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सर्वकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

पृष्ठ 368, कुल 395 में से

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पृष्ठ 368

३४४ मयमतम्
अष्टदिक्षु च मध्ये तु द्विभक्त्यैवोर्ध्वकूटकम् ।
तत्तद्बाह्यो तु भागेन परितोऽलिन्द्रमिष्यते ॥९२॥
सुखाङ्ग—इस मण्डप में बारह भागों वाला सम चतुष्कोण क्षेत्र होता है, जिसके
आठों दिशाओं एवं मध्य भाग में दो ईकाई माप के ऊर्ध्वकूट होते हैं। उसके बाहर
एक भाग माप का अलिन्द्र ( गलियारा ) चारो ओर होना चाहिये॥९१-९२॥
अङ्गणं वा सभास्थानं कर्णे लाङ्गलभित्तिकम् ।
चतुर्द्व्यंशेन विस्तारं निर्गमं स्याच्चतुर्दिशम् ॥९३॥
पार्श्वे सोपानसंयुक्तं पञ्जरैरष्टभिर्युतम् ।
षष्ट्युत्तरशतस्तम्भमाद्यङ्गे प्रविधीयते ॥९४॥
युक्त्या नास्यङ्गसंयुक्तं सुखाङ्गं नाम मण्डपम् ।
इसमें आँगन या सभा-स्थल एवं कोने में लाङ्गल के आकार की भित्ति होनी
चाहिये। चारो दिशाओं में चार भाग से विस्तार रक्खा जाय एवं दो भाग से निर्गम
निर्मित हो। सोपान पार्श्व में हो तथा आठ पञ्जरों से युक्त हो। मण्डप के प्रारम्भिक अंग
( अधिष्ठान ) में एक सौ साठ स्तम्भ होने चाहिये। यथोचित स्थान पर नासिकायें होनी
चाहिये। इस प्रकार निर्मित मण्डप को सुखाङ्ग कहते हैं॥९३-९४॥
☸ सौम्यम् ☸
सौख्यं त्रयोदशांशेन चतुरस्रसमाकृति ॥९५॥
परितो मण्डपं द्व्यंशं भागेन क्रकरीपथम् ।
त्रिभागं मध्यरङ्गच्यूर्ध्वकूटं सस्थूपीनीव्रकम् ॥९६॥
सौम्य—सौख्य ( सौम्य ) मण्डप में तेरह भाग का सम-चतुष्कोण क्षेत्र होता है।
इसके चारो ओर दो भाग से मण्डप एवं एक भाग से क्रकरी-पथ होना चाहिये। तीन
भाग से मध्य रंग एवं ऊपरी भाग में ऊर्ध्व कूट एवं स्थूपी से युक्त नीव्र होता है।
चतुष्कर्णे द्विभागेन त्यक्तमध्याङ्घ्रिकूटकम् ।
दिक्षु द्वित्र्यंशविस्तारायामं कोष्ठचतुष्टयम् ॥९७॥
नन्दादिमुखभद्राङ्गम्राष्टदिग्गतकुड्यकम् ।
चतुरशीतिभिर्युक्तं शतस्तम्भसमन्वितम् ॥९८॥
सर्वालङ्कारसंयुक्तं देवद्विजमहीभृताम् ।
मण्डप के मध्य में स्तम्भ नहीं होना चाहिये। चारो कोणों पर दो भाग से कूट
एवं चारो दिशाओं में दो भाग चौड़े एवं तीन भाग लम्बे चार कोष्ठ होने चाहिये। इसका