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मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary

भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा

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द्वारा किये गये विष-पान की कथा भी भ्रमजनक रूप से ही दी गई है।
विष-पान से मीराँ की मृत्यु हो जाने, और मरतेमरते मीराँ का विष लाने
वाले मुसाहिब को श्राप देने की कथा भी देते हैं। मीराँ के इस श्राप से
उस मुसाहिब के वंश मे आज तक भी धन और जन की एक ही साथ
वृद्धि न होने की चर्चा भी करते हैं। तब भी, इस के बाद ही विष-पान
जैसी अप्रिय घटना के कारण राव बीरमदेव द्वारा मीराँ को बुला लिये
जाने की चर्चा भी करते हैं। मीराँ द्वारा की गई तीर्थ-यात्राओ की भी
चर्चा करते हैं। उनके मतानुसार सम्भवत मीराँ ने दो बार तीर्थ-यात्रा
की थी। पहली बार गृह-त्याग के पूर्व और दूसरी बार गृह-त्याग के बाद।
दूसरी बार भी वे सम्भवत वृन्दावन होती हुई ही द्वारिका जाती हैं।
भूरिदान भाट के कथन के आधार पर वे मीराँ का मृत्यु संवत् १६०३
मानते हैं। उपर्युक्त संक्षिप्त विवेचना से मुंशीजी के कथन की अपूर्णता
सिद्ध हो जाती है।
फिर भी अन्य सामग्री के नितान्त अभाव के कारण प्राय सभी आधुनिक
विद्वानो ने मुंशी जी के मतको ही आधार माना। इस आधार पर अपनी
अपनी विवेचना के अनुसार घटना-क्रम के सवतो मे कुछ अन्तर पड़ता है। कुछ
विद्वान मीराँ का जन्म वि० १५५५ स० मानते हैं तो अन्य वि० १५६० स०।
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र मीराँ का मृत्यु संवत् वि० १६३० स० तक खीच ले जाते हैं।
वे भी मेवाड के राजघराने से प्राप्त सामग्री को ही अपने कथन का आधार
बताते हैं। गुजराती साहित्यकारो ने कर्नल टाड का ही समर्थन किया है।
बगाल की जनश्रुति व कलाकार-वर्ग भी कर्नल टाड का समर्थन करते हुए
मीराँ को राणा कुम्भ की रानी व राव दूदा जी की पुत्री मानते हैं।
प्रसिद्ध इतिहासकारो ने भी अपने अपने विभिन्न ग्रन्थो मे मुंशी जी का
ही समर्थन किया। अद्यावधि प्राप्त राजस्थान का इतिहास भी अपूर्ण ही है।
[कविराजा श्यामलदास कृत 'वीर-विनोद', स्व० विद्वान ओझा जी लिखित 'उदयपुर
राज्य का इतिहास' और श्री हरिविलास सारडा लिखित महाराणा सांगा मे,
प्राप्त विभिन्न उद्धरण परस्पर विरोधात्मक ही हैं।] [मीराँ-स्मृति-ग्रंथ' की
भूमिका लिखते हुए श्री रामप्रसाद त्रिपाठी लिखते हैं, “मीराँ का विवाह
राणा सांगा के किसी राजकुमार से हुआ। ओझा जी का अनुमान है कि -
• उसका नाम भोजराज था।” अत सहज ही सशय की स्थिति उत्पन्न हो
जाती है।]