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सर्वकोश
मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya

महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा

स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished804 पृष्ठ

पृष्ठ 172, कुल 804 में से

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पृष्ठ 172

१२० मीमांसादर्शनम् [ सू०
चिद्वात्तिकपाठः । तत्र भाष्योपन्यस्तस्यापि दीर्घपाठस्य स्वानभिमतत्वसूचनार्थं पाठान्त-
रोक्तिः । पूर्वंविवक्षितार्थलाभोपपादनाय ह्रस्वपाठव्युत्पत्ति दर्शयितुमाह—अकालिकमिति
चेति । ठस्येकादेशात्कालिकपदसिद्धिः ॥ १४ ॥
भा० प्र०—शास्त्रीय दृष्टविरोध के दृष्टान्त में "को हि तद् वेद" (तै० सं०
६।१।१।१) इस वेद वाक्य का उल्लेख किया है। यह वाक्य "दिक्ष्वतीकाशान् करोति"
(तै० सं० ६।१।१।१) का अवशिष्ट अंश है। (दिशाओं में अवकाश या द्वार रखना
चाहिये) यह विधि प्राचीन वंश नामक यज्ञशाला में अवकाश या द्वार रखने के लिए
दिशा के नियम के लिए कहा गया है। श्रौतसूत्रकार महर्षि कात्यायन ने अग्निष्टोम
याग के स्थान निरूपण के प्रसङ्ग में अन्य श्रुतियों की प्रत्यालोचनापूर्वक प्रत्येक "प्रतिदिक्
द्वारम्" (का० सू० ७।३।१७) से पूर्वपक्ष कर "उदग्वर्जं वा" (७।३।१८) के द्वारा
सिद्धान्त प्रदर्शित किया है। उत्तर दिशा को छोड़ कर अन्य दिशाओं में द्वार रहेगा।
यज्ञशाला यज्ञाग्नि से उत्पन्न धुम से व्याप्त हो जाता है, यदि धुओं के निकलने का मार्ग
नहीं रहेगा तो ऋत्विजों को बहुत कष्ट होगा, अतः, "को नु तद् वेद" इत्यादि अर्थवाद
में सुदूर काल में होने वाले पारलौकिक सुख का निर्देश न कर उपस्थित धूम से उत्पन्न
दुःख से छुटकारा पाने के लिए अवकाश या धुआं के निकलने के मार्ग का रखना उचित
है—व्यक्त किया है। द्वार का निर्माण स्वतन्त्र रूप में अपनी इच्छा के अनुसार करना
ठीक नहीं है, अपितु विधि-विहित रूप में ही द्वार निर्माण करना चाहिए। अतः, यह
अर्थवाद आकालिकेप्सा = इस समय सुख प्राप्ति की इच्छा से उत्पन्न है। प्रकृत में दुःख
परिहार को ही औपचारिक रूप में सुखलाभ कहा गया है। काल = चिरकाल या
दूरवर्ती काल का बोधक है। कारण, इसी अर्थ में काल शब्द का प्रयोग देखा गया है।
जैसे बहुत दिनों के बाद होने वाले फल को लक्ष्य कर व्यवहार में लोग कहते हैं कि
समय पर इसका फल होगा। अतः, अकाल का अर्थ पूर्ववर्ती काल नहीं अपितु वर्तमान
या तत्काल होता है। अकाल अर्थात् तत्काल में उत्पन्न आकालिक होता है (अकाले भवः
आकालिकः) वर्तमान काल में उत्पन्न सुख की लिप्सा ही आकालिकेप्सा है। इस प्रकार
आकालिकेप्सा शब्द का अर्थ तात्कालिक सुख प्राप्ति की अभिलाषा होता है। अर्थात्
आकालिक = तात्कालिक = उसी समय, ईप्सा सुखलाभ या दुःखपरिहार की अभिलाषा
या इच्छा है । को हि तद् वेद" परलोक में कुछ है या नहीं, इसको कौन जानना है,
फलतः, तात्कालिक सुख प्राप्ति और दुःख के परिहार की इच्छा में प्रवृत्ति भी
स्वाभाविक है ॥ १४ ॥
विद्याप्रशंसा ॥ १.२.१५ ॥
शा० भा०—तथा फलाभावादित्यत्रोदाहृतं 'शोभतेऽस्य मुखमिति' । गर्गत्रि-
रात्रविधेराकाङ्क्षितत्वाच्छेषः । वेदानुमन्त्रणस्य च आङ्स्य प्रजायां वाजी