहस्रा, महिमान एव एषामेते त्रयंस्त्रिंशत्त्वेव देवाः”। एको देव
इति प्राण इति स ब्रह्मेत्यादित्याचक्षते” (बृ० उ० ३।९।१,२,९) शाकल्य ने याज्ञवल्क्य
से प्रश्न किया था कि कितने देवता हैं ? याज्ञवल्क्य ने प्रथम उत्तर दिया तीन सौ तीन,
द्वितीय बार उत्तर दिया तीन हजार तीन। इसके बाद कहा कि देवता तैंतीस हैं और
सब इन्हीं की महिमा है। अन्त में उत्तर दिया देवता एक है, वही प्राण अर्थात् हिरण्यगर्भ
वही ब्रह्म, इसी को ज्ञानी 'त्यत्' शब्द से कहते हैं। हम लोगों में देवता की संख्या तैंतीस
करोड़ है—यह प्रवाद निराधार नहीं है। क्योंकि, इस शास्त्र के सिद्धान्त से तैंतीस
देवता की ही यह महिमा या विभूति है। तैंतीस देवताओं का भी एक में ही पर्यवसान होता
है। यद्यपि आठ वसु, ग्यारह रुद्र बारह आदित्य, इन्द्र एवं प्रजापति आदि विभिन्न नाम
धारण करने वाले सभी देवताओं की समष्टि को लक्ष्य कर ही श्रुतियों में तैंतीस देवता
कहा गया है। एक ही ब्रह्म को औपाधिक भेद के अनुसार ही यह प्रकार भेद कहा गया
है। इसलिए श्रुति ने आगे भी कहा है—एको देव इति प्राण इति स ब्रह्मं त्यादित्या-
चक्षते। श्रुति ने अन्यत्र भी कहा है कि—