मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)
Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya
महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा
स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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अनभिप्रेत यागानुष्ठानरूप दुःख में अवसान लाभ करेगा—यह सोच कर निष्प्रभ हो
जाता है। फलतः, प्रवृत्ति उत्पादन करने वाली विधि की शक्ति भी कुण्ठित हो जाती
है। अतः, ऐसी स्थिति में कुछ ऐसे साधन की आवश्यकता होती है, जिससे पुरुष की
प्रवृत्ति बलवती हो जाय, और फल की सुन्दरता का बोध होने से पुरुष की प्रवृत्ति तीव्र
हो जाय-यह स्वाभाविक है। अतः, फल की प्रशंसा करने पर उन विषयों में पुरुष की
आकाङ्क्षा अधिक होने लगती है। इसका परिणाम यह होता है कि फलप्राप्ति के उपायों
को केवल क्लेशरूप फल को देने वाला मानकर उससे निवृत्त नहीं होता है, अतः अर्थवाद-
वाक्य से फल की प्रशंसा या प्रशस्तता अर्थात् सौन्दर्य-बोधन करने पर पुरुष की प्रवृत्ति
बलवती हो जाती है। पुरुष की प्रवृत्ति बलवती होने पर विधिशक्ति भी अव्याहत होती
है। इसलिए अर्थवाद विधिशक्ति का उत्तम्भक या उत्तेजक होता है। "वायव्यं श्वेतमाल-
भेत पशुकामः” (तै० सं० २।१।१।१) “अभ्युदय की कामना रखने वाला व्यक्ति वायु-
देवता के उद्देश्य में श्वेत छाग का वध करे", इस विधिवाक्य को सुनकर प्रथमतः पुरुष
की क्रिया में प्रवृत्ति अवश्य होती है, किन्तु, अनन्तर, अनिष्ट की उत्प्रेक्षाकर प्रवृत्ति से
निवृत्त हो जाता है, अतः बाद की श्रुति में कहा है "वायुर्वे क्षेपिष्ठा देवता" वायु अति-
क्षिप्र 'शीघ्रगामी' देवता है अर्थात् यतः वायु देवता क्षिप्रतम है, अतः, वायु जिस यज्ञ का
देवता होता है, उस यज्ञ का फल भी अतिक्षिप्री अर्थात् शीघ्र ही होता है। इस अर्थवाद
वाक्य को सुनने पर अनिष्ट की आशङ्का से स्तम्भित प्रवृत्ति पुनः तीव्र हो जाती है,
इसलिए, विधिवाक्य वैधविषय में पुरुष की प्रवृत्ति को उत्पन्न कराने के लिए अर्थवाद
की अपेक्षा करता है और अर्थवाद वाक्य स्वयं निरर्थक होने पर भी अर्थात् निष्प्रयोजन
होने से विधिविहित प्रयोजनों के द्वारा अपनी प्रयोजनीयता का निर्वाह करने के लिए
विधि की अपेक्षा करते हैं। इस प्रकार विधिवाक्य और अर्थवाद 'नष्टाश्वदग्ध-
रथन्यायः'१' से परस्पर मिलकर एक प्रयोजन का निर्वाह करते हैं। इसी प्रकार
निन्दात्मक अर्थवाद वाक्य भी निषेध्य विषय की प्रशस्तता का बोधन कर निषेध्य विषय
से शीघ्र निवृत्ति करने के लिए साधन होता है, फलतः निषेध विधि की सहायता कर
१. मार्ग में दो व्यक्ति अपने-अपने रथ से कहीं की यात्रा कर रहे थे, भाग्यवश एक
व्यक्ति के रथ से घोड़ा भाग गया है, वह रथ को आगे ले जाने में असमर्थ थे,
दूसरे रथयात्री के पास घोड़ा था; किन्तु उसका रथ टूट गया था, वह भी आगे
की यात्रा में असमर्थ था, एक का रथ घोड़े के बिना निष्कर्म था और दूसरे का अश्व
रथ के बिना निष्कर्म था, इस सन्दर्भ में दोनों ने विचार किया कि एक का घोड़ा
और दूसरे का रथ परस्पर मिलाकर उपयोग में लिया जाय तो दोनों का प्रयोजन
सिद्ध हो सकता है। इसी प्रकार अर्थवाद वाक्य और विधिवाक्य परस्पर मिलकर
एक ही प्रयोजन के सिद्ध कराने में समर्थ होते हैं।