मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३०० मीराँ-वृहद्-पद-संग्रह
उपर्युक्त परिस्थिति मे प्रथम पद ही .प्रामाणिकता के अधिक
निकट पडता प्रतीत होता है । अभिव्यक्ति के आधार पर यह पद विशेष
.विचारणीय है ।
१.२
जोगियो आणि मिल्यो अनुरागी ।
ससा सोक अंग नहि त्रिसना, दुबध्या¹ सब ही त्यागी ।
मोर मुगट पीताम्बर सोहैं, स्याम बरन बडभागी ।
जनम जनम को साहिब म्हाँरो, वाही सो लौ लागी ।
अपणा पिव सो हिलमिल खेलाँ, हरि दरशन अनुरागी ।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, अब मै भई सुभागी॥५४४॥†
पाठान्तर १,
जोगियो आणि मिल्यो अनुरागी ।
ससय सोक अग नहि त्रिसना, दुबध्या सब ही त्यागी ।
मोर मुकुट पिताम्बर सोहै, स्याम बरन बड भागी ।
जनम जनम को मित्र हमारो, अधर सुधारस पागी ।
अपणा पिय सूँ हिलमिल खेलाँ, हरि दरशन अनुरागी ।
मीराँ तो गिरधर मनमानी, अब तो भई है सुभागी ।†
नाथ प्रभाव द्योतक सम्पूर्ण पदो मे यही एक ऐसा पद है जिसमे
मिलन और तद्जन्य आनन्द की अभिव्यक्ति हुई है । इस पद की एक
और विशेषता भी है । अन्य सभी नाथ प्रभाव द्योतक पदो मे आराध्य
की वेशभूषा का वर्णन नाथ-परम्परानुसार सुसज्जित जोगी के अनुकूल
ही है, परन्तु यहाँ आराध्य का वर्णन वैष्णव-परम्परानुकूल है । उपर्युक्त
पदाभिव्यक्ति के अनुसार मीराँ के आराध्य 'जोगी' 'मोर मुकुट
पीताम्बर' ही धारण किए हुए है । द्वितीय पाठान्तर पर ब्रजभाषा
का कुछ विशेष प्रभाव स्पष्ट है । पद विशेष रूपेण विचारणीय है ।
१ दुविधा ।