मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसंघर्षोभिव्यक्ति १०१
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म्हाने बोल्याँ मति मारो जी राणा यो लैइ थारो देस ।
मीराँ महलाँ से ऊतरी कोई सात सहेल्या माय ।
खेलत पायो काँकरो कोई सेवा सालगराम ।
साध जी आया पावणा¹ कोई मीराँ के दरबार ।
जाजम² दीनो बैसणो³ कोई ढाल्यो⁴ दीनो ढाल⁵ ।
जैर पियालो राणां जी भेज्यो झ्झो मीराँ ने प्याय ।
कर चरणामृत पी गई मीराँ, थे जाणो दीनानाथ ।
साँप पिटारो राणा जी भेज्यो, दीज्यो मीराँ ने जाय ।
कर खगवालो⁶ पहिरियो कोई हो गयो नोसर हार ।
राणा जी कागद भेजियो कोई द्यो⁷ मीराँ ने जाय ।
साधॉ की सगत छोड़ द्यो मीराँ बैठो राण्या रे भाय ।
काढ कटारो राणा जी भेज्यो, दूजी भेजी तरवार ।
एक मीराँ की दोय करा, दो की हो गई च्यार ।
राणो मीराँ से यो कहे जी, किस्यो⁷ थाँरो भगवान ।
राज पाट सब छोडस्याँ कोई म्है भी भजा भगवान ।
कच्चो रग उड जाय जै छी, पक्को रंग नही जाय ।
मीराँ कै रग गोपाल को जी, अब छुटना को नाय ।
म्हॉने ताना मत मारो हो, राणा यो लेइ थारो देस ।
।।१७३।।†
प्राप्त इतिहास के अनुसार मेडता और उसके आसपास की भूमि
“मीराँ बाई रो देस” कहलाता है। अत उपर्युक्त पदाभिव्यक्ति और
पदो से सर्वथा भिन्न पडती है। अन्य पदाभिव्यक्तियो के आधार पर
यही स्पष्ट होता है कि मेडता जाने के हेतु ही मीराँ चित्तौड त्याग
करती है। परन्तु मेडता न जाकर सीधे द्वारका चली जाती है। ज्यो
१ अतिथि, २ दरी, ३ आसन, ४ मूँज के बनाये हुए छोटे पलग, मचिया,
५ बिछा दिया, ६ सर्प, ७ कौन सौ।