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मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary

भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा

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१०२ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
ही राणा को यह मालूम होता है त्यो ही वे सदेशवाहक को भेजकर मीराँ
को लौटाने का निष्फल प्रयास करते हैं। उपर्युक्त पदाभिव्यक्ति से
मीराँ का मेडता जाना ही सिद्ध होता है। इस तरह का विरोधाभास
उपस्थित करने वाला यही एक पद प्राप्त है। मीराँ द्वारा किया गया
गृह-त्याग मेडते से ही हुआ ऐसा वर्णन अन्य कुछ पदो मे भी मिलता है।
प्राप्त इतिहास मे यही एक ऐसा पहलू है जिस पर सभी विद्वान् एक स्वर
से सहमत है। साथ ही, यही एक ऐसा पहलू है जहाँ के प्राप्त वृत्तान्त
और प्राप्त पदो की अभिव्यक्ति मे समन्वय होता है। अस्तु पूर्वापर
सबध पर दृष्टि रखते हुए, यही पदाभिव्यक्ति विशेष प्रामाणिक
प्रतीत होती है।

११

गरुड चढ हरि आंए मीराँ के पास ।
आनन्द तूर बजाय के, पूरी मन की आस ।
राणा मोपर कोपियो, म्हॉरी तक तक सेज ।
लाज लागे छे म्हाँको, दीजो पीहर भेज ।
मीराँ महल से ऊतरी, राणे पकरियो हाथ ।
हथलेवा रो नात रो, परत न मानूं बात ।
मीराँ रथ सिणमार के, ऊँटा कसिया थात ।
डावो मेल्याँ मेडतो, पेलाँ पोखर जात ।
कुल की तारण अस्तरी, मुरड़ चली राठौड़ ।
राणा मो पर कोपिया, रती न राख्यो मोद ।
ले जाती बैकुण्ठ मे, समझ्यो नही सिसोद ।
मीराँ मुक्त दुहेलडी राम की, जैसे खाँडे की धार ।
कोई सन्त जन बिरला, ऊतरे भव कें पार ।
मीराँ ने प्रभु गिरिधर मिलियो, नागर नन्दकिसोर ।
तन मन् धन सब अरपिया चरण कमल की ओर ॥१७४॥†

पद मे पूर्वापर संगति का अभाव है। प्रथम दो पक्तियो की भाषा
खड़ी बोली से प्रभावित है। राजमहलो मे अप्रिय स्थिति के कारण