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मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

Meghadutam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished335 पृष्ठ

प्रारंभिक पृष्ठ व विषय-सूची

कृष्णदास संस्कृत सीरीज
३०
****

महाकविकालिदासविरचितं

मेघदूतम्

‘इन्दुकला’ संस्कृत-हिन्दीव्याख्योपेतम्

व्याख्याकारः
श्री वैद्यनाथ झा शास्त्री

कृष्णदास अकादमी
वाराणसी

कृष्णदास अकादमी, वाराणसी

कृष्णदास संस्कृत सीरीज
३०
****

महाकविकालिदासविरचितं

मेघदूतम्

‘इन्दुकला’ संस्कृत-हिन्दीव्याख्योपेतम्

व्याख्याकार:
श्री वैद्यनाथ झा शास्त्री


कृष्णदास अकादमी
वाराणसी

कृष्णदास अकादमी, वाराणसी

प्रकाशक : कृष्णदास अकादमी, वाराणसी
मुद्रक : चौखम्बा प्रेस, वाराणसी
संस्करण : चतुर्थ, सन् २००२
मूल्य : पूर्वमेघ ३५.००
संपूर्ण ६०.००

<br>

© कृष्णदास अकादमी
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के. ३७/१८८, गोपाल मन्दिर लेन
गोलघर (मैदागिन) के पास, वाराणसी-२२१ ००१ (भारत)
फोन : ३३५०२०
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अपरं च प्राप्तिस्थानम्
चौखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस
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गोलघर (मैदागिन) के पास, वाराणसी-२२१ ००१ (भारत)
फोन : ३३३४५८ (आफिस), ३३४०३२ एवं ३३५०२० (आवास)

KRISHNADAS SANSKRIT SERIES

30


MEGHADŪTAM

Of

MAHĀKAVI KĀLIDĀSA

with
'Indukalā' Sanskrit-Hindi Commentaries

By

Sri Vaidyanath Jha


कृष्णदास अकादमी
वाराणसी

KRISHNADAS ACADEMY, VARANASI

Publisher : Krishnadas Academy, Varanasi.
Printer : Chowkhamba Press, Varanasi.
Edition : 4rth, 2002


© KRISHNADAS ACADEMY

Oriental Publishers & Distributors
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K. 37/118, Gopal Mandir Lane
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समर्पणम्

स्निग्धामुदारमधुरां विलसत्प्रसादां
विश्रामधामपुलिनां विशदार्थधाराम् ।
हंसावगाहनरसां नितरामगाधा—
माराधयामि कविराजसरस्वतीं ताम् ॥ १ ॥

श्री-कालिदासरसपिच्छिलकाव्यमार्गे
प्रस्थानकौतुकमतीव शिशुत्वमेव ।
जानन्नपि स्फुटमिदं पुनरेव गन्तु—
मालम्ब्य सद्गुरुकराङ्गुलिमुद्यतोऽस्मि ॥ २ ॥

स्वाभाविकं स्खलनमेव पदे पदे मे
सम्भाव्यते यदपि दुर्जनहासहेतुः ।
स्मृत्वा सतां परमपारकृपामकम्पा—
माश्वासनादकरवं ललितार्थटीकाम् ॥ ३ ॥

श्रोतुर्विमुग्धमतिविभ्रममारहन्तीं
चित्रां पटीमिव नटीमिव नाटकस्य ।
वाचं निवेदयति सो विपुलार्थलक्ष्मीं
स्मेराननं तमनिशं गुरुमानतोऽस्मि ॥ ४ ॥

कीर्तिर्धुरि-स्फुरति नामनि यस्य शश्व—
दानन्द एव चरमावयवं बिभर्ति ।
तस्मै सुधीन्द्रतिलकाय सुदेशिकाय
टीकामिमामुपहरत्यथ वैद्यनाथः ॥ ५ ॥

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२ मे० दू० भू०

—: व्याख्यातृमङ्गलाचरणम् :—

शृङ्गार-दैवतमनन्तगुणाभिरामं
रामानुजं हृदयरञ्जनमञ्जनाभम् ।
नेत्रामृतं निरुपमं वृषभानुजाया
ध्वान्तापहं किमपि धाम नमामि कृष्णम् ॥ १ ॥

विद्याविनोदरसिकं मधुरं निसर्गा-
दन्तेवसत्स्वतुलवत्सलमेव सत्सु ।
आन्वीक्षिकीहृदयवल्लभमार्यकीर्त्या-
नन्दाभिधं गुरुवरं प्रणमामि भक्त्या ॥ २ ॥

यस्मिन् प्रसीदति, निषीदति भाग्यलक्ष्मी-
रुत्सृज्य दैवहतकं गमनोत्सुकापि ।
जागर्ति सुप्तनियतिः शरणागतानां
तं पूज्यपूजितगुरुं शरणं प्रपद्ये ॥ ३ ॥

श्रीमत्कवीन्द्रकलकीर्तिकृताग्रदूतं
शश्वद्रसोर्मिशतमेदुरमेघदूतम् ।
व्याख्यातुमाश्रयति सद्गुरुदत्तविद्यां
हृद्यामवद्यरहितामिह वैद्यनाथः ॥ ४ ॥

भूमिका

संस्कृत साहित्य से सम्बद्ध ऐसा कौन व्यक्ति होगा जो स्वनामधन्य सर्वमूर्धन्य कवि एवं सुनिपुण नाटककार कविकुल-गुरु “कालिदास” को न जानता हो। जिनका यशःसौरभ शकुन्तलानाटक के माध्यम से समस्त विश्व को सुवासित कर रहा है, जिनकी काव्य-मधुरिमा पर क्या प्राच्य और क्या भारतीय समस्त सहृदयगण लट्टू हैं। “कविकुलमूर्धन्य” नाम वाली पगड़ी जिनके सम्पर्क में सार्थक हुई उन कविकुल-सुधाकर “कालिदास” को कौन नहीं जानता ? आपकी प्रतिभा सर्वतोमुखी है, खण्डकाव्य, महाकाव्य और नाटक सर्वत्र ही आपकी कवित्व-शक्ति पूर्णरूप से परिपक्व दिखाई पड़ती है। आप भारत के ही नहीं अपितु समस्त विश्व के महाकवियों में सर्वप्रथम गिने जाने वाले महाकवि हैं। काव्य के तीनों विधाओं में आपके समान विश्व का कोई भी कवि ऐसा मनोरम काव्य-प्रणयन नहीं कर सका। प्रकृति के मनोरम चित्रण करने में एवं अपनी रचनाओं के पात्रों के चरित्र का असाधारण चित्रण करने में महाकवि अद्वितीय हैं। इनकी रचनाओं में नाट्यकला की सुन्दरता का अवलोकन कीजिए या महाकाव्य का वर्णन-सौन्दर्य देखिये अथवा गीतिकाव्य के सरस करुण हृदयोद्गारों का आनन्द लीजिए, सब उपर्युपरि है। महाकवि में वह अप्रतिम चमत्कार है जिस पर समस्त विश्व आश्चर्यान्वित हो रहा है, इनमें ऐसी ब्रह्माण्डव्यापिनी सर्वातिशायिनी प्रतिभा है जिसका एकत्र समागम संसार में दुष्प्राप्य है। आध्यात्मिक रहस्य का ऐसा सरस प्रतिपादन अन्यत्र दुर्लभ है। इनकी शान्तिप्रदायिनी उपदेशमयी कविताकौमुदी जिज्ञासुजन के जिज्ञासातप्त हृदय को आनन्द-सागर की लहरों में ऐसा डुबो देती है कि उससे निकलने का नाम नहीं लेना चाहता।। इनकी कविता में अपनी शकुन्तला की तरह अनाघ्रात पुष्प की ताजगी, अखण्डित किसलयों की कोमलता, अनास्वादित रस का माधुर्य तथा अखण्ड सौभाग्यशाली पुण्यों के फल की पवित्रता आदि का समवाय मिलता है। इस कलाकार की कला में केवल रसिकता ही नहीं अपितु समाज-विज्ञान का भी अपूर्व एवं अद्भुत दर्शन होता है। संस्कृत साहित्य के एकमात्र

( ८ )

कालिदास ही ऐसे कवि हैं जिन्होंने अपनी कविता में अपने युग की चेतना को रूपायित किया है (बाण को छोड़कर)। इनका काव्य भारत के प्राचीन इतिहास के देदीप्यमान युग का प्रकाश-स्तम्भ और पौराणिक ब्राह्मण-धर्म तथा वर्णाश्रम धर्म का वास्तविक प्रतीक है।

जीवन :—दुःख है कि हम अपने इस महाकवि के जीवन के विषय में 'इदमित्थम्' नहीं कह सकते क्योंकि ऐसा कोई निश्चयात्मक प्रमाण उपलब्ध नहीं हो सका है। महाकवि स्वयं इतने बड़े निरभिमानी थे कि अपने सम्बन्ध में इन्होंने नाम के प्रयोग को छोड़कर और कुछ लिखा ही नहीं। आत्मश्लाघा से ये कितनी दूर रहते थे एवं ये कितने विनम्र थे इसका परिचय हमें इनके रघुवंश महाकाव्य के निम्नलिखित पद्यों में मिलता है—

क्व सूर्यप्रभवो वंशः क्व चाल्पविषया मतिः।
तितीर्षुर्दुस्तरं मोहादुडुपेनास्मि सागरम्॥
मन्दः कवियशः प्रार्थी गमिष्याम्युपहास्यताम्।
प्रांशुलभ्ये फले लोभादुद्बाहुरिव वामनः॥
रघूणामन्वयं वक्ष्ये तनुवाग्विभवोऽपि सन्।
तद्गुणैः कर्णमागत्य चापलाय प्रचोदितः॥ (रघु०, १–२।३।९॥)

अतः ये कब और कहाँ उत्पन्न हुए? ऐसे महारत्न का जन्म किस स्तुत्य दम्पति ने दिया, एवं ये कब परलोक सिधारे—इन सब बातों का समुचित एवं सन्तोषप्रद उत्तर हमें नहीं प्राप्त हो सका है।

ऐसी जनश्रुति है कि महाकवि पहले महामूर्ख थे। किसी शारदानन्द नामक राजा की पुत्री विद्योत्तमा विदुषी एवं परम-सुन्दरी थी। अपनी विद्या के गर्व के कारण उसने 'शास्त्रार्थ में जो पुरुष मुझे परास्त करेगा उसी से मैं अपना विवाह करुँगी' ऐसी प्रतिज्ञा कर ली थी। तात्कालिक विद्वान् लोग उससे परास्त होकर ईर्ष्यावश उसका दर्प-भंग करने के लिए उसका विवाह किसी महामूर्ख से कराना चाहते थे, और सब मिलकर ऐसे मूर्ख को खोजने लगे। कहा जाता है कि कालिदास वृक्ष की डाल पर बैठकर उसी डाल को इस तरह काट रहे थे जिससे उसके कटने पर डाल सहित कालिदास भी धराशायी हो जाते। पण्डितों ने इनकी कार्यवाही को देखा और इन्हें महामूर्ख समझकर इन्हें नीचे उतरवाकर 'हमलोग तुम्हारा विवाह एक परम सुन्दरी राजकुमारी से

( ९ )

करवा देंगे तुम कुछ न बोलना हमलोग राजसभा में तुम्हारा परिचय ‘ये हमारे गुरुजी हैं’ इस तरह देंगे इत्यादि बातें समझाकर अपने साथ ले गये। राजसभा में जाकर पण्डितों ने इनका पूर्वनियोजित ढंग से परिचय दिया तथा शास्त्रार्थ के लिए राजकुमारी को कहा एवं यह भी सूचित कर दिया कि ‘इस समय हमारे पूज्य गुरुवर ने मौन व्रत ले रखा है अतः शास्त्रार्थ साङ्केतिक ( इशारों से ) होगा।’ शास्त्रार्थ प्रारम्भ हुआ। विद्योत्तमा ने ‘ईश्वर एक है’ इस अभिप्राय से अपनी एक अंगुली उठाकर गुरुजी की तरफ दिखाया। गुरुजी ने ‘यह मेरी एक आँख फोड़ने का संकेत कर रही है’ ऐसा समझकर ‘मैं तुम्हारी दोनों आँखें फोड़ दूँगा’ इस अभिप्राय से अपनी दो अंगुली ऊपर उठाकर राजकुमारी को दिखाया। इस पर गुरुजी के शिष्यों ने एकजुट होकर ऐसा तर्क-कुतर्क प्रस्तुत किया कि विद्योत्तमा को परास्त होना पड़ा। अन्ततः इनका विवाह राजकुमारी से हो गया। कहा जाता है कि सुहागरात के शुभावसर पर बाहर कोई ‘ऊँट’ चिल्लाया और विनोद के लिए राजकुमारी ने अपने पति से किमिदम् ( यह क्या है ) ? ऐसा पूछा। उस मूर्ख ने पत्नी के प्रश्न को सुनकर घबराकर या उच्चारण की असमर्थता से ‘उट्रोऽयम्’ ऐसा उत्तर दिया। राजकुमारी पण्डितों के षड्यन्त्र को समझकर अपने दुर्भाग्य पर पछताती हुई पति महोदय को अपमानित कर राजभवन से निकाल दिया। उस मूर्ख के लिए पत्नी का अपमान असह्य था। अतः उसने विद्या-प्राप्ति के लिए किसी ‘काली मन्दिर’ में जाकर आमरण उपासना प्रारम्भ कर दी। काली ने प्रसन्न होकर वर माँगने को कहा, उस मूर्ख ने ‘कवित्वपूर्ण विद्या दो’ ऐसा वर माँगा। भगवती के ‘एवमस्तु’ ऐसा कहकर अन्तर्धान हो जाने पर वह मूर्ख तत्क्षण सकल शास्त्र का पारङ्गत एवं अद्वितीय प्रतिभासम्पन्न विद्वान् हो गया। काली की उपासना के फलस्वरूप उन्हें विद्या मिली अतः उनका नाम ‘कालिदास’ पड़ा, ऐसा भी सुना जाता है। आगे यह भी किंवदन्ती है कि वरदान मिल जाने पर कालिदास को अपनी पत्नी के द्वारा किया गया अपमान भी स्मरण हो आया और उसका बदला लेने वे घर की ओर चले। जिस समय वे घर पहुँचे वह समय सम्भवतः रात का समय था अतः घर का द्वार बन्द था, उन्होंने बाहर से आवाज लगायी ‘अनावृतकपाटं द्वारं देहि’ ( बन्द किवार खोलो ) । विद्योत्तमा पति के स्वर से परिचित थी एवं पति की मूर्खता से भी, अतः उसने साश्चर्य पूछा—