मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनाथ-प्रभाव द्योतक पद ३०१
मिश्रित भाषाओं में प्राप्त पद
१
आपणा गिरधर के कारणे, (वा) मीराँ बैरागण हो गई रे ।
जब ते सिर पर जटा रखाई, नैणा नीद गई रे ।
दड कमंडल और गूदड़ी, सिर पर धार लई रे ।
छापा तिलक बनाये छवि सो, माला हात लिई रे ।
दोऊ कुल छोड़ि भई वैरागण, हरि सो टेर दई रे ।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, गोविन्द सरण भई रे ॥५४५॥†
पाठान्तर १,
आपणा गिरधर कै कारणै, मीराँ वैरागण भई रे ।
सिर पर जटा बधाई, नैणा नीद गई रे ।
दड कमडल और गूदडी, सिर पर धार लई रे ।
छापा तिलक बनाये छवि सो, माला हात लई रे ।
दोऊ कुल छोड़ि भई वैरागण, हरि सो टेर दई रे ।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, गोविन्द सरण भई रे ।†
पाठान्तर २,
अपणै प्रीतम के कारणै, मीराँ वैरागण भई रे ।
जब तै सीस पै जटा रखाई, नैणा नीद गई रे ।
दोऊ कुल छाँड भई वैरागण, हरि सो टेर देई रे ।
छापा तिलक तुलसी की माला, कुल की लाज गई रे ।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, गोविन्द सरण लई रे ।†
पाठान्तर ३,
अपने प्रीतम के कारणै, वा मीराँ वैरागन हो गईं रे ।
जब से सिर पर जटा बिठाई, नैनन नीद गई रे ।