मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)
Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya
महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा
स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२०० मीमांसादर्शनम् [ सू०
है। सूत्र अधिक विस्तृत हो जाता, अतः, व्याख्या की सुविधा के लिए भगवान् शबर-
स्वामी ने एक-एक अंश लेकर व्याख्या की है। "तदर्थशास्त्रात्" सम्पूर्ण सूत्र के इस
अंश का "मन्त्रानर्थक्यम्" इस अंश के साथ ही अन्वय है। इसमें "मन्त्र की निष्प्रयो-
जनता" यह अंश साध्य है। "तदर्थशास्त्रात्" इत्यादि पञ्चम्यन्तपद हेतु है।
पूर्वपक्षियों का कथन है कि मन्त्र के उच्चारण से अदृष्ट होता है। अर्थात् कर्मविशेष
में यथाकथित रूप में मन्त्र का उच्चारण करने पर अदृष्ट या अपूर्व का उत्पादन होता
है। इसी से कर्म में फल की प्राप्ति होती है। मन्त्र के पदों का अर्थ यज्ञ आदि कर्मों के
किसी प्रयोजन का निर्वाह नहीं करता है। कारण, मन्त्र का अर्थ ब्राह्मणवाक्य से ही
विज्ञापित हो जाता है, और जिसका अर्थ किसी अन्य प्रकार से विज्ञापित हो जाता है,
वह अर्थ किसी अन्य प्रयोजन का साधक नहीं होता है, अर्थात् उससे किसी अन्य प्रयोजन
की सिद्धि नहीं हो सकती है, अतः, मन्त्र का अर्थ विवक्षित नहीं है। मन्त्र के अर्थ का
कोई प्रयोजन नहीं हैं, वरन्, मन्त्र का उच्चारण अदृष्ट का जनक है।
जैसे अभ्रि अर्थात् काठ के कुदाल के ग्रहण के समय "गायत्रेण त्वाच्छन्दसाऽददे
त्रैष्टुभेन त्वाच्छन्दसाऽददे जागतेन त्वाच्छन्दसाऽददे पाङ्क्तेन त्वाच्छन्दसाऽददे" इस मन्त्र का
पाठ किया जाता है। इसके अर्थ के द्वारा वस्तुविशेष का आदान अर्थात् ग्रहण अवगत
होता है। ब्राह्मणग्रन्थ में कहा गया है "तां चतुर्भिरभ्रिमादत्ते" (तै० सं० ५।१।१) चार
मन्त्रों से इस अभ्रि का ग्रहण करें। इसी प्रकार "इमामगृभ्णन् रशनामृतस्येत्यश्वा-
भिधानीमादत्ते" (वा० सं० २२।१) इस स्थल में "इमामगृभ्णन् रशनामृतस्य" यह अंश
मन्त्र है एवम् "इत्यश्वाभिधानीमादत्ते" यह अवशिष्ट अंश ब्राह्मण या विधायक है। यहाँ
भी पूर्व के समान ब्राह्मणवाक्य के द्वारा ही मन्त्र से कथित रशना का ग्रहण कथित हो
गया तो मन्त्र के द्वारा किसी अधिक अर्थ का बोध नहीं हो रहा है। इसी प्रकार "उरु
प्रथस्व" (वा० सं० १।१२) यह एक मन्त्र है। हे पुरोडाश ! जिससे तुम विपुल रूप में
हो सकते हो उसी रूप में अपना प्रसार करो। पुनः ब्राह्मणग्रन्थ में कहा गया है "उरु
प्रथस्वेति पुरोडाशं प्रथयति" (तै० ब्रा० ३।२।८।४) उरु प्रथस्व यह कह कर पुरोडाश
को फैलाये। इन स्थलों में मन्त्र के अर्थ को ब्राह्मणवाक्य ही कह रहा है, अत, मन्त्र का
अर्थ विवक्षित नहीं हो सकता है।
मन्त्र के अर्थ की विवक्षा मानकर ब्राह्मणवाक्य का अन्यथा व्याख्यान किया जा
सकता है, किन्तु, यह भी ठीक नहीं है, वेद मन्त्र एवं ब्राह्मणात्मक होने पर भी ब्राह्मण
विधिप्रधान है। विधि ही साक्षात् रूप में धर्म में प्रमाण है। विधि का अपने अर्थ में
प्रामाण्य पूर्व सूत्र में ही सिद्ध किया गया है। यदि विधिवाक्य का अज्ञातज्ञापकत्वरूप
प्रयोजन नहीं माना जाय तभी ब्राह्मण का अप्रामाण्य होगा, फलस्वरूप सम्पूर्ण वेद का
ही अप्रामाण्य मानना होगा। इसलिए मन्त्र के अनुरोध से ब्राह्मण वाक्य का अर्थ