मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९४ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
कैसे तोडूँ राम सों म्हारो भो भो रो भरतार ।
संसारी निन्दा करे, रूठो सब परवार१।
कुल सारोड लजाइयौ, मीरा बाई बहै अकरार२।
भक्त हीन पापी घणा राणा के दरबार ।
⁻ के तो विवग प्याला प्याय द्यो, के डाली कठहार ।
राणो जी विषण प्याला मोकल्यां३, दीज्यो मीरा रे हाथ ।
मे तो चरणामृत कर पी गइ अब थे जाणो म्हारा नाथ ।
मीरा विष का प्याला पी गई सोती खूँटी तान४।
म्हारो दरद दिवाणो सावरो, म्हाने दौडि जगावेलो आन ॥
॥१६५॥
इस पद के साथ निम्नांकित पंक्तिया और भी पाई जाती है।
राम नाम मेरे मन बसियो, रसियो राम रिझाऊ ए माय ।
म मद भागिन करम अभागिन कीरत कैसे गाऊ ए माय ।
बिरह पिजड की बाड सखी री, उठकर जी हुलसाऊ ए माय ।
उपर्युक्त तीन पंक्तिया सत मत से प्रभावित एक अन्य पद का
प्रथमांश है। अत इनको तो इस पद से निश्चित रूपेण हटाया जा
सकता है।
३
म्हारे हिरदे लिखयो हरिनांव, अब मेना बिसरूं।
मीराँ गढ सूं उतरी जी छापा तिलक बणाय ।
पगा बजावता घूँघरूं जो हाथ बजावतां ताल।
माला कंठी दो लडो सील बरत सिणगार ।
जो कोई हिरदै बस जी, जो कोइ आवणहार ।
१ परिवार, २ बेकरार, सम्पूर्ण सीमाओ को तोडकर, ३ भेजा, ४ खूंटी
तानकर सोना, सर्वथा निश्चिन्त होकर सोना।