मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
पञ्चविंशोऽध्यायः 卐 मण्डपसभाविधानम् ३३७
मत्स्यं कृत्वा युग्मयुग्मं द्विपाश्र्वात्
षट्कोणं स्यात्पातयेत्सूत्रषट्कम् ॥५०॥
छः कोण का कुण्ड—( चतुष्कोण ) कुण्ड के क्षेत्र को पाँच भागों में बाँटना
चाहिये। एक वृत्त इस प्रकार खींचना चाहिये, जिससे उसकी परिधि उन पाँच भागों
से अधिक हो। इसके पश्चात् प्रत्येक भाग में मत्स्य की आकृति निर्मित करनी चाहिये।
इस प्रकार छः सूत्रों के द्वारा षट्कोण कुण्ड निर्मित होता है॥५०॥
✺ पद्मकुण्डम् ✺
वृत्तं कृत्वा पूर्ववत्तस्य मध्ये
वृत्तं भ्राम्यं यत्र यन्मध्यतस्तत् ।
पद्मस्याकारं यथा कर्णिकादीन्
कुर्याद्विद्वान् पद्मकुण्डं क्रमेण ॥५१॥
पद्माकार कुण्ड—पूर्ववर्णित विधि से वृत्त बनाकर उसके मध्य में एक वृत्त
निर्मित करना चाहिये। इसके पश्चात् मध्य से प्रारम्भ करते हुये पद्म का आकार एवं
कर्णिका आदि जिस प्रकार बनें, उस प्रकार विद्वान् को पद्मकुण्ड निर्मित करना चाहिये।
✺ अष्टास्रकुण्डम् ✺
क्षेत्रव्यासे षट्चतुर्भागिकेऽस्मिन्
भागं बाह्ये न्यस्य सूत्रं समन्तात् ।
कोणस्यार्धं कोणकाभ्यां तु लेख्यं
ह्यष्टास्रंस्यादष्टसूत्रप्रयोगात् ॥५२॥
अष्टकोण कुण्ड—कुण्ड के क्षेत्र को चौबीस भागों में बाँटना चाहिये। एक भाग
बाहर रहे, इस प्रकार एक वृत्त खींचना चाहिये। दोनों कोणों से एवं कोणों के अर्ध
भाग से आठ सूत्रों ( रेखाओं ) से अष्टकोण कुण्ड निर्मित करना चाहिये॥५२॥
✺ सप्तास्रकुण्डम् ✺
तारे पङ्क्त्यंशेंऽशकं न्यस्य बाह्ये वृत्तं भ्राम्यं क्षेत्रकेऽष्टाष्टभागे ।
सैकैर्वेद्राष्टांशकैः पट्टदैर्घ्यं सप्तास्रं स्यात् सप्तसूत्रप्रयोगात् ॥५३॥
सप्तकोण कुण्ड—कुण्ड के क्षेत्र को दस भागों में बाँटना चाहिये। उसमें एक
वृत्त इस प्रकार खींचना चाहिये, जिससे एक भाग क्षेत्र के बाहर रहे। सात सूत्रों के
प्रयोग से सप्तकोण कुण्ड निर्मित होता है, जिसका पट्टदैर्घ्य ( सातों कोणों का माप )
तैंतीस हो एवं क्षेत्र का माप चौंसठ हो॥५३॥
मय०-२२
३३८ मयमतम्
✵ पञ्चास्रकुण्डम् ✵
व्यासे सप्तांशेंड'शकं न्यस्य बाह्ये वृत्तं भ्राम्यं क्षेत्रतारे युगांशे ।
पट्टायामं त्रिप्रभागैरनेन पञ्चास्रं स्यात् पञ्चसूत्रप्रयोगात् ॥५४॥
पञ्चकोण कुण्ड—कुण्ड के क्षेत्र को सात भागों में बाँटना चाहिये एवं उसमें
एक वृत्त इस प्रकार खींचना चाहिये, जिससे उसका एक भाग बाहर रहे। पाँच सूत्रों
के द्वारा पञ्चकोण कुण्ड बनाना चाहिये, जिससे पट्ट का आयाम चतुष्कोण का तीन
चौथाई हो।।५४।।
तत्तद्द्वेयोपात्तभागेषु तत्तद्भागं कृत्वा
प्रागिवैकैकभागे ।
न्यूनाधिक्येनास्त्रनाहस्य तुल्यं युक्त्या धीमान्
योजयेत्सर्वकुण्डम् ॥५५॥
प्राप्त भागों के उतने भाग करके पहले के समान एक-एक भाग कम या अधिक
करते हुये कोणों को परिधि के बराबर निर्मित करना चाहिये। इस प्रकार बुद्धिमान
स्थपति को सभी प्रकार के कुण्डों की योजना करनी चाहिये।।५५।।
भूते साङ्घ्रित्रिबीजं मुनिषु च नयनं षोडशेष्वांशयुक्तं
सत्र्यङ्घ्येकं नवांशे शिवपदविहिते सार्धकं सैकभानौ ।
साङ्घ्येकं बीजमेवोदितमथ तिथिके षोडशांशैकहीनं
सप्ताधिक्ये दशांशे नवदशपदकेऽष्टांशहीनं क्रमेण ॥५६॥
पाँच में तीन चतुर्थांशयुक्त एक भाग, सात में दो भाग, सोलह में पाँच भाग, नौ
में तीन चतुर्थांशयुक्त एक भाग, ग्यारह में डेढ़ भाग, तेरह में सवा एक भाग कहा
गया है। पन्द्रह में एक भाग कम एवं सोलह भाग, सत्रह भाग तथा उन्नीस भाग में
क्रमशः आठ भाग कम होना चाहिये।।५६।।
✵ सिद्धम् ✵
तदेव धाम्नामग्रे तु कर्तव्यं चेन्मसूरकम् ॥५७॥
स्तम्भप्रस्तरवर्गं च प्रासादाङ्गसमं मतम् ।
एकद्विद्वारयुक्तं वा कुड्यं कुम्भलतान्वितम् ॥५८॥
सिद्धमण्डप—यदि सिद्ध मण्डप को देवालय के सम्मुख स्थापित किया जाय
तो उसमें अधिष्ठान, स्तम्भ, प्रस्तर एवं वर्ग देवालय के अंग के समान होने चाहिये।
यह एक, दो या तीन द्वारों से युक्त हो एवं भित्ति पर कुम्भलता का अंकन होना
चाहिये।।५७-५८।।
पञ्चविंशोऽध्यायः 卐 मण्डपसभाविधानम् ३३९
एकद्वित्रिगुणस्तम्भव्यासं मध्ये तु भद्रकम्।
तोरणाढ्यं सुरोपेतसर्वावयवशोभितम् ॥५९॥
मण्डप के मध्य में भद्रक (पोर्च) निर्मित करना चाहिये, जिसका व्यास स्तम्भ
के व्यास का एक गुना (बराबर), दुगुना या तीन गुना रखना चाहिये। इसे तोरण से
युक्त, सभी अंगों एवं देवों की आकृतियों से युक्त निर्मित करना चाहिये ॥५९॥
धाम्नस्तु भित्तिविष्कम्भसमं वार्धार्धहीनकम्।
त्रिभागैकविहीनं तद्भित्तिविष्कम्भमिष्यते ॥६०॥
सान्तरालं सवेशं च सर्वेषां सद्मनां मुखे ।
मण्डप की भित्ति का विष्कम्भ (मोटाई) प्रधान भवन (या देवालय) की मोटाई
के बराबर तीन चौथाई अथवा तीन में दो भाग के बराबर होना चाहिये। यह सभी भवनों
के सम्मुख अन्तराल (मार्ग) से युक्त एवं वेश (आच्छादित स्थल) से युक्त होना
चाहिये ॥६०॥
✵ पद्मकम् ✵
चतुरस्रं चतुर्भक्त्या चतुर्द्वारसमन्वितम् ॥६१॥
मुखेऽमुखे द्विभक्त्यैकभक्त्या विस्तारनिर्गमम् ।
मध्यमस्तम्भकं त्यक्त्वैवोर्ध्वकूटं द्विभक्तिकम् ॥६२॥
पद्मक—चौकोर क्षेत्र को चार भक्ति (इकाई माप) एवं चार द्वार से युक्त करना
चाहिये। मुखभाग एवं पृष्ठभाग पर दो भक्ति एवं एक भाग से निर्गम का विस्तार रखना
चाहिये। मध्य भाग में स्तम्भ नहीं होना चाहिये एवं दो भक्ति से ऊर्ध्वकूट का निर्माण
करना चाहिये॥६१-६२॥
षट्त्रिंशत्पादसंयुक्तं चतुस्सप्ताल्पनासिकम् ।
सोपानं स्याच्चतुर्दिक्षु लाङ्गलाकारभित्तिकम् ॥६३॥
पञ्जरैरष्टभिर्युक्तं पद्मकं पद्मकप्रभम् ।
स्नानार्थं तैतिलानां तु प्रासादाभिमुखे मतम् ॥६४॥
तदेवैकाननोपेतं मध्याङ्गणसमन्वितम् ।
यागादिकर्मयोग्यं स्याद्दिष्टतो दिशि वारणम् ॥६५॥
इसमें तिरेसठ स्तम्भ तथा अट्ठाईस अल्पनासिकायें (छोटी सजावटी खिड़कियाँ)
होनी चाहिये। चारों दिशाओं में सोपान होने चाहिये एवं लाङ्गल के आकार की भित्ति
होनी चाहिये। आठ पञ्जर (सजावटी अंग) होने चाहिये। पद्मक (कमलपुष्प के समान)
३४० मयमतम्
इस मण्डप की संज्ञा पद्म है। देवालय के सम्मुख यह मण्डप देवों के अभिषेक के
लिये प्रशस्त होता है। यह एक मुख वाला हो तो मध्य में आँगन होना चाहिये। यह
यज्ञकार्य के अनुकूल होता है एवं आठों दिशाओं में वारण ( किसी भी दिशा में ) हो
सकता है।।६३-६५।।
✺ भद्रकम् ✺
भद्रकं पञ्चभागेन चतुरस्रसमाकृति ।
मध्ये कूटं त्रिभागेन परितोऽशेन मण्डपम् ।।६६ ।।
द्वात्रिंशत्पादसंयुक्तं चतुर्विंशतिनासिकम् ।
पञ्जरैरष्टभिर्युक्तं कुड्यं कुम्भलतान्वितम् ।।६७।।
भद्रक—भद्रक मण्डप चौकोर होता है एवं इसका माप पाँच भाग रक्खा जाता
है। मध्य भाग में तीन भाग से कूट एवं चारो ओर एक भाग से मण्डप निर्मित होता
है। यह बत्ती स्तम्भों एवं चौबीस नासिकाओं से युक्त तथा आठ पञ्जरों से युक्त होता
है। भित्ति कुम्भलता से सुसज्जित होती है।।६६-६७।।
चतुर्दिक्षु चतुर्द्वारं कर्णे लाङ्गलभित्तिकम् ।
मध्यमेऽङ्गणयुक्तं वा त्रिभक्त्या विस्तृताङ्घ्रिकम् ।।६८।।
धाम्नः स्थलसमं तस्य पङ्क्त्यष्टांशोनमेव वा ।
नृत्तमण्डपमेतत् स्यात् स्नानार्थं वा तदेव हि ।।६९।।
चारो दिशाओं में चार द्वार एवं कोनों पर लाङ्गलभित्ति ( हल के आकार की भित्ति )
होनी चाहिये। अथवा मध्य भाग में आँगन हो एवं तीन भक्ति ( तीन ईकाई ) विस्तार
वाले स्तम्भों से युक्त रखना चाहिये। मण्डप को भवन के सतह के बराबर; दस या
आठ भाग कम रखना चाहिये। यह मण्डप ( देवादिकों के ) स्नान के लिये एवं नृत्य
के लिये अनुकूल होता है।।६८-६९।।
✺ शिवम् ✺
षड्भक्ति चतुरस्राभं मध्येऽष्टस्तम्भकूटकम् ।
द्विभक्तिविस्तृतं चैकभक्त्या निष्क्रान्तवक्त्रकम् ।।७०।।
षष्ट्यङ्घ्रिकसमायुक्तं त्यक्तमध्यस्थपादकम् ।
चतुर्विंशतिनास्यङ्गं सर्वालङ्कारसंयुतम् ।।७१।।
शिवाख्यं मण्डपं सर्ववासे योग्यं सनातनम् ।
शिव-मण्डप—यह छः भक्ति वाला चौकोर मण्डप होता है। इसमें आठ स्तम्भ
पञ्चविंशोऽध्यायः 卐 मण्डपसभाविधानम् ३४१
एवं कूट होते हैं। यह दो भक्ति विस्तृत होता है एवं एक भाग से वक्रनिष्क्रान्त निर्मित
होता है। इसमें मध्य भाग को छोड़कर साठ स्तम्भ, चौबीस नासियाँ होती हैं एवं यह
सभी अलङ्कारों से सुसज्जित होता है। शिव नामक यह मण्डप सभी भवनों के लिये
सदा उपयुक्त होता है।।७०-७१।।
✺ वेदम् ✺
सप्तांशचतुरस्राभं षष्ट्यङ्घ्रिसमावृतम् ।।७२।।
नवभागेन तन्मध्ये कूटं वा मण्डिताङ्गणम्।
सद्धात्रिंशतिनास्यङ्गं चतुर्दिशि सवारणम् ।।७३।।
वेद—यह चौकोर एवं सात भाग से युक्त होता है। यह साठ स्तम्भों से युक्त
होता है। उसके मध्य में नौ भाग से आँगन हो, जो कूट से अलंकृत हो ( अथवा खुला
हो ) सकता है। इसमें बत्तीस नासियाँ एवं चारो दिशाओं में वारण होता है।
त्रिभागैकांशविस्तारनिर्गमं मुखभद्रकम्।
मध्यरङ्गसमोपेतमिष्टदिग्गतभित्तिकम् ।।७४।।
आस्थानमण्डपं चैत्तैतिलानां महीभृताम्।
अभिषेकादिकार्येषु योग्यं वेदमिति स्मृतम् ।।७५।।
इस मण्डप को तीन भाग के माप वाले मुखभद्रक ( सामने पोर्च ) से युक्त करना
चाहिये, जिसमें एक भाग से निर्गम निर्मित हो। इसे मध्य रङ्ग से युक्त एवं इच्छित
दिशा में भित्ति से युक्त होना चाहिये। यह देवों एवं राजाओं का आस्थान मण्डप ( जहाँ
श्रोता-दर्शक बैठते हैं ) है एवं अभिषेक आदि कार्यों के लिये उपयुक्त होता है। इसे
वेद ( मण्डप ) कहा गया है।।७४-७५।।
✺ अलङ्कृतम् ✺
अष्टभक्त्या युगास्रं स्यादशीतिपादसंयुतम्।
चतुर्भागोर्ध्वकूटं तु द्विभागेन तु भद्रकम् ।।७६।।
चतुर्दिशि चतुर्द्वारं पार्श्वे सोपानसंयुतम्।
सर्वालङ्कारसंयुक्तमलङ्कृतमिति स्मृतम् ।।७७।।
अलंकृत—यह मण्डप चौकोर, आठ भक्तियुक्त एवं अस्सी स्तम्भों से युक्त होता
है। इसमें चार भाग से ऊर्ध्वकूट एवं दो भागों से भद्रक निर्मित होना चाहिये। चारो
दिशाओं में चार द्वार एवं बगल में सीढ़ी होनी चाहिये। सभी अलंकारों से युक्त इस
मण्डप को अलंकृत कहा गया है।।७६-७७।।
३४२ मयमतम्
तदेव जलपादं तु ब्रह्मस्थलमितीष्यते ।
परितो वारमेकांशं द्व्यंशेनावृतमण्डपम् ॥७८॥
पूर्ववन्मुखभद्रं स्यादिष्टदिग्गतभद्रकम् ।
ब्रह्मस्थाने विधातव्यं ग्रामादीनां सनातनम् ॥७९॥
इसके ब्रह्मस्थल ( केन्द्रभाग में ) जलपाद ( जल का स्थान ) हो सकता है, जिसके
चारो ओर एक भाग से पैदल चलने का मार्ग हो एवं दो भाग से ढँका हुआ मण्डप
निर्मित हो। मुखभद्र पूर्व-वर्णित रीति से हो एवं अभीप्सित दिशा में भद्रक निर्मित हों।
इसे ग्राम आदि के ब्रह्मस्थान ( केन्द्र ) में निर्मित करना चाहिये ॥७८-७९॥
दर्भम्
नवभक्तियुतं सम्यक् पङ्क्तिपङ्क्त्यङ्घ्रिकान्वितम् ।
त्र्यंशैकविस्तृतं भद्रं चतुर्द्वारसमन्वितम् ॥८०॥
सोपानं प्रमुखे तस्य कर्णे लाङ्गलभित्तिकम् ।
नवरङ्गैरलङ्कुर्यात् षडष्टैवाल्पनासिकम् ॥८१॥
नवब्रह्म सुपूज्यं तद् ग्रामवेश्मादिमध्यगम् ।
सर्वालङ्कारसंयुक्तं दर्भाख्यं तन्मनोहरम् ॥८२॥
दर्भ—यह मण्डप नौ भक्तिप्रमाण का एवं एक सौ स्तम्भों से युक्त होता है।
इसका भद्र तीन भाग विस्तृत ( तथा एक भाग से निर्गमयुक्त ) एवं चार द्वारों से युक्त
होता है, जो सोपान से युक्त होते हैं। उसके कोनों में लाङ्गल के आकार की भित्ति होती
है। इसे नौ रंगों से तथा अड़तालीस अल्पनासियों से सुसज्जित करना चाहिये। यह
नौ ब्रह्माओं ( ब्रह्मा के नौ ऋषिपुत्रों ) से पूजित एवं ग्राम तथा भवन आदि के मध्य में
होता है। सभी अलंकारों से युक्त दर्भसंज्ञक मण्डप अत्यन्त सुन्दर होता है।
✺ कौशिकम् ✺
दशांशचतुरस्त्राभं सद्वादशशताङ्घ्रिकम् ।
नवकूटसमायुक्तमेकैकांशान्तरालकम् ॥८३॥
एतत् कौशिकमित्युक्तं चतुरस्रं तु जातिकम् ।
नन्दमेकानने भद्रं द्विमुखं भद्रकौशिकम् ॥८४॥
त्रिमुखं जयकोशं स्यात् पूर्णकोशं चतुर्मुखम् ।
अधिष्ठानाङ्घ्रिवत् कर्णे लाङ्गलाकारभित्तिकम् ॥८५॥
सर्वालङ्कारसंयुक्तं षडष्टैवाल्पनासिकम् ।
पञ्चविंशोऽध्यायः 卐 मण्डपसभाविधानम् ३४३
कौशिक—दस अंशों वाला चौकोर मण्डप एक सौ बारह स्तम्भों से युक्त होता
है। यह नौ कूटों से युक्त एवं एक भाग के अन्तराल से युक्त होता है। इसे 'कौशिक'
कहते हैं। चतुष्कोण होने पर यह 'जातिक' होता है। यदि इसमें एक मुख (द्वार) एवं
एक भद्र हो तो इसे 'नन्द' कहते हैं तथा दो मुख होने पर इसकी संज्ञा 'भद्रकौशिक'
होती है। तीन मुख होने पर 'जयकोश' तथा चार मुख होने पर इसे 'पूर्णकोश' कहते
हैं। यह अधिष्ठान, स्तम्भ एवं कोनों पर लाङ्गल के आकार की भित्ति से युक्त होता
है। इसे अड़तालीस अल्पनासिकाओं एवं सभी अलङ्करणों से सुसज्जित करना चाहिये।
✵ कुलधारणम् ✵
एकादशविभागेन समं तु चतुरस्रकम् ॥८६॥
परितो मण्डपं तस्य बाह्ये भागेन कारयेत्।
चतुष्कर्णे द्विभागेन चतुष्कूटसमन्वितम् ॥८७॥
कुलधारण—इसमें एक समचतुष्कोण क्षेत्र ग्यारह भाग से युक्त होता है। इसके
चारो ओर एक भाग से मण्डप निर्मित होता है। चारो कोणों पर दो भाग से चार कूट
होते हैं॥८६-८७॥
चतुर्दिग्द्वित्रिभक्त्या तु विपुलायतकोष्ठकम् ।
त्रिभक्तिचतुरस्रं तु मध्यरङ्गच्यूर्ध्वकूटकम् ॥८८॥
कूटशालान्तरे तस्य क्रकरीकृतमार्गकम् ।
जात्यादिमुखभद्राङ्गं सर्वावयवशोभितम् ॥८९॥
चारो दिशाओं में दो भाग चौड़ा एवं तीन भाग लम्बा कोष्ठ होना चाहिये। तीन
भक्तिमाप का चौकोर मध्यरङ्ग एवं उसके ऊपर कूट होना चाहिये। कूट एवं शाला के
बीच में क्रकरीकृत (क्रास के आकार में) मार्ग होने चाहिये। जाति आदि को मुखभद्र
आदि सभी अंगों से युक्त होना चाहिये॥८८-८९॥
ऊर्ध्वे सभाग्रनीडाङ्गं प्रस्तरं नवबोधकम् ।
विवृतं संवृतं वापि गुह्यागुह्यार्थमाचरेत् ॥९०॥
कुलधारणमित्युक्तं समं तु चतुरस्रकम् ।
ऊपरी भाग में सभाग्र, नीड, प्रस्तर एवं नौ बोधक होना चाहिये। मण्डप ढका
हुआ अथवा खुला हुआ गोपनीय अथवा खुले कार्य की आवश्यकता के अनुसार
निर्मित किया जा सकता है। इस सम-चतुष्कोण मण्डप को कुलधारण कहते हैं।
✵ सुखाङ्गम् ✵
भागैर्द्वादशभिर्युक्तं समं तु चतुरस्रकम् ॥९१॥
३४४ मयमतम्
अष्टदिक्षु च मध्ये तु द्विभक्त्यैवोर्ध्वकूटकम् ।
तत्तद्बाह्यो तु भागेन परितोऽलिन्द्रमिष्यते ॥९२॥
सुखाङ्ग—इस मण्डप में बारह भागों वाला सम चतुष्कोण क्षेत्र होता है, जिसके
आठों दिशाओं एवं मध्य भाग में दो ईकाई माप के ऊर्ध्वकूट होते हैं। उसके बाहर
एक भाग माप का अलिन्द्र ( गलियारा ) चारो ओर होना चाहिये॥९१-९२॥
अङ्गणं वा सभास्थानं कर्णे लाङ्गलभित्तिकम् ।
चतुर्द्व्यंशेन विस्तारं निर्गमं स्याच्चतुर्दिशम् ॥९३॥
पार्श्वे सोपानसंयुक्तं पञ्जरैरष्टभिर्युतम् ।
षष्ट्युत्तरशतस्तम्भमाद्यङ्गे प्रविधीयते ॥९४॥
युक्त्या नास्यङ्गसंयुक्तं सुखाङ्गं नाम मण्डपम् ।
इसमें आँगन या सभा-स्थल एवं कोने में लाङ्गल के आकार की भित्ति होनी
चाहिये। चारो दिशाओं में चार भाग से विस्तार रक्खा जाय एवं दो भाग से निर्गम
निर्मित हो। सोपान पार्श्व में हो तथा आठ पञ्जरों से युक्त हो। मण्डप के प्रारम्भिक अंग
( अधिष्ठान ) में एक सौ साठ स्तम्भ होने चाहिये। यथोचित स्थान पर नासिकायें होनी
चाहिये। इस प्रकार निर्मित मण्डप को सुखाङ्ग कहते हैं॥९३-९४॥
☸ सौम्यम् ☸
सौख्यं त्रयोदशांशेन चतुरस्रसमाकृति ॥९५॥
परितो मण्डपं द्व्यंशं भागेन क्रकरीपथम् ।
त्रिभागं मध्यरङ्गच्यूर्ध्वकूटं सस्थूपीनीव्रकम् ॥९६॥
सौम्य—सौख्य ( सौम्य ) मण्डप में तेरह भाग का सम-चतुष्कोण क्षेत्र होता है।
इसके चारो ओर दो भाग से मण्डप एवं एक भाग से क्रकरी-पथ होना चाहिये। तीन
भाग से मध्य रंग एवं ऊपरी भाग में ऊर्ध्व कूट एवं स्थूपी से युक्त नीव्र होता है।
चतुष्कर्णे द्विभागेन त्यक्तमध्याङ्घ्रिकूटकम् ।
दिक्षु द्वित्र्यंशविस्तारायामं कोष्ठचतुष्टयम् ॥९७॥
नन्दादिमुखभद्राङ्गम्राष्टदिग्गतकुड्यकम् ।
चतुरशीतिभिर्युक्तं शतस्तम्भसमन्वितम् ॥९८॥
सर्वालङ्कारसंयुक्तं देवद्विजमहीभृताम् ।
मण्डप के मध्य में स्तम्भ नहीं होना चाहिये। चारो कोणों पर दो भाग से कूट
एवं चारो दिशाओं में दो भाग चौड़े एवं तीन भाग लम्बे चार कोष्ठ होने चाहिये। इसका
पञ्चविंशोऽध्यायः 卐 मण्डपसभाविधानम् ३४५
मुखभाग नन्द विधि (श्लोक ८४-८५) के अनुसार भद्र (पोर्च) से युक्त होना चाहिये।
भित्ति का निर्माण इच्छित दिशा में करना चाहिये। इसमें एक सौ चौरासी स्तम्भ एवं
सभी प्रकार के अलंकरण होने चाहिये। यह मण्डप देव, ब्राह्मण एवं राजाओं के लिये
उपयुक्त होता है।।९७-९८।।
✺ गर्भम् ✺
द्विःसप्तभक्तिविस्तारं समं तु चतुरस्रकम् ।।९९।।
द्विभक्त्या गर्भकूटं स्यादेकांशालिन्द्रमावृतम् ।
एकांशमन्तरालं स्यादप्रच्छन्नतलान्वितम् ।।१००।।
गर्भमण्डप—चौदह भाग विस्तार वाला यह मण्डप चौकोर होता है। दो भाग
से गर्भकूट (मध्य भाग के ऊपर निर्मित कूट) होना चाहिये, जिसके चारो ओर एक
भाग से अलिन्द्र (गलियारा) निर्मित हो। एक भाग से अन्तराल (मार्ग) निर्मित होना
चाहिये, जिसके ऊपर छत न निर्मित हो।।९९-१००।।
चतुष्कर्णे द्विभक्त्यैवमङ्गणं वोर्ध्वकूटकम् ।
द्विचतुर्विस्तृतायामं कोष्ठं वाङ्गणकं दिशि ।।१०१।।
तेषां बाह्ये तु भागेन परितोऽलिन्द्रमिष्यते ।
चारो कोनों पर दो-दो भाग से आँगन निर्मित होने चाहिये, जिनके ऊपर ऊर्ध्वकूट
हो सकते हैं (या आँगन खुले रह सकते हैं)। चारो दिशाओं में दो भाग चौड़े एवं
तीन भाग लम्बे आँगन या तो कोष्ठ से युक्त (या बिना कोष्ठ के) होने चाहिये। उनके
बाहर चारो ओर एक भाग से अलिन्द्र होना चाहिये।।१०१।।
इष्टदिक्कुड्यसंयुक्तमिष्टदिग्भद्रसंयुतम् ।।१०२।।
साष्टद्विशतपादं स्यादाद्यङ्गे तु विधीयते ।
देवद्विजनरेन्द्राणां गर्भाख्यं तन्मनोहरम् ।।१०३।।
अभीष्ट दिशा में भित्ति हो एवं आठों दिशाओं में भद्र निर्मित होने चाहिये।
अधिष्ठान पर दो सौ आठ स्तम्भ निर्मित होने चाहिये। गर्भसंज्ञक सुन्दर मण्डप देवों,
ब्राह्मणों एवं राजाओं के अनुकूल होता है।।१०२-१०३।।
✺ माल्यम् ✺
त्रिःपञ्चभक्तिविस्तारं समं तु चतुरस्रकम् ।
त्रिभागं मध्यरङ्गच्यूर्ध्वकूटं वाङ्गणमेव वा ।।१०४।।
परितोऽलिन्द्रमंशेन भागैकेनान्तरालकम् ।
शेषं पूर्ववदुद्दिष्टं कोष्ठकं भागतोऽधिकम् ।।१०५।।
३४६ मयमतम्
द्वात्रिंशद्विशतं पादमाद्यङ्गे प्रविधीयते।
सर्वालङ्कारसंयुक्तं माल्याख्यं मण्डपं भवेत् ॥१०६॥
माल्य—इस मण्डप में पन्द्रह भाग विस्तृत चौकोर क्षेत्र होता है। इसके मध्य
में तीन भाग से ऊर्ध्वकूट-युक्त मध्यरंग अथवा आँगन होना चाहिये। चारो ओर एक
भाग से अलिन्द्र तथा एक भाग से अन्तराल होना चाहिये। शेष अंग पूर्ववर्णित होने
चाहिये; किन्तु कोष्ठ एक भाग अधिक लम्बा होना चाहिये। अधिष्ठान पर दो सौ बत्तीस
स्तम्भ होने चाहिये। सभी सज्जाओं से युक्त इस मण्डप की संज्ञा माल्य होती है।
✵ माल्याद्भुतम् ✵
माल्याद्भुतं समास्त्रं तु भागैः षोडशभिर्युतम् ।
द्विभक्त्यैवोर्ध्वकूटं तु भागेनालिन्द्रमावृतम् ॥१०७॥
द्व्येकभक्त्या मुखे भद्रं कर्णे लाङ्गलभित्तिकम् ।
पार्श्वे सोपानसंयुक्तं चित्रप्रस्तरसंयुक्तम् ॥१०८॥
माल्याद्भुत — माल्याद्भुत मण्डप सोलह भागों के सम-चतुष्कोण क्षेत्र से युक्त
होता है। दो भाग से ऊर्ध्वकूट होता है एवं एक भाग माप के अलिन्द्र से घिरा होता
है। सामने दो भाग एवं एक भाग माप का भद्र होता है एवं कोने में लाङ्गल के आकार
की भित्ति होती है। पार्श्व में सीढ़ी निर्मित होती है एवं यह चित्र-प्रस्तर से युक्त होता
है।।१०७-१०८।।
तद्वहिर्द्व्यंशमानेन जलपादं समन्ततः ।
तद्वाह्ये तु चतुर्भक्त्या परितो मण्डपं भवेत् ॥१०९॥
द्विभक्तिचतुरस्त्राभमेकांशं व्यवधानकम् ।
द्विरष्टाङ्गणतन्मध्ये परितः प्रविधीयते ॥११०॥
उसके बाहर दो भाग के प्रमाण से चारो ओर जलपाद ( जलस्थान ) होना चाहिये
तथा उसके बाहर चारो ओर चार भाग माप का मण्डप होना चाहिये। दो भाग का
चौकोर क्षेत्र हो एवं एक भाग से व्यवधान ( अन्तराल ) निर्मित हो। उसके मध्य में चारो
ओर सोलह भागों वाला आँगन होना चाहिये ।।१०९-११०।।
कर्णे लाङ्गलकुड्यं स्यादूर्ध्वं हाराभिमण्डितम् ।
चतुर्द्विभक्तिविस्तारनिर्गमं दिक्षु भद्रकम् ॥१११॥
पार्श्वे सोपानसंयुक्तं सर्वालङ्कारसंयुक्तम् ।
देवद्विजनरेन्द्राणां चतुरस्रं द्विरष्टधा ॥११२॥
पञ्चविंशोऽध्यायः 卐 मण्डपसभाविधानम् ३४७
कोनों पर लाङ्गल के आकार की भित्ति हो एवं ऊर्ध्व भाग पर हारामार्ग से
अलंकरण हों। दो भाग विस्तृत क्षेत्र निर्गम से युक्त हो एवं चारो दिशाओं में भद्र निर्मित
हों। पार्श्व में सीढ़ी हो एवं सभी प्रकार के आभरणों से युक्त हो। ये सोलह प्रकार के
चौकोर मण्डप देवों, ब्राह्मणों एवं राजाओं के लिये उपयुक्त होते हैं।।१११-११२।।
इत ऊर्ध्वं द्विपाश्र्वैकवृद्ध्या द्वात्रिंशदंशकम् ।
विस्तारं चतुरस्राभं मण्डपं कारयेद् बुधः ।।११३।।
विवृतं संवृतं वापि कुड्यस्तम्भं प्रयोजयेत् ।
यथायुक्ति यथाशोभं तथा कुर्याद् विचक्षणः ।।११४।।
एतेषामायतास्राभं मण्डपं प्रविधीयते ।
बुद्धिमान व्यक्ति ( स्थपति ) को उपर्युक्त चतुष्कोण मण्डपों में प्रत्येक में पाश्र्वों
में एक-एक भाग बढ़ाते हुये बत्तीस भाग तक विस्तार ले जाना चाहिये। ये मण्डप
खुले या बन्द हो सकते हैं एवं आवश्यकतानुसार भित्ति एवं स्तम्भ निर्मित किये जाने
चाहिये। बुद्धिमान व्यक्ति को यथावसर एवं शोभा के अनुकूल मण्डप-निर्माण करना
चाहिये। आयताकार मण्डपों का वर्णन इस प्रकार किया गया।।११३-११४।।
✺ धनम् ✺
त्रिभक्तिविस्तृतं तस्माद् द्विभक्त्याधिकमायतम् ।।११५।।
पुरतो वारमेकांशं त्रिरष्टाङ्घ्रिसमन्वितम् ।
विंशन्नास्यङ्गसंयुक्तं धनाख्यं तद्धनावहम् ।।११६।।
धन—यह मण्डप तीन भाग चौड़ा एवं लम्बाई में दो भाग अधिक होता है।
सामने एक भाग से वार ( प्रवेश ) होता है एवं यह चौबीस स्तम्भों से युक्त होता है।
इसमें बीस नासियाँ होती हैं। धन प्रदान करने वाला यह मण्डप धनसंज्ञक होता
है।।११५-११६।।
✺ सुभूषणम् ✺
विस्तारं चतुरंशैस्तु तस्माद् द्व्यंशाधिकायतम् ।
मण्डपं परितो भक्त्या शेषमङ्गणकं भवेत् ।।११७।।
द्विभक्तिविस्तृतं चैकभक्त्या तन्मुखभद्रकम् ।
चतुरष्टाङ्घ्रिसंयुक्तमाद्यङ्गेषु बहिर्बहिः ।।११८।।
सर्वालङ्कारसंयुक्तं सुभूषणमिति स्मृतम् ।
सुभूषण—इसका विस्तार चार भागों से एवं लम्बाई उससे दो भाग अधिक
३४८ मयमतम्
रक्खा जाता है। एक भाग से चारो ओर मण्डप एवं शेष भाग से आँगन निर्मित करना
चाहिये। मुख-भद्रक ( सामने बना पोर्च ) दो भाग विस्तृत एवं एक भाग ( आगे
निकला भाग ) माप का होना चाहिये। अधिष्ठान पर बाहरी भाग में बत्तीस स्तम्भ होने
चाहिये। सभी अलंकरणों से युक्त इस मण्डप का नाम सुभूषण होता है।
- आहल्पम् *
पञ्चरक्त्या विशालं तु तस्माद् द्व्यंशाधिकायतम् ।। ११९ ।।
मण्डपं परितोऽशेन शेषं कूटं तु वाऽङ्गणम्।
त्रिभक्तिविस्तृतं चैकभक्त्या तन्मुखभद्रकम् ।। १२० ।।
आद्यङ्गमष्टपञ्चाङ्घ्रिसंयुक्तं तद् विचित्रकम्।
सर्वालङ्कारसंयुक्तमाहल्यं सर्वदेशिकम् ।। १२१ ।।
आहल्य—इस मण्डप की चौड़ाई पाँच भाग एवं लम्बाई उससे दो भाग अधिक
होती है। चारो ओर मण्डप एक भाग से एवं शेष भाग से कूट निर्मित करे या ( खुला )
आँगन छोड़ देना चाहिये। तीन भाग विस्तार वाला एक भाग का मुखभद्र निर्मित करना
चाहिये। अधिष्ठान चालीस स्तम्भों से युक्त होना चाहिये। विचित्र एवं सभी अलंकारों
से युक्त आहल्य संज्ञक मण्डप सभी स्थानों के लिये उपयुक्त होता है।। ११९-१२१ ।। - स्रुगाख्यम् *
षड्भक्तिविस्तृतं तस्माद् द्विभक्त्याधिकमायतम्।
चतुर्द्विभक्तिकं दैर्घ्यव्यासमध्ये सभोदयम् ।। १२२ ।।
परितो मण्डपं द्व्यंशमिष्टदिङ्मुखभद्रकम्।
षष्ट्यङ्घ्रियुतमाद्यङ्गं युक्त्या नास्यङ्गसंयुक्तम् ।। १२३ ।।
सर्वालङ्कारसंयुक्तं स्रुगाख्यं तन्मनोहरम्।
स्रुग मण्डप—यह मण्डप छः भाग विस्तृत होता है एवं इसकी लम्बाई चौड़ाई
से दो भाग अधिक होती है। मध्य भाग में चार भाग लम्बा एवं दो भाग चौड़ा सभागार
होता है, जिसके चारो ओर मण्डप होता है। दो भाग से मुखभद्र का निर्माण इच्छानुसार
किसी भी दिशा में किया जा सकता है। अधिष्ठान साठ स्तम्भों से युक्त होता है तथा
नासियाँ निर्मित होती हैं। सभी आभरणों से सुसज्जित एवं मनोहर इस मण्डप की संज्ञा
स्रुग है।। १२२-१२३ ।। - कोणम् *
सप्तभक्त्या विशालं तु तस्माद् द्व्यंशाधिकायतम ।। १२४ ।।
पञ्चविंशोऽध्यायः 卐 मण्डपसभाविधानम् ३४९
त्रिभक्तिविस्तृतं पञ्चभक्तिदैर्घ्यं सभाङ्गणम्।
परितो मण्डपं द्व्यंशमिष्टदिग्गतभित्तिकम् ॥१२५॥
त्रिभक्तिविस्तृतं भागनिर्गमं मुखभद्रकम्।
युक्त्या नास्यङ्गसंयुक्तं द्विसप्तत्यङ्घ्रिकान्वितम् ॥१२६॥
सर्वालङ्कारसंयुक्तं कोणाख्यं मण्डपं भवेत्।
कोण—यह मण्डप सात भाग विस्तृत एवं लम्बाई में चौड़ाई से दो भाग अधिक
होता है। तीन भाग चौड़ा एवं पाँच भाग लम्बा इसका सभाङ्गण होता है। इसके चारो
ओर मण्डप दो भाग से निर्मित होता है एवं इच्छानुसार दिशा में भित्ति निर्मित की जा
सकती है। मुखभद्र तीन भाग चौड़ा एवं एक भाग निर्गम से युक्त होता है। यह
आवश्यकतानुसार नासियों से युक्त होता है एवं इसका अधिष्ठान बहत्तर स्तम्भों से
युक्त होता है। कोणसंज्ञक यह मण्डप सभी अलंकरणों से सुसज्जित होता है।
✺ खर्वटम् ✺
अष्टभक्त्या विशालं तु तस्माद् द्व्यंशाधिकायतम् ॥१२७॥
द्विचतुर्भागविस्तारायामं मध्ये जलस्थलम्।
परितोऽलिन्द्रमेकांशं बाह्ये द्व्यंशेन मण्डपम् ॥१२८॥
खर्वट—इस मण्डप की चौड़ाई आठ भाग एवं लम्बाई उससे दो भाग अधिक
होती है। मध्य भाग में दो भाग चौड़ा एवं चार भाग लम्बा जल-स्थान होना चाहिये।
चारो ओर एक भाग से अलिन्द्र एवं उसके बाहर दो भाग से मण्डप होना चाहिये।
त्यक्तमध्याङ्घ्रिसंयुक्तमिष्टदिग्गतभित्तिकम् ।
साष्टषष्ट्यङ्घ्रिसंयुक्तं पूर्ववन्मुखभद्रकम् ॥१२९॥
प्रमुखे वारमेकांशं मुखं सोपानसंयुक्तम्।
नानालङ्कारसंयुक्तं सुरादीनां तु खर्वटम् ॥१३०॥
उसके मध्य भाग में स्तम्भ नहीं होना चाहिये। अभीप्सित दिशा में भित्ति होनी
चाहिये। पहले के समान अड़सठ स्तम्भ एवं मुख-भद्र होना चाहिये। मुखभाग पर एक
भाग से प्रवेश एवं मुखभाग सीढ़ियों से युक्त होना चाहिये। विभिन्न अलंकारों से
सुसज्जित खर्वटसंज्ञक यह मण्डप देवों आदि के लिये प्रशस्त होता है।
✺ श्रीरूपम् ✺
नवभक्तिविशालं तु तस्माद् द्व्यंशाधिकायतम्।
एकत्र्यंशं तु विस्तारायामं मध्ये जलस्थलम् ॥१३१॥
३५० मयमतम्
परितोऽलिन्द्रमेकांशं बाह्ये द्व्यंशेन मण्डपम् ।
त्यक्तमध्याङ्घ्रिसंयुक्तं बाह्ये वारं तु भागतः ॥१३२॥
श्रीरूप—यह मण्डप नौ भाग विस्तृत होता है एवं इसकी लम्बाई चौड़ाई से दो
भाग अधिक होती है। चारो ओर एक भाग से अलिन्द्र एवं उसके बाहर दो भाग से
मण्डप होता है। मध्य भाग में स्तम्भ नहीं होता है तथा बाहर की ओर एक भाग से
मार्ग होता है॥१३१-१३२॥
षण्णवत्यङ्घ्रिसंयुक्तं यथेष्टं द्वारभित्तिकम् ।
वारयुक्तमवारं वा पूर्ववन्मुखभद्रकम् ॥१३३॥
नानावयवसंयुक्तं नाम्ना श्रीरूपमिष्यते ।
इसमें उनहत्तर स्तम्भ होते हैं तथा इच्छित दिशा में द्वार एवं भित्ति का निर्माण
किया जाता है। पूर्ववर्णित रीति से मुखभद्र होता है, जो मार्ग से युक्त या उसके बिना
होता है। विभिन्न अंगों से युक्त इस मण्डप को श्रीरूप कहते हैं॥१३३॥
✺ मङ्गलम् ✺
पङ्क्तिभागविशालं तु तस्माद् द्व्यंशाधिकायतम् ॥१३४॥
द्विचतुर्भागविस्तारायामं मध्ये सभोदयम् ।
परितोऽलिन्द्रमेकांशं भागेन जलपातनम् ॥१३५॥
मङ्गल—यह मण्डप दस भाग चौड़ा एवं लम्बाई उससे दो भाग अधिक होती
है। मध्य भाग में दो भाग चौड़ा एवं चार भाग लम्बा सभागार होता है। चारो ओर एक
भाग से अलिन्द्र एवं एक भाग से जल-स्थान होता है॥१३४-१३५॥
तद्बाह्ये द्व्यंशमानेन परितो मण्डपं भवेत् ।
स्तम्भं कुड्यं मुखं भद्रं यथेष्टं परिकल्पयेत् ॥१३६॥
अथवा मध्यकूटं चाप्यलिन्द्रं चापि पूर्ववत् ।
जलस्थलं विना सर्वं मण्डपं परिकल्पयेत् ॥१३७॥
उसके बाहर चारो ओर दो भाग से मण्डप होता है। स्तम्भ, भित्ति, मुखभद्र आदि
का निर्माण इच्छानुसार किया जाता है। अथवा मध्यकूट एवं अलिन्द्र पहले के सदृश
निर्मित करना चाहिये। सभी मण्डपों को जल-स्थान के बिना ही निर्मित करना चाहिये।
द्विभक्त्या चतुरस्रं तु षट्कूटं पार्श्वयोर्मतम् ।
द्विचतुर्भागविस्तारदैर्घ्यं कोष्ठं मुखेऽमुखे ॥१३८॥
कर्णे लाङ्गलकुड्यं वा परितः कुड्यमेव वा ।
विवृतं संवृतं वाऽपि स्तम्भं तत्रैव योजयेत् ॥१३९॥
पञ्चविंशोऽध्यायः 卐 मण्डपसभाविधानम् ३५१
दोनों पाश्र्वों में दो भाग से चौकोर छः कूटों का निर्माण करना चाहिये। सामने एवं
पीछे दो भाग चौड़ा एवं चार भाग लम्बा कोष्ठ निर्मित करना चाहिये। कोनों पर
लाङ्गल-भित्ति तथा चारो ओर भित्ति निर्मित करनी चाहिये या भित्ति नहीं भी हो सकती
है। यह खुला अथवा ढँका हो सकता है। वहीं स्तम्भ का निर्माण करना चाहिये।
सर्वावयवसंयुक्तं मङ्गलाख्यं तु मण्डपम्।
अष्टावेतानि चोक्तानि देवद्विजमहीभृताम् ॥१४०॥
सभी अंगों से युक्त इस मण्डप की संज्ञा मङ्गल है। आठ चतुष्कोण से युक्त ये
( आयताकार ) मण्डप देवों, ब्राह्मणों एवं राजाओं के लिये कहे गये हैं॥१४०॥
पूर्वोक्तचतुरस्रात्तु भक्त्यैकया विवर्धनात्।
यावद् द्विगुणमायामं तावद् दैर्घ्यं प्रयोजयेत् ॥१४१॥
स्तम्भकुड्यादिकं सर्वमलङ्कारं च तत्ततः।
यथारुचि यथाशोभं तथा कुर्याद् विचक्षणः ॥१४२॥
अष्टावायतयुक्तानि वक्ष्यन्ते वैश्यशूद्रयोः।
पूर्वोक्त चतुष्कोण ( आयताकार ) मण्डपों में चौड़ाई में एक-एक भाग बढ़ाते हुये
वहाँ तक लम्बाई का माप रखना चाहिये, जब तक लम्बाई चौड़ाई की दुगुनी न हो
जाय। बुद्धिमान स्थपति को मण्डप में स्तम्भ एवं भित्ति आदि सभी अलंकरणों का
इच्छानुसार एवं जिस प्रकार सुन्दर लगे, उस प्रकार निर्माण करना चाहिये। अब वैश्य
एवं शूद्रों के अनुकूल आठ आयताकार मण्डपों का वर्णन किया जा रहा है।
✺ मार्गम् ✺
द्विभक्तिविस्तृतं चैव विस्तारद्विगुणायतम् ॥१४३॥
त्रिःपञ्चाङ्घ्रिसमायुक्तं द्व्यंशैकं मुखभद्रकम्।
पाश्र्वे सोपानसंयुक्तं नासिकाख्यैरलङ्कृतम् ॥१४४॥
इष्टदिङ्मुखसंयुक्तं मार्गाख्यं मण्डपं मतम्।
मार्ग—इस मण्डप का विस्तार दो भाग एवं लम्बाई विस्तार की दुगुनी होनी
चाहिये। इसमें पन्द्रह स्तम्भ हों एवं दो भाग ( चौड़ा ) एवं एक भाग ( बाहर की ओर
निकला ) मुखभद्रक ( पोर्च ) होना चाहिये। इसका सोपान पार्श्व में निर्मित होना चाहिये
तथा नासिकाओं से यह सुशोभित होना चाहिये। इसका मुख-भाग इच्छित दिशा में
रखना चाहिये। इसे मार्ग संज्ञक मण्डप कहते हैं॥१४३-१४४॥
✺ सौभद्रम् ✺
त्रिभक्तिविस्तृतं तस्य विस्तारद्विगुणायतम् ॥१४५॥
३५२ मयमतम्
चतुःसप्ताङ्घ्रिसंयुक्तं भक्त्या वारं तु तन्मुखे।
द्विभक्तिविस्तृतं भक्त्या निर्गमं मुखभद्रकम् ॥१४६॥
युक्त्या नास्यङ्घ्रिसंयुक्तं सौभद्रं तन्मनोहरम्।
सौभद्र—सौभद्र मण्डप का विस्तार तीन भाग एवं लम्बाई विस्तार की दुगुनी
होती है। यह अट्ठाईस स्तम्भों से युक्त होता है एवं सामने एक भाग से वार (मार्ग)
होता है। मुख-भद्रक का विस्तार दो भाग एवं निर्गम (सामने निकला भाग) एक भाग
से निर्मित होता है। उचित रीति से नासियों एवं स्तम्भों से युक्त यह सुन्दर मण्डप
सौभद्र संज्ञक होता है॥१४५-१४६॥
✵ सुन्दरम् ✵
चतुर्भक्त्या विशालं तु तस्माद् द्व्यंशाधिकायतम् ॥१४७॥
द्विचतुर्विस्तृतायामं कूटं मध्ये तु वाऽङ्गणम्।
द्वात्रिंशाङ्घ्रिसमायुक्तं भक्त्या तन्मुखभद्रकम् ॥१४८॥
युक्त्या नास्यङ्घ्रिसंयुक्तं सुन्दराख्यं तु मण्डपम्।
सुन्दर—इस मण्डप की चौड़ाई चार भाग एवं लम्बाई उसकी दुगुनी होती है।
मध्य भाग दो भाग चौड़ा एवं चार भाग लम्बा होता है, जिस पर कूट निर्मित होता
है अथवा वहाँ (खुला हुआ) आँगन होता है। बत्तीस स्तम्भों से युक्त इस मण्डप में
एक भाग से मुख-भद्रक निर्मित होता है। सुन्दर नामक यह मण्डप आवश्यकतानुसार
नासियों एवं स्तम्भों से युक्त होता है॥१४७-१४८॥
✵ साधारणम् ✵
पञ्चभक्त्या विशालं तु तस्माद् वेदांशमायतम् ॥१४९॥
द्विभक्तिविस्तृतं त्र्यंशदैर्घ्यं पार्श्वेऽङ्गणद्वयम्।
षट्पञ्चाशद् भवेत् पादं वारमेकेन तन्मुखे ॥१५०॥
त्रिभक्तिविस्तृतं चैकभक्त्या तन्मुखभद्रकम्।
प्रमुखे तस्य सोपानं सर्वतः कुड्यसंयुतम् ॥१५१॥
युक्त्या नास्यङ्गसंयुक्तं साधारणमिति स्मृतम्।
साधारण—यह मण्डप पाँच भाग विस्तृत एवं लम्बाई में चौड़ाई से चार भाग
अधिक होता है। बगल में दो भाग चौड़े एवं तीन भाग लम्बे दो आँगन होते हैं। इसमें
छप्पन खम्भे होते हैं एवं सामने एक भाग से वार निर्मित होता है। तीन भाग विस्तृत
एवं एक भाग (बाहर निकला) माप से मुख-भद्रक का निर्माण करना चाहिये। मुख
पञ्चविंशोऽध्यायः 卐 मण्डपसभाविधानम् ३५३
भाग पर सोपान एवं चारो ओर भित्ति होनी चाहिये। आवश्यकतानुसार नासी आदि अंगों
से युक्त इस मण्डप को साधारण कहते हैं।।१४९-१५१।।
✺ सौख्यम् ✺
षड्भक्तिविस्तृतं तस्मात् त्रिभक्त्याधिकमायतम् ॥१५२॥
द्विपञ्चभागविस्तारायामं मध्ये सभोदयम्।
परितो मण्डपं द्व्यंशं वारं भक्त्या तु तन्मुखे ॥१५३॥
पूर्ववन्मुखभद्रं तु नासिकाख्यैरलङ्कृतम्।
षष्ट्यङ्घ्रिकसमायुक्तं सर्वावयवसंयुक्तम् ॥१५४॥
नाम्ना सौख्यमिति प्रोक्तं सर्वेषां तु सनातनम्।
सौख्य—यह छः भाग चौड़ा एवं चौड़ाई से तीन भाग अधिक लम्बा होता है।
मध्य भाग में दो भाग चौड़ा एवं पाँच भाग लम्बा सभागार होता है। चारो ओर दो भाग
से मण्डप एवं सामने एक भाग से वार निर्मित होता है। पहले के समान मुख-भद्रक
निर्मित होता है एवं नासिकाओं से सुसज्जित होता है। साठ स्तम्भों से एवं सभी अंगों
से युक्त इस मण्डप की संज्ञा सौख्य है। यह सभी लोगों के लिये अनुकूल होता
है।।१५२-१५४।।
✺ ईश्वरकान्तम् ✺
सप्तभक्त्या विशालं तु तस्माद् वेदांशमायतम् ॥१५५॥
त्रिभागचतुरस्रं तु मध्ये कूटं तु वाऽङ्गणम्।
तद्बाह्ये भागमानेन परितोऽलिन्द्रमिष्यते ॥१५६॥
द्विपञ्चविस्तृतायामं पार्श्वयोरङ्गणद्वयम्।
बाह्ये मण्डपमेकांशं परितः कल्पयेद् बुधः ॥१५७॥
ईश्वरकान्त—इस मण्डप की चौड़ाई सात भाग से एवं लम्बाई उससे चार भाग
अधिक होती है। मध्य भाग में तीन भाग का चौकोर क्षेत्र होता है, जिस पर कूट निर्मित
होता है अथवा वहाँ ( खुला ) आँगन होता है। उसके बाहर एक भाग प्रमाण से चारो
ओर अलिन्द्र होता है। दोनों पार्श्वों में दो भाग चौड़े एवं पाँच भाग लम्बे दो आँगन
होते हैं। उसके बाहर एक भाग से चारो ओर मण्डप निर्मित होता है, ऐसा विद्वानों
का मत है।।१५५-१५७।।
त्रिभक्त्यैकेन विस्तारनिर्गमं मुखभद्रकम्।
चतुराशीतिकं पादमाद्यङ्गे प्रविधीयते ॥१५८॥
मय०-२३
३५४ मयमतम्
प्रमुखे वारमेकांशं नानावयवशोभितम्।
सर्वलङ्कारसंयुक्तमेतदीश्वरकान्तकम् ॥१५९॥
तीन भाग चौड़ा एवं एक भाग बाहर निकला मुख-भद्रक निर्मित होता है।
अधिष्ठान पर चौरासी स्तम्भ निर्मित होते हैं। मुखभाग पर एक भाग से वार निर्मित
होता है। यह ईश्वरकान्त मण्डप विभिन्न अंगों से सुशोभित एवं सभी अलंकरणों से
युक्त होता है।।१५८-१५९।।
❋ श्रीभद्रम् ❋
अष्टभक्त्या विशालं तु तस्मात् पूर्ववदायतम् ।
द्विभक्ति चतुरस्रं तु मध्ये कूटं तु वाङ्गणम्॥१६०॥
तद्बाह्ये भागमानेन परितोऽलिन्द्रमिष्यते।
पूर्ववत् पार्श्वयोः कूटं द्वयंशेनाधिकमायतम्॥१६१॥
श्रीभद्र—यह मण्डप आठ भाग चौड़ा तथा पूर्ववर्णित माप के अनुसार लम्बा
होता है। मध्य भाग दो भाग माप का चौकोर क्षेत्र होता है, जिसमें कूट निर्मित होता
है या आँगन होता है। उसके बाहर एक भाग के प्रमाण से चारो ओर अलिन्द्र निर्मित
होता है। दोनों पार्श्वों में पहले के समान कूट होते हैं, जिन्हें पूर्ववर्णित मान से दो भाग
अधिक लम्बा रक्खा जाता है।।१६०-१६१।।
द्विभक्त्या मण्डपं बाह्ये परितः कल्पयेद् बुधः।
चतुर्द्विभक्तिविस्तारनिर्गमं मुखभद्रकम्॥१६२॥
दशाधिकशतस्तम्भमाद्यङ्गे प्रविधीयते ।
सर्वलङ्कारसंयुक्तं श्रीभद्रं सर्वयोग्यकम् ॥१६३॥
उसके बाहर चारो ओर दो भाग से बुद्धिमान स्थपति को मण्डप निर्मित करना
चाहिये। चार भाग चौड़ा एवं दो भाग बाहर निकला मुखभद्रक निर्मित करना चाहिये।
अधिष्ठान पर एक सौ दस स्तम्भ निर्मित करना चाहिये। सभी अलंकरणों से युक्त यह
श्रीभद्र मण्डप सभी के लिये अनुकूल होता है।।१६२-१६३।।
❋ सर्वतोभद्रम् ❋
नवभक्त्या विशालं तु तस्मात् पूर्ववदायतम् ।
त्रिभक्तिचतुरस्रं तु मध्ये कूटं तु वाङ्गणम्॥१६४॥
तद्बाह्ये भागमानेन परितोऽलिन्द्रमिष्यते।
द्विपञ्चभक्तिविस्तारदैर्घ्यं पार्श्वेऽङ्गणद्वयम्॥१६५॥
पञ्चविंशोऽध्यायः 卐 मण्डपसभाविधानम् ३५५
परितो मण्डपं द्व्यंशं तद्बाह्ये योजयेद्बुधः ।
पञ्चद्व्यंशविशालायामेन भद्रं मुखेऽमुखे ॥१६६॥
सर्वतोभद्र—इस मण्डप को नौ भाग विस्तृत एवं लम्बाई पहले दिये गये माप
के अनुसार होना चाहिये। तीन भाग चौड़ाई वाले मध्य भाग में चौकोर क्षेत्र कूट से
युक्त हो सकता है या वहाँ आँगन हो सकता है। उसके बाहर एक भाग प्रमाण से चारो
ओर अलिन्द्र होना चाहिये। पार्श्व भाग में दो भाग चौड़ा एवं पाँच भाग लम्बा दो आँगन
होना चाहिये। चारो ओर उसके बाहर दो भाग से बुद्धिमान व्यक्ति को मण्डप बनाना
चाहिये। सामने एवं पीछे पाँच भाग चौड़े एवं दो भाग लम्बे ( गहरे ) भद्र ( पोर्च )
होने चाहिये।।१६४-१६६।।
त्र्यंशैकविपुलं दैर्घ्यं पार्श्वयोर्भद्रकद्वयम् ।
कर्णे लाङ्गलवत् कुड्यं विवृतस्तम्भसंयुतम् ॥१६७॥
साष्टाविंशच्छतं पादमाद्यङ्गे प्रविधीयते ।
यथायुक्ति यथायोगं तथा युञ्जीत बुद्धिमान् ॥१६८॥
सर्वतोभद्रकं नाम्ना सर्वालङ्कारसंयुतम् ।
एतान्यदि सुरादीनां योजयेत्तु विचक्षणः ॥१६९॥
दोनों पार्श्वों में तीन भाग चौड़े एवं एक भाग लम्बे दो भद्रक होने चाहिये। कोनों
पर लाङ्गल के समान भित्ति एवं स्तम्भ होने चाहिये। अधिष्ठान पर एक सौ अट्ठाईस
स्तम्भ निर्मित होने चाहिये। अन्य अवयवों को आवश्यकतानुसार उचित रीति से
बुद्धिमान् स्थपति को संयुक्त करना चाहिये। सर्वतोभद्र संज्ञक मण्डप सभी अलंकरणों
से युक्त होता है। इस प्रकार बुद्धिमान व्यक्ति को इस मण्डप का निर्माण देवादिकों के
भवन में करना चाहिये।।१६७-१६९।।
✵ मण्डपमुखायामः ✵
मण्डपानां तु विस्तारादायामं प्रविधीयते ।
जातिरूपं तु पूर्वोक्तं छन्दमेकं द्विभक्तिकम् ॥१७०॥
विकल्यं त्र्यंशकं प्रोक्तमाभासं चतुरस्रकम् ।
दण्डकं स्वस्तिभद्रं च पद्मं क्रकरभद्रकम् ॥१७१॥
षण्मुखं लाङ्गलं मौलिं जातिनामानुसारतः ।
प्रपामण्डपजातिस्तु युक्तितः पादसंयुता ॥१७२॥
मण्डप की लम्बाई—मण्डपों की लम्बाई का विधान उनकी चौड़ाई के अनुसार
किया जाता है। जातिरूप का वर्णन पहले किया जा चुका है। छन्दरूप में लम्बाई
३५६ मयमतम्
चौड़ाई से एक भाग अधिक होती है। विकल्प रीति में दो भाग एवं आभास रीति में
तीन भाग अधिक लम्बाई रक्खी जाती है। चौकोर, दण्डक, स्वस्तिभद्र, पद्म, क्रकरभद्रक,
षण्मुख, लाङ्गल तथा मौलि मण्डप जातिमान के अनुसार होते हैं। प्रपा एवं मण्डप
जातिमान के अनुसार होते हैं तथा आवश्यकतानुसार इनमें स्तम्भों का निर्माण किया
जाता है।।१७०-१७२।।
✺ पुनः मण्डपभेदाः ✺
गृहविन्यासरङ्गाङ्गं तदुक्तं गृहमण्डपम्।
प्रासादगर्भनालीवत् सालिन्द्राङ्गविशेषतः ।।१७३।।
अधिष्ठानादिवर्गाढ्यं प्रासादाकारमण्डपम् ।
प्रासादगृहसाङ्गाङ्गं गृहप्रासादमण्डपम् ।।१७४।।
मण्डपों के अन्य भेद—गृहविन्यास के अंगभूत रङ्गस्थल को गृहमण्डप कहते
हैं। जिस प्रकार प्रासाद में गर्भगृह होता है, उसी प्रकार गृह में मण्डप होता है जो
विशेष रूप से अलिन्द्र से युक्त होता है। अधिष्ठान आदि से युक्त यह मण्डप देवालय
के आकार का होता है। जिस गृहमण्डप में वे विशिष्ट अंग होते हैं, जो देवालय के
मण्डप के अंग होते हैं, उसे गृहप्रासादमण्डप कहते हैं।।१७३-१७४।।
मण्डपोपरि भूमिश्रेन्मालिकामण्डपं मतम्।
इष्टकाभिः शिलाभिर्वा दारुभिर्दन्तलोहकैः।
सर्वत्र द्रव्यजातीनां मिश्रं मिश्रं विशेषितम् ।।१७५।।
यदि मण्डप के ऊपर तल निर्मित हो तो उसे मालिकामण्डप कहते हैं। यह
मण्डप ईंटों, शिलाओं, काष्ठ, गजदन्त या धातुओं से निर्मित होता है। यह सभी प्रकार
के मिश्रित द्रव्यों से निर्मित होता है।।१७५।।
✺ जलक्रीडामण्डपम् ✺
सायतं तु चतुरस्रकं जलक्रीडयान्वितमथापि मण्डपम्।
एकभौमकमनेकभौमकं योजनीयमवनीपतीच्छया ।।१७६।।
जलक्रीडा-मण्डप—राजा की इच्छा के अनुसार जल-क्रीडा से युक्त मण्डप
चौकोर या आयताकार हो सकता है। इसमें एक या अनेक तल हो सकते हैं।।१७६।।
संवृतं विवृतमङ्घ्रिभित्तिकं दिक्षु दिक्षु गतभद्ररूपकम् ।
मध्यरङ्गसहितं तु वाङ्गणे स्तम्भभित्तिकमुपर्यपर्यपि ।।१७७।।
यह मण्डप खुला अथवा (भित्ति से) ढँका हो सकता है। यह अंघ्रि-भित्तियों
(पंक्ति में निर्मित स्तम्भों) से घिरा होता है। दिशाओं में भद्र (पोर्च) निर्मित होते