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सर्वकोश
मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya

महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा

स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished804 पृष्ठ

पृष्ठ 223, कुल 804 में से

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पृष्ठ 223

२९ ] प्रथमाध्याये द्वितीयपादः १७१
होम की करणाकाङ्क्षा श्रुतिबोधित शूर्प के द्वारा ही चरितार्थ होने से थाली प्रभृति की
होमसाधनता की प्राप्ति का अवसर ही नहीं है ।
‘श्रुतिः’=अर्थवाद, ‘तु’=पूर्वं पक्ष का व्यावर्तक, “शब्दपूर्वकत्वात्” = क्योंकि शूर्प
अन्न का कारण है, वह श्रुति बोधित है, ‘अचोदना’=अविधि या विधि नहीं है । ‘च’=
और,,तस्य’=दर्वी, थाली आदि का । श्रुति के द्वारा शूर्प को ही अन्न साधनता कहा है,
दर्वी स्थाली आदि की अन्न साधनता की विधि या वेदवचन नहीं है । अतः, यह स्तुति
या अर्थवाद वाक्य है ॥ २७ ॥
व्यर्थे स्तुतिरन्याय्येति चेत् ॥ १.२.२८ ॥
शा० भा०—इति पुनर्यदुक्तम्, तत्परिहर्त्तव्यम् ॥ २८ ॥
भा० वि०—ननु शूर्पविषयेऽपि साधकतमत्वक्रियावर्तमानतवाद्यर्थाभावात् कथं
स्तुतिरिति ‘व्यर्थे स्तुतिरिति’ सूत्रार्थस्य पूर्वमुक्तत्वादनुभाषणार्थमेतत्सूत्रमिति
व्याचष्टे—इति पुनरिति । तस्य परिहारयोग्यतामाह—तदिति ॥ २८ ॥
त० वा० — यत्पुनः शूर्पेऽप्यन्नकरणत्वानुपपत्तेः स्तुतिर्न प्राप्नोतीत्युक्तम् । किं
तत्राभिधीयते ॥ २८ ॥
न्या० सु०--एतत्सूत्रार्थस्य पूर्वमुक्तत्वादनुभाष्यार्थार्थतैतत्सूत्रमिति पुनर्यदुक्तमिति
वदता भाष्यकृता व्याख्यातम्, तद्व्याचष्टे—यत्पुनरिति ॥ २८ ॥
भा० प्र०—शूर्प के द्वारा अन्न का सम्पादन नहीं होता, किन्तु, दर्वी, स्थाली आदि
के द्वारा ही अन्न का निष्पादन होता है, इसलिए, शूर्प की प्रशंसा करना सङ्गत नहीं है,
इसलिए इस स्थल में हेतु विधि ही आश्रयणीय है, अर्थात् दर्वी स्थाली आदि के द्वारा भी
होम किया जा सकता है—यही श्रुति का आशय है और ऐसी स्थिति में यह भी
सङ्गत नहीं होगा ।
‘व्यर्थे’=जो प्रयोजन का निर्वाहक नहीं है उसके सम्बन्ध में, “स्तुतिः” = प्रशंसा,
‘अन्यस्या’ = अनुचित, “इति चेत्” यदि यह कहा जाय ॥ २८ ॥
अर्थस्तु विधिशेषत्वाद्यथा लोके ॥ १.२.२९ ॥
शा० भा०—अस्मत्पक्षेऽर्थोऽस्ति । वाक्यशेषो हि स विधेस्तदा भवति ।
संवादश्च स्तुतिवचनत्वेन । यथा वयं शूर्पेणान्नं क्रियमाणं जानीमः, तथा शूर्पेणान्नं
क्रियत इत्येव गम्यते । तदा चावर्तमानं स्तोतुं वर्तमानमित्युपदिशति । त्वत्पक्ष
एष दोषो यस्य ते हेतुविधिः । विधौ हि न परः शब्दार्थः प्रतीयते । न च वर्त-
मानमुपदिशन्वेदः शक्यमर्थं विदध्यात् ।