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सर्वकोश
मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya

महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा

स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished804 पृष्ठ

पृष्ठ 206, कुल 804 में से

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पृष्ठ 206

१५४ मीमांसादर्शनम् [ सू० ०
का प्रकाशक मानने पर इस प्रकार की क्लिष्ट अर्थ की कल्पना करने की आवश्यकता
नहीं है, इसके समाधान में सिद्धान्ती का कथन है कि सर्वत्र अर्थवाद को विध्यर्थक मानने
पर प्रदर्शित सिद्धान्त की स्थापना हो सकती है। किन्तु, अर्थवाद वाक्य को विधिरूप में
परिणत नहीं किया जाता है। अनेक स्थलों में विधिरूप में अर्थवाद को परिणत करने
पर विभिन्न दोषों की आपत्ति होती है। किन्तु, अर्थवाद को विधिवाक्य के स्तावक के
रूप में अन्वित करने पर किसी प्रकार के दोष की आपत्ति नहीं होती है और एक ही
तरह के नियम को मानने से काम चल जाता है। इसलिए, विधि के स्तावक रूप में
ही अन्वय स्वीकार अर्थवाद का प्रामाण्य प्रदर्शन उचित है। अर्थवाद को विधिरूप में
परिणत करने पर "अप्सु योनिर्वा अश्वः अप्सु योनिर्वैतसः" (तै० सं० ५।३।१२) इस
स्थल मे अश्व को जल से उत्पन्न एवं वेतस को जल से उत्पन्न नहीं कहा जा सकता है,
अतः, ये अर्थवाद विधि नहीं हो सकते हैं। "वायुर्वै क्षेपिष्ठा देवता" इस अर्थवाद को
विधि के रूप में परिणत नहीं किया जा सकता है, क्योंकि, शीघ्रगामित्व वायु का
स्वभाव है। इसी प्रकार "स्तेनं मनः अनृतवादिनी वाक्"। इस अर्थवाद को विधि
मानने पर स्तेय एवं अनृत भाषण कर्तव्य है यह विरुद्ध अर्थ सिद्ध होगा। इसी तरह
'ऊर्ग॒ वा उद॒म्बरः' इत्यादि अर्थवाद को विधिरूप में परिणत करने पर उपस्थित दोषों
का इस अधिकरण के सूत्रों की व्याख्या में प्रदर्शित किया है। विधि के स्तावक रूप में
अर्थवादों का अन्वय मानने पर लक्षणा छोड़कर दूसरा उपाय भी नहीं है और एक
रूपता नहीं हो सकती है। अतः, जिस स्थल में अर्थवाद की ज्ञाप्य फल या स्तुति अनर्थक
है; उस स्थल में अर्थवाद को विधिरूप में परिणत नहीं किया जा सकता है। "प्रति
तिष्ठन्ति ह वा य एता रात्रीरुपयन्ति" इत्यादि अर्थवाद ही इसका उदाहरण है। जै०
सू० ४।३।१७-१९ में इसका विश्लेषण प्रस्तुत किया है।
'विधिः' = विधि, 'च' = और, 'अनर्थकः' अनर्थक (है), 'क्वचित्' = किसी
स्थल में, 'तस्मात्' = इस कारण से। 'स्तुतिः - प्रशंसा के रूप में अर्थवाद,
'प्रतीयते' = प्रतीत होता है, "तत्सामान्यात्" = उसके समान "इतरेषु" = अन्य स्थलों
में भी, तथात्वम्' = वैसा, प्रशंसात्मक अर्थवाद होगा। क्योंकि, किसी किसी स्थल में
अर्थवाद को विधि मानने पर वह विफल होगा, इसलिए अर्थवाद को स्तुतिपरक मानना
उचित है। अतः, उसी के समान अन्य स्थलों में भी अर्थवाद को विधि मानना उचित
नहीं है, वरन् स्तुति के रूप में ही अर्थवाद को मानना उचित है ॥ २३ ॥
प्रकरणे सम्भवन्नपकर्षो न कल्प्येत विध्यानर्थक्यं
हि तं प्रति ॥ १.२.२४ ॥
शा० भा०—इतश्च पश्यामः स्तुतिरिति । कुतः ? इदं समामनन्ति यो
विदग्धः स नैर्ऋतो, योऽशृतः, स रौद्रो, यः शृतः, स दैवतः, तस्मादविदहता