मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
२६८ मयमतम्
तदूर्ध्वं गुणाभागेंडशं मध्ये दण्डेन निर्गमम् ।
उत्सेधं विभजेद् विद्वान् नवत्रिंशतिसंख्यया ॥६॥
उसके ऊपर ( के तल ) के तीन भाग करना चाहिये। मध्य का भाग एक अंश
( आधा ) रखना चाहिये एवं निर्गम का माप एक दण्ड रखना चाहिये। बुद्धिमान
स्थपति को ऊँचाई के उन्तालीस भाग करने चाहिये।।६।।
सार्धद्व्यंशमधिष्ठानं पञ्चांशं पाददैर्घ्यकम् ।
तदर्धं प्रस्तरोत्सेधं सत्रिपादयुगांशकम् ॥७॥
ऊर्ध्वभूम्यङ्घ्रिकोत्सेधं सपादद्व्यंशमञ्चकम् ।
जङ्घा तद्द्विगुणा चोर्ध्वं द्व्यंशेन प्रस्तरोदयम् ॥८॥
पादाधिकचतुर्भागमुपरिस्तम्भतुङ्गकम् ।
स्यात् सत्रिभागपादेन प्रस्तरं वेदिकांशकम् ॥९॥
गलोच्चमश्विनीभागं सार्धवेदैस्तु मूर्धनि ।
शेषभागं शिखामानमाहोमं चतुरस्रकम् ॥१०॥
( प्रथम तल में ) ढाई भाग से अधिष्ठान, पाँच भाग से स्तम्भ की लम्बाई ( प्रथम
तल के भवन की ऊँचाई ), ( द्वितीय तल में ) इसके आधे माप की प्रस्तर की ऊँचाई
एवं पौने पाँच भाग से ( तल की ) स्तम्भ की ऊँचाई रखनी चाहिये। ( तीसरे तल
में ) सवा दो भाग से मञ्चक और उसके दुगुने प्रमाण से जङ्घा होनी चाहिये। इसके
ऊपर ( चौथे तल में ) दो भाग से प्रस्तर एवं सवा चार भाग से स्तम्भ की ऊँचाई
रखनी चाहिये। इसके ऊपर सवा एक भाग से प्रस्तर, एक भाग से वेदिका, गल की
ऊँचाई दो भाग से, शिखर सवा चार भाग से तथा शेष भाग से शिखा का प्रमाण रखना
चाहिये। पूरा भवन भूतल से चौकोर होता है।।७-१०।।
रविसंख्या भवेत् सौष्ठी कोष्ठं तावत्तु पञ्जरम् ।
शिखरे वेदनास्यः स्युश्चाल्पनास्या विभूषितम् ॥११॥
स्वस्तिकाकारसंयुक्तं नासिकाभिरलङ्कृतम् ।
प्राग्वदेव तलं चाधः स्तम्भालङ्कारतोरणम् ॥१२॥
सर्वालङ्कारसंयुक्तमेतद्धर्म्यं सुभद्रकम् ।
इस भवन में बारह सौष्ठी, बारह कोष्ठ एवं पञ्जर शिखर पर चार नासी होनी
चाहिये एवं अल्पनासियों से अलङ्कृत होनी चाहिये। इसे स्वस्तिक की आकृति से
एवं नासिका से अलङ्कृत होना चाहिये। तल के नीचे ( अधिष्ठान ) पूर्ववर्णित नियम
के अनुसार होना चाहिये तथा स्तम्भ, अलङ्करण एवं तोरण निर्मित होना चाहिये।
द्वाविंशोऽध्यायः 卐 चतुर्भूम्यादिबहुभूमिविधानम् २६९
सभी अलङ्करणों से युक्त इस भवन ( देवालय ) की संज्ञा 'सुभद्रक' होती है।
✸ श्रीविशालम् ✸
सर्वं प्राग्वत्कूटकोष्ठादियुक्त्या मध्ये मध्ये मस्तकं मण्डलाभम् ।
वृत्ताकारं स्यात् सभानां शिरस्तद्विस्तारार्धेनान्वितं गर्भगेहम् ॥१३॥
शेषं त्र्यंशेनावृतावासपिण्डस्तत्तुल्यं तद्बाह्यतोऽन्धारहारम् ।
नानाधिष्ठानाङ्घ्रिवेदीप्रयोगं नाम्नेदं स्याच्छ्रीविशालं सुहृद्यम् ॥१४॥
जिस देवालय के ( कोणों पर तथा मध्य में ) कूट एवं कोष्ठ आदि हों तथा बीच-
बीच में भवन की छत गोलाई लिये हो, कोणकोष्ठ भी मण्डलाकार हों, गर्भगृह भवन
के विस्तार के आधे पर ( मध्य ) स्थित हो, भीतर की भित्ति की मोटाई शेष का
तृतीयांश हो तथा यही माप बाहर की भित्ति ( अन्धार हार ) का होना चाहिये। इस भवन
के अनुरूप विविध प्रकार के
२७० मयमतम्
तदुपर्यष्टभागेन विभजेत् कूटमंशकम् ।
कोष्ठकस्य तु विस्तारं तदेव द्विगुणायतम् ॥१९॥
कूटशालान्तरे नीडमंशेन परिकल्पयेत् ।
तदूर्ध्वे रसभागे तु कूटमंशेन कोष्ठकम् ॥२०॥
ऊपरी ( दूसरे ) तल की चौड़ाई को आठ भागों में बाँटना चाहिये। एक भाग से
कूट एवं एक भाग से कोष्ठक रखना चाहिये। कोष्ठक की लम्बाई विस्तार की दुगुनी
होनी चाहिये। कूट एवं शाला के मध्य में एक भाग से नीड की रचना करनी चाहिये।
उसके ऊपर ( तृतीय तल ) के छः भाग करने चाहिये एवं कूट तथा कोष्ठक का
निर्माण एक भाग से करना चाहिये ॥१९-२०॥
विस्तारद्विगुणायाममन्तरेऽर्धेन पञ्जरम् ।
ऊर्ध्वभूमे चतुर्भागे मध्ये दण्डेन निर्गमम् ॥२१॥
अष्टास्रं कर्णकूटं स्यात् कोष्ठकं क्रकरीकृतम् ।
महाशिखरमष्टास्रमष्टनास्या विभूषितम् ॥२२॥
कूटकोष्ठकनीडानां संख्यायां पूर्ववत् ततिः ।
अस्याप्युत्सेधभागं च पूर्ववत् परिकल्पयेत् ॥२३॥
भद्रकोष्ठमिदं नाम्ना वेदभौमं दिवौकसाम् ।
( कूट एवं कोष्ठक की ) लम्बाई चौड़ाई की दुगुनी होनी चाहिये। इनके मध्य में
आधे भाग से पञ्जर होना चाहिये। इसके ऊपरी भाग के चार भाग होने चाहिये। मध्य
भाग में एक दण्ड का निर्गम होना चाहिये। कर्णकूट अष्टकोण हों एवं कोष्ठक क्रकरी
( दिशाओं में कोण ) हों। महाशिखर अष्टकोण हो तथा आठ नासियों से अलङ्कृत
हो। कूट, कोष्ठक एवं नीड की संख्या, विस्तार एवं ऊँचाई आदि के माप पूर्वोक्त रीति
से होने चाहिये। चार तल वाला यह देवालय 'भद्रकोष्ठ' संज्ञक होता है ॥२१-२३॥
✺ जयावहम् ✺
सप्तदशकरव्यासं दशभागैर्विभाजयेत् ॥२४॥
नालीगृहं चतुर्भागमंशेनान्धारिका भवेत् ।
अलिन्द्रमंशमंशेन परितः खण्डहर्म्यकम् ॥२५॥
सत्रह हाथ के व्यास को दश भागों में बाँटना चाहिये। चार भाग से नालीगृह
( गर्भगृह ), एक भाग से अन्धारिका ( भीतरी भित्ति ), एक भाग से अलिन्द एवं एक
भाग से चारो ओर खण्ड-हर्म्यक का निर्माण करना चाहिये ॥२४-२५॥
द्वाविंशोऽध्यायः 卐 चतुर्भूम्यादिबहुभूमिविधानम् २७१
कूटं कोष्ठं च नीडं च भागेन परिकल्पयेत् ।
कोष्ठायामं द्विभागं स्याच्छेषं हारा सपञ्जरम् ॥२६॥
कूट, कोष्ठ एवं नीड की रचना एक-एक भाग से करनी चाहिये। कोष्ठ की
लम्बाई चौड़ाई की दुगुनी हो एवं शेष भाग से पञ्जरयुक्त हारा का निर्माण करना
चाहिये।।२६।।
जलस्थलं विहायोर्ध्वं वसुभागैर्विभाजिते ।
भागेन कूटविस्तारं कोष्ठकं द्विगुणायतम् ॥२७॥
हारान्तरे तथांशेन लम्बपञ्जरमीरितम् ।
तदूर्ध्वे रसभागे तु भागं सौष्ठिकविस्तृतम् ॥२८॥
इसके ऊपर ( दूसरे तल ) जलस्थान को छोड़ कर आठ भाग करना चाहिये। एक
भाग से कूट की चौड़ाई रखनी चाहिये। कोष्ठक की लम्बाई चौड़ाई की दुगुनी होनी
चाहिये। हारा के मध्य में एक भाग से लम्ब पञ्जर ( लटकती हुई सजावटी आकृति )
होनी चाहिये। इसके ऊपर ( तीसरे तल पर ) छः भाग करने चाहिये। एक भाग से
सौष्ठिक का विस्तार करना चाहिये।।२७-२८।।
द्विभागं कोष्ठकायामं हारायां क्षुद्रपञ्जरम् ।
तदूर्ध्वे तु त्रिभागेन मध्ये दण्डेन निर्गमम् ॥२९॥
कोष्ठक की लम्बाई ( चौड़ाई की ) दुगुनी होनी चाहिये। हारामार्ग में क्षुद्र-पञ्जर
होना चाहिये। उसके ऊपर ( चतुर्थ तल पर ) के तीन भाग होने चाहिये। मध्य भाग
में एक दण्ड का निर्गम निर्मित होना चाहिये।।२९।।
चतुरस्रमधिष्ठानमष्टास्रं गलमस्तकम् ।
त्रिचतुष्कोष्ठकं तावत् सौष्ठिकं चाष्टपञ्जरम् ॥३०॥
लम्बपञ्जरमष्टौ हि क्षुद्रनीडं द्विरष्टकम् ।
गलनास्यष्टसंयुक्तं कोष्ठकं किञ्चिदुन्नतम् ॥३१॥
नानामसूरकस्तम्भवेदीजालकतोरणम् ।
नानालङ्कारसंयुक्तं नानाचित्रैर्विचित्रितम् ॥३२॥
सोपपीठमधिष्ठानं केवलं वा मसूरकम् ।
स्वस्तिकाकारसंयुक्तं नासिकाभिरलङ्कृतम् ॥३३॥
पूर्ववत् तुङ्गभागं स्यादेतन्नाम्ना जयावहम् ।
इस भवन ( देवालय ) का अधिष्ठान चौकोर होना चाहिये एवं गल तथा मस्तक
२७२ मयमतम्
आठ कोण का होना चाहिये। बारह कोष्ठक, बारह सौष्ठिक एवं आठ पञ्जर होना
चाहिये। आठ लम्बपञ्जर एवं सोलह क्षुद्रनीड होना चाहिये। गल पर आठ नासी हों
एवं कोष्ठक कुछ ऊँचे हों। विभिन्न प्रकार के मसूरक, स्तम्भ, वेदी, जालक (झरोखा,
रोशनदान) एवं तोरण हों। नाना प्रकार के अलङ्करणों एवं विभिन्न प्रकार के अङ्कनों
से युक्त हो। अधिष्ठान उपपीठ से युक्त हो या केवल मसूरक हो। स्वस्तिक की आकृति
निर्मित हो एवं नासिकाओं से सुसज्जित हो। ऊँचे भाग की संरचना पूर्व-वर्णित विधि
से हो। इस देवालय को 'जयावह' संज्ञा दी गई है।।३०-३३।।
✺ भद्रकूटम् ✺
नवपङ्क्तिकरव्यासे दशभागविभाजिते ॥३४॥
गर्भगेहं चतुर्भागं गृहपिण्डस्तदंशके ।
अन्धारमंशमंशेन परितः खण्डहर्म्यकम् ॥३५॥
कूटकोष्ठकनीडानां तारमंशेन योजयेत् ।
कोष्ठकं द्विगुणायामं हारा भागसमन्विता ॥३६॥
उन्नीस हाथ की चौड़ाई को दश भागों में बाँटा जाता है। चार भाग से गर्भगृह,
एक भाग से भित्ति की मोटाई, एक भाग से अन्धार, एक भाग से चारो ओर खण्ड-
हर्म्यक, एक-एक भाग से कूट, कोष्ठक एवं नीड की चौड़ाई रखनी चाहिये। कोष्ठक
की लम्बाई चौड़ाई की दुगुनी होनी चाहिये तथा एक भाग से हारा-मार्ग की रचना होनी
चाहिये।।३४-३६।।
✺ कपोतपञ्जरम् ✺
पञ्चांशे सौष्ठिकव्यासे मध्ये द्व्यंशेन विस्तरम् ।
एकभागविनिष्क्रान्तयुग्मस्तम्भसमन्वितम् ॥३७॥
सोपपीठमधिष्ठानं समञ्चं सवितर्दिकम् ।
सकन्धरशिरोयुक्तं सर्वालङ्कारसंयुतम् ॥३८॥
पादुकोत्तरयोर्मध्ये नवांशेनोपपीठकम् ।
मसूरकं द्विभागोच्चं द्विगुणं स्तम्भदैर्घ्यकम् ॥३९॥
सार्धांशं प्रस्तरोत्सेधमर्धांशं वेदिकोदयम् ।
उत्तरादिकपोतान्तं गलोदयमितीरितम् ॥४०॥
सौष्ठिक का व्यास मध्य में पाँच में से दो भाग से निर्मित होना चाहिये। एक भाग
से विनिष्क्रान्त का निर्माण होना चाहिये, जो दो स्तम्भों से युक्त हो। यह उपपीठ,
अधिष्ठान, मञ्च, वितर्दिक, कन्धर एवं शिरोभाग से युक्त हो तथा सभी अलङ्करणों से
द्वाविंशोऽध्यायः चतुर्भूम्यादिबहुभूमिविधानम् २७३
युक्त हो। पादुक से उत्तर के मध्य नौ भाग से उपपीठ, दो भाग ऊँचा मसूरक, उसका
दुगुना ऊँचा स्तम्भ, आधे भाग से प्रस्तर की ऊँचाई, आधे भाग से वेदिका तथा उत्तर
से प्रारम्भ कर कपोत तक गल का निर्माण करना चाहिये।।३७-४०।।
पञ्जराकृतिसंयुक्तं कपोतात्तु विनिर्गतम् ।
यथाशोभं यथायुक्ति तथा शक्तिध्वजान्वितम् ।।४१।।
'कपोतपञ्जरं ह्येतत् प्रासादे सार्वदेशिके ।
हारायां वाऽथ शालायां मध्ये मध्ये तु योजयेत् ।।४२।।
पञ्जर की आकृति से युक्त एवं कपोत से विनिर्गत (कपोतपञ्जर) होता है। जिस
प्रकार अच्छा लगे एवं ठीक हो, उस प्रकार शक्ति-ध्वज से युक्त होना चाहिये। यह
कपोतपञ्जर सभी प्रकार के देवालय के अनुकूल होता है। इसे हारा के या शाला के
मध्य में निर्मित करना चाहिये।।४१-४२।।
✵ पुनः भद्रकूटम् ✵
कूटकोष्ठकनीडं चैवान्तरप्रस्तरान्वितम् ।
जलस्थलं विहायोर्ध्वभूमावष्टांशसौष्ठिकम् ।।४३।।
द्विगुणं कोष्ठकायामं तयोर्मध्ये तु पञ्जरम् ।
तदूर्ध्वे रसभागे तु सौष्ठिकोष्ठं तु पूर्ववत् ।।४४।।
विजयस्य यथा प्रोक्तं शेषमूर्ध्वं तु योजयेत् ।
कूटकोष्ठादि सर्वाङ्गं पूर्ववत् संख्यया विदुः ।।४५।।
महानीडं द्विरष्टौ स्यान्नाम्नेदं भद्रकूटकम् ।
कूट, कोष्ठक एवं नीड अन्तर-प्रस्तर से युक्त होते हैं। इसके ऊपर जल-स्थल
को छोड़ कर आठ भाग बचते हैं। एक भाग से सौष्ठिक का निर्माण होना चाहिये।
कोष्ठक की लम्बाई (चौड़ाई की) दुगुनी होनी चाहिये। उनके मध्य में पञ्जर होना
चाहिये। उसके ऊपर छः भाग करना चाहिये। सौष्ठिक एवं कोष्ठ पहले की भाँति होने
चाहिये। इसके ऊपरी भाग में जो योजना 'विजय' के लिये कही गयी है, वही यहाँ
भी होनी चाहिये। कूट एवं कोष्ठ आदि सभी अङ्गों की संख्या पूर्व-वर्णित होनी
चाहिये। महानीड की संख्या सोलह होनी चाहिये। इस देवालय की संज्ञा 'भद्रकूट'
होती है।।४३-४५।।
✵ मनोहरम् ✵
तदेवान्यदलङ्कारं शालामध्ये सभद्रकम् ।।४६।।
वृत्तग्रीवाशिरोयुक्तमेतन्नाम्ना मनोहरम् ।
मयं०-१८
२७४ मयमतम्
यदि भवन के अलङ्करण भिन्न हों एवं शालाओं के मध्य में भद्रक हों, ग्रीवा एवं
शिरोभाग गोलाई लिये हों तो इस देवालय का नाम 'मनोहर' होता है।।४६।।
❋ आवन्तिकम् ❋
तदेवान्यदलङ्कारं वेदास्त्रं कन्धरं शिरः ॥४७॥
नानामसूरकस्तम्भवेदिकाद्यैरलङ्कृतम् ।
नाम्नावन्तिकमित्युक्तं शम्भोर्मन्दिरमुत्तमम् ॥४८॥
यदि अलङ्करण भिन्न हों, कन्धर एवं शिरो-भाग चौकोर हों, विभिन्न प्रकार के
मसूरक, स्तम्भ एवं वेदिका आदि से अलङ्कृत हों तो इस देवालय की संज्ञा 'आवन्तिक'
होती है। यह भवन शिव-मन्दिर के लिये उपयुक्त होता है।।४७-४८।।
❋ सुखावहम् ❋
त्रिःसप्तहस्तविपुले चतुरंशनाली
धर्मांशकेंऽशमभितो गृहपिण्डमानम्।
अन्थारमंशमभितोंऽशकमङ्गहारं
कूटं च नीडमथ कोष्ठकमंशतारम् ॥४९॥
शालायतं द्विगुणमंशकतारहारं
वातायनैर्मकरतोरणकैर्विचित्रम् ।
त्यक्त्वा जलस्थलमुपर्यपि चाष्टभागे
कूटं च नीडमथ कोष्ठकमंशतत्या ॥५०॥
यदि विस्तार इक्कीस हाथ हो तो उसके दश भाग करने चाहिये। चार भाग से
नाली ( गर्भगृह ), एक भाग से चारो ओर भीतरी भित्ति की मोटाई, एक भाग से
अन्धार, उसके चारो ओर एक भाग से हारामार्ग का विस्तार तथा एक भाग से कूट,
नीड एवं कोष्ठक का विस्तार रखना चाहिये। शाला की लम्बाई चौड़ाई की दुगुनी होनी
चाहिये। हारा-मार्ग की चौड़ाई एक भाग से रखनी चाहिये। वातायन ( खिड़की,
झरोखा ) एवं मकर-तोरण से सज्जा करनी चाहिये। इसके ऊपरी भाग में जल-भाग
को छोड़ कर आठ भाग करना चाहिये। कूट, नीड एवं कोष्ठक का विस्तार एक भाग
से रखना चाहिये।।४९-५०।।
शालायतं द्विगुणमूर्ध्वतले षडंशे
सौष्ठ्यंशमंशविपुलं द्विगुणायतं स्यात् ।
कोष्ठं च नीडविपुलं हि तदर्थभागं
चोर्ध्वं युगांशनयनांशकमध्यभद्रम् ॥५१॥
द्वाविंशोऽध्यायः 卐 चतुर्भूम्यादिबहुभूमिविधानम् २७५
शाला की लम्बाई चौड़ाई की दुगुनी होती है। उसके ऊपर (के तल के) छः
भाग होते हैं। सौष्ठी की चौड़ाई एक भाग से एवं उसकी लम्बाई उसके दुगुनी होती
है। कोष्ठ एवं नीड की चौड़ाई आधे भाग से होनी चाहिये। उसके ऊपर के (तल के)
चार भाग होने चाहिये एवं दो भाग से मध्य-भद्र की रचना करनी चाहिये।।५१।।
दण्डेन निर्गममुपर्यपि भद्रनीडं
सार्धं द्विदण्डविपुलं गलनासिकं च।
वृत्ताभकन्धरवितर्दिकमस्तकं स्या-
दष्टार्धनासिकमदभ्रमथाल्पमष्टौ ।।५२।।
दण्ड-प्रमाण से निर्गम होना चाहिये। इसके ऊपर भद्रनीड निर्मित होना चाहिये।
गल एवं नासिक ढाई दण्ड चौड़ा होना चाहिये। कन्धर, वितर्दिक एवं मस्तक गोलाई
लिये होना चाहिये। आठ अर्धनासिक एवं आठ अल्पनासिक होना चाहिये।।५२।।
कूटं च नीडमथ कोष्ठकमुन्नतंस्था-
दा
२७६ मयमतम्
प्रस्तरं तलिपमञ्चवेदिकं कन्धरं शिखरकुम्भकं क्रमात्।
पञ्चभौममुदितं विशालके नन्दपङ्क्तिभिरथेन्द्रियांशकैः ॥५७॥
पाँच तल के देवालय का विधान—पाँच तल के देवालय की ऊँचाई को
अड़तालीस बराबर भागों में बाँटना चाहिये। पौने तीन भाग से कुट्टिम, साढ़े पाँच भाग
से चरण (स्तम्भ, प्रथम तल की ऊँचाई), ढाई भाग से मञ्च, सवा पाँच भाग से
पादक (स्तम्भ, द्वितीय तल की ऊँचाई), ढाई भाग से प्रस्तर, पाँच भाग से तलिप
(तृतीय तल की ऊँचाई), सवा दो भाग से मञ्च, पौने पाँच भाग से अङ्घ्रि (स्तम्भ,
चतुर्थ तल की ऊँचाई), दो भाग से प्रस्तर, सवा चार भाग से तलिप (स्तम्भ, पाँचवें
तल की ऊँचाई) पौने दो भाग से मञ्च, एक भाग से वेदिका, दो भाग से कन्धर, सवा
चार भाग से शिखर एवं दो भाग से कुम्भ की रचना करनी चाहिये। पाँच तल के
देवालय की चौड़ाई को नौ, दश या ग्यारह बराबर भागों में बाँटना चाहिये।
✵ षडाद्यैकादशभूम्यन्तविधानम् ✵
उच्छ्रये तदधः षड्भिर्गुणांशैरङ्घ्रिकं तलम्।
षड्भौममेवमुद्दिष्टं ताराभागं तथा भवेत् ॥५८॥
(पूर्ववर्णित पाँच तल से ऊपर तल में) निचले तल से ऊपर ऊँचाई में छः भाग
से अङ्घ्रि (स्तम्भ, तल की ऊँचाई) एवं तीन भाग से तल (अधिष्ठान) निर्मित
करना चाहिये। इसकी चौड़ाई पूर्ववर्णित नियम के अनुसार होनी चाहिये॥५८॥
तदधः सार्धषड्भागैः सपादगुणभागकैः।
स्तम्भं मसूरकं कुर्यात्तारे रुद्रार्कभागतः ॥५९॥
सप्तभौममिदं प्रोक्तं विमानं सार्वदेशिकम्।
(सातवें तल के लिये) निचले तल के ऊपर ऊँचाई में साढ़े छः भाग से स्तम्भ
एवं मसूरक सवा तीन भाग से निर्मित करना चाहिये तथा विस्तार को ग्यारह या बारह
भाग से रखना चाहिये। सात तल वाला यह विमान प्रत्येक स्थान एवं अवसर के लिये
उपयुक्त होता है॥५९॥
तदधो मुनिभिः सार्धगुणांशैः स्तम्भकुट्टिमम् ॥६०॥
धर्मरुद्रार्कभागैस्तु सप्रयोदशभागिकैः।
अष्टभौमं वदन्त्यस्मिन्नेवं प्राज्ञा मुनीश्वराः ॥६१॥
उसके ऊपरी तल में सात भाग से स्तम्भ एवं साढ़े तीन भाग से कुट्टिम रखना
चाहिये। इसकी चौड़ाई को दश, ग्यारह, बारह या तेरह भाग में बाँटना चाहिये। आठ
तल के मन्दिर के निर्माण के विषय में मुनियों का विचार इस प्रकार वर्णित है।
४. अध्याय २६-३६: मण्डप, प्राकार, परिवार-देवता मन्दिर एवं प्रतिष्ठा उपसंहार
द्वाविंशोऽध्यायः 卐 चतुर्भूम्यादिबहुभूमिविधानम् २७७
तदधः सार्धसप्तांशैः सत्रिपादगुणांशकैः ।
स्तम्भं च तलकं कुर्यात्तारेऽंशं तत्र पूर्ववत् ॥६२॥
एवं नवतलं प्रोक्तं दशभौममथोच्यते ।
उसके ऊपरी तल ( नौ तल ) में निचले तल से ऊपर साढ़े सात भाग से स्तम्भ
एवं पौने चार भाग से तल ( अधिष्ठान ) बनाना चाहिये। तल का विस्तार पूर्ववत् होना
चाहिये। इस प्रकार नौ तल का मन्दिर निर्मित होता है। अब दशवें तल का वर्णन
किया जा रहा है॥६२॥
तदधोऽष्टयुगांशैस्तु पादं मसूरकं भवेत् ॥६३॥
तारे पूर्वोक्तभागैस्तु मनुभागैरथापि वा।
(दसवें तल के लिये ) निचले तल के ऊपर आठ भाग से पाद ( स्तम्भ, तल
की ऊँचाई ) एवं चार भाग से मसूरक होता है। चौड़ाई पूर्वोक्त रीति से या चौदह भाग
में बाँटनी चाहिये॥६३॥
तदधः सार्धवस्वंशैः सपादयुगभागिकैः ॥६४॥
स्तम्भं मसूरकं कुर्यात्तारे तद्वच्च पक्षकैः ।
तथा द्विरष्टभागैस्तु सप्तदशांशकैस्तु वा ॥६५॥
एकादशतलं प्रोक्तं द्वादशं क्षममुच्यते ।
इसके ऊपरी तल ( ग्यारह तल ) में निचले तल के ऊपर साढ़े आठ भाग से
स्तम्भ एवं सवा चार से मसूरक निर्मित करना चाहिये। चौड़ाई पूर्ववर्णित अथवा
पन्द्रह, सोलह या सत्रह भागों में बाँटनी चाहिये। इस प्रकार ग्यारह तल का देवालय
निर्मित होता है। अब बारह तल के देवालय का वर्णन किया जा रहा है॥६४-६५॥
❋ द्वादशतलविधानम् ❋
तदधो नन्दनन्दार्धभागैः स्तम्भं मसूरकम् ॥६६॥
तारे द्विरष्टभागादि यावदर्कद्वयांशकम् ।
गृहपिण्ड्यलिन्द्रहारा गर्भागाराद्वहिः क्रमात् ॥६७॥
हर्म्यस्यावधिकं यावन्नीयते तावदंशकैः ।
द्वित्रिवेदैषु षड्भागैः प्रागुक्तांशैस्तु वा गृहम् ॥६८॥
बारह तल के देवालय का विधान—( बारह तल के देवालय के लिये )
निचले तल ( की भूमि ) के नौ भाग करने चाहिये। साढ़े चार भाग से मसूरक होने
चाहिये। चौड़ाई को सोलह से चौबीस भागों में बाँटना चाहिये। गर्भगृह से लेकर भवन
२७८ मयमतम्
की सीमा तक क्रमशः गृहपिण्ड ( भित्ति ), अलिन्द्र एवं हारामार्ग को उनके भाग के
अनुसार रखना चाहिये। गर्भगृह दो, तीन, चार या छः भाग से या पूर्वोक्त भाग से
निर्मित करना चाहिये।।६६-६८।।
एकार्धेनाथवालिन्द्रं शेषं कुड्येषु योजयेत्।
केचित् त्रिनवभिर्भागैर्वदन्ति द्वादशावनौ ।।६९।।
षट्कुड्यं पञ्चसालिन्द्रं बहिः कूटादिशोभितम्।
कूटं कोष्ठं च नीडं च क्षुद्रशालेभतुण्डकम् ।।७०।।
अलिन्द्र की संरचना एक या डेढ़ भाग से करनी चाहिये एवं शेष भाग से भित्ति
निर्मित होनी चाहिये। कुछ विद्वानों के अनुसार बारहवें तल के सत्ताईस भाग करने
चाहिये। छः भाग से भित्ति एवं पाँच भाग से अलिन्द्र निर्मित होना चाहिये। बाहरी भाग
में कूटादि से अलङ्करण होना चाहिये। वहाँ कूट, कोष्ठ, नीड, क्षुद्र-शाल एवं गज-
शुण्ड निर्मित होना चाहिये।।६९-७०।।
यथाशोभमलङ्कारं तथा युञ्जीत बुद्धिमान्।
युग्महस्तैरयुग्मैर्वा योजयेदेवमिच्छया ।।७१।।
इन अलङ्करणों को इस प्रकार निर्मित करना चाहिये, जिससे वे सुन्दर लगें। इन्हें
सम-हस्तप्रमाण से या विषम-हस्तप्रमाण से निर्मित करना चाहिये।।७१।।
युग्मांशे द्व्यंशकं वाऽपि कूटव्यासं द्विरायतम्।
शालायाश्चतुरंशैर्वा युग्मे युग्मांशकैर्विदुः ।।७२।।
नानाभागैरलङ्कारैरन्यैरुक्तं मुनीश्वरैः।
तथा वा तत्र युञ्जीयात्प्राज्ञः शिल्पिषु बुद्धिमान् ।।७३।।
यदि प्रमाण सम संख्या में हों तो कूट का व्यास दो भाग से एवं चौड़ाई उसके
दुगुनी रखनी चाहिये। अथवा शाला (कूट) की चौड़ाई चार भाग से रखनी चाहिये।
सम संख्या का माप होने पर सभी भागों का माप सम संख्या में होना चाहिये। श्रेष्ठ
मुनियों ने विभिन्न भागों एवं अलङ्करणों का वर्णन किया है। बुद्धिमान शिल्पी को उन
स्थानों पर उसी विधि से निर्माण करना चाहिये।।७२-७३।।
✺ खण्डहर्म्यम् ✺
तलमेकं भवेद् ग्रासं खण्डहर्म्यं चतुःस्थले।
द्वितलं पञ्चषट्सप्तभूमावेव विधीयते ।।७४।।
त्रितलं चाष्टभूमे तु नन्दपङ्क्तितले तथा।
पञ्चभौमं चतुर्भौमं द्वादशैकादशे तले ।।७५।।
द्वांविंशोऽध्यायः 卐 चतुर्भूम्यादिबहुभूमिविधानम् २७९
खण्डहर्म्य में यदि देवालय चार तल का हो तो प्रथम तल की ऊँचाई पर ग्रास
( निर्माण का एक विशिष्ट अङ्ग ) होना चाहिये। यदि भवन पाँच, छः या सात तल
का हो तो दूसरे तल की ऊँचाई पर; यदि भवन आठ, नौ या दश तल का हो तो
तीसरे तल पर; यदि ग्यारह तल का भवन हो तो ग्रास चौथे तल पर तथा बारह तल
वाले भवन में पाँचवें तल पर निर्मित होना चाहिये।।७४-७५।।
✱ कूटकोष्ठादि ✱
मूलतः कूटकोष्ठादीन् यः कर्तुं सम्यगीहते।
तले तले विभागांश्च यथायुक्त्या प्रयोजयेत् ॥७६॥
कूटकोष्ठादिसर्वाङ्गमपर्युपरि पूर्ववत्।
कूटकोष्ठकनीडाद्यैर्भेदैराख्या यथोदिता ॥७७॥
जो व्यक्ति प्रथम तल से कूट-कोष्ठ आदि का उचित रीति से निर्माण करना
चाहता है, उसे प्रत्येक तल का विभाग नियमानुसार करना चाहिये। प्रत्येक ऊपरी तल
में कूट-कोष्ठ आदि अङ्गों को पहले जिस प्रकार कहा गया है, उसी ढंग से निर्मित
करना चाहिये। कूट, कोष्ठ एवं नीड आदि भेदों का वर्णन पहले किया जा चुका
है।।७६-७७।।
पूर्वं तैर्भेदकैर्युक्तस्याख्या धाम्नस्तथा भवेत्।
आद्वादशतलादेवं युञ्जीयाद् द्वितलादितः ॥७८॥
कर्णे मध्ये तयोर्मध्ये कूटं कोष्ठं च पञ्जरम्।
कर्तव्यं मानसूत्रात्तु तेषां निर्गममुच्यते ॥७९॥
( कूटादि ) भेदों का जिस भवन में जिस प्रकार प्रयोग करना चाहिये, उसका
वर्णन पहले किया जा चुका है। इनका प्रयोग दूसरे तल से प्रारम्भ कर बारह तलपर्यन्त
करना चाहिये। भवन के कर्ण ( कोने ) पर कूट, मध्य भाग में कोष्ठ एवं कूट तथा
कोष्ठ के मध्य में पञ्जर का निर्माण करना चाहिये। उनके निर्गम का निर्माण मानसूत्र
से करना चाहिये।।७८-७९।।
स्वव्यासाधं तथार्धार्धं दण्डं वा द्वित्रिदण्डकम्।
अन्तर्विन्यासदेशं तु मानसूत्रं न योजयेत् ॥८०॥
ऋजुसूत्रप्रमाणान्तं तदङ्गे विपदां पदम्।
तस्मात् कूटादिसर्वाङ्गं मानसूत्राद् बहिर्नयेत् ॥८१॥
निर्गमों का माप ( उस तल ) की चौड़ाई का आधा अथवा उसका भी आधा
( चौड़ाई का चौथाई भाग ) रखना चाहिये या उनका माप एक, दो अथवा तीन दण्ड
२८० मयमतम्
होना चाहिये। इसके भीतरी भाग के माप के लिये मानसूत्र का प्रयोग नहीं करना
चाहिये। ऋजुसूत्र माप के अन्त तक होता है। इसका बीच में भङ्ग होना विपत्तिकारक
होता है; इसलिये कूट आदि सभी अङ्गों का निर्माण मानसूत्र से हटकर करना
चाहिये।।८०-८१।।
चतुरस्रं तु वस्वस्रं षोडशास्रं तु वर्तुलम्।
मस्तकं स्तूपिकोपेतं कूटं कर्णयुतं मतम् ॥८२॥
मध्यनासिसमोपेतमर्धकोटिसमन्वितम् ।
मुखपट्टिकयोपेतं शक्तिध्वजसमायुतम् ॥८३॥
कर्ण पर निर्मित कूट का शीर्ष चौकोर, अष्टकोण, षोडशकोण अथवा गोलाकार
एवं स्तूपिका से युक्त होता है। इसके मध्य भाग में नासि एवं अर्धकोटि निर्मित होता
है। यह मुखपट्टिका एवं शक्तिध्वज से युक्त होता है।।८२-८३।।
अनेकस्थूपिकोपेतं कोष्ठकं मध्यमे भवेत् ।
हस्तिपृष्ठनिभं पृष्ठे शालाकारं मुखं मुखे ॥८४॥
पञ्जरं विहितं कूटकोष्ठयोरन्तरे बुधैः ।
पार्श्ववक्त्रं तदेवेष्टं हस्तितुण्डं समण्डितम् ॥८५॥
अनेक स्तूपिकाओं से युक्त कोष्ठ मध्य में होना चाहिये। इसका पिछला भाग हाथी
के पीठ की समान एवं अग्र भाग शाला के आकार का होना चाहिये। कूट एवं कोष्ठ
मध्यपञ्जर होना चाहिये। इसका मुख पार्श्व में होना चाहिये एवं गज-शुण्ड से सुसज्जित
होना चाहिये।।८४-८५।।
एष जातिक्रमः प्रोक्तः कर्णकोष्ठसमन्वितम् ।
मध्ये कूटं तयोर्मध्ये क्षुद्रकोष्ठादिशोभितम् ॥८६॥
छन्दमेतत् समुद्दिष्टं कूटं वा कोष्ठकं तु वा ।
अन्तरप्रस्तरोपेतान्निम्नं वोन्नतमेव वा ॥८७॥
विकल्पमिति निर्दिष्टमाभासं तद्विमिश्रितम् ।
क्षुद्रालपमध्यमोत्कृष्टं हर्म्याणामेवमीरितम् ॥८८॥
जात्यादिभेदकैर्युक्तं विमानं सम्पदां पदम् ।
विपरीते विनाशाय भवेदेवेति निश्चयः ॥८९॥
'जाति' ( भवन का प्रकारविशेष ) का वर्णन इस प्रकार किया गया। ( छन्दभवन
में ) भवन के कर्ण ( कोणों ) पर कोष्ठ, मध्य भाग में कूट तथा इन दोनों के मध्य
द्वाविंशोऽध्यायः 卐 चतुर्भूम्यादिबहुभूमिविधानम् २८१
में क्षुद्रकोष्ठ आदि निर्मित हों तो उसे 'छन्द' कहा जाता है। (विकल्प भवन में) कूट
या कोष्ठ अन्तर-प्रस्तर से युक्त हों, ऊँचे या नीचे हों तो उस भवन को 'विकल्प' कहा
जाता है। 'आभास' भवन में इन दोनों व्यवस्थाओं के मिश्रित रूप का प्रयोग किया
जाता है। यह छोटे, मध्यम एवं उत्तम श्रेणी के भवनों के अनुकूल होता है। 'जाति'
आदि भेदों से युक्त देवालय सम्पत्ति प्रदान करते हैं। इसके विपरीत रीति से निर्मित
देवालय विनाश के कारण बनते हैं॥८९॥
षडष्टास्रे च वृत्ते च द्व्यस्रवृत्ते च तत् क्रमात् ।
पञ्चाष्टनवपङ्क्त्यंशे व्यासैकांशेन बाह्यतः ॥९०॥
वर्तयेत्तु तदाकृत्या कोटिच्छेदार्थमीरितम् ।
चतुरस्रस्य नाहेन योजयेत्तु समं यथा ॥९१॥
तया वर्तनया तेषां मानं सम्पूर्णमिष्यते ।
मानं धाम्नस्तु सम्पूर्णं जगत्सम्पूर्णता भवेत् ॥९२॥
(कूट आदि के) षट्कोण, अष्टकोण, वृत्ताकार, द्व्यस्रवृत्ताकार (दो कोण एवं
अगले सिरे पर गोलाई) होने पर उनके व्यास के क्रमशः पाँच, आठ, नौ एवं दश
भाग करने चाहिये एवं एक भाग से उसके बाहर उसी की आकृति का घेरा बनाना
चाहिये। यहाँ कोटि के छेद के लिये स्थान रक्खा जाता है। चौकोर के घेरे को इस
प्रकार रखना चाहिये, जिससे माप सम बना रहे। उनकी वर्तनी से उनका (कूटादि
का) मान पूर्ण होता है। यदि भवन का मान पूर्ण होता है तो संसार सम्पूर्णता को
प्राप्त होता है (अर्थात् गृहकर्ता को समृद्धि एवं पूर्णता इस संसार में प्राप्त होती
है)॥९०-९२॥
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन कुर्यात् संलक्ष्य बुद्धिमान् ।
एवं संक्षेपतः प्रोक्तं प्रासादानां तु लक्षणम् ॥९३॥
एकादिद्वादशान्तं ह्युदयविपुलभागं करैस्तारमानं
चोत्सेधं कूटकोष्ठाद्यवयवकरणं नाहभेदं क्रमेण ।
प्रोक्तं संक्षिप्य सम्यङ् मुनिभिरवितथैर्ब्रह्मपूर्वैर्यथोक्तं
नानाभेदैर्विमानं प्रियतरमनघं तैतलानां मयेन ॥९४॥
इति मयमते वास्तुशास्त्रे चतुर्भूम्यादिबहुभूमि-
विधानो नाम द्वाविंशोऽध्यायः
इसलिये बुद्धिमान व्यक्ति को प्रत्येक अङ्ग का निर्माण अत्यन्त सावधानीपूर्वक
२८२ मयमतम्
करना चाहिये। इस प्रकार मन्दिरों का लक्षण संक्षेप में वर्णित किया गया। एक तल
से लेकर बारह तल तक के भवन की ऊँचाई एवं चौड़ाई हस्त-मान से वर्णित की
गई है। कूट एवं कोष्ठ आदि अङ्गों के भेदों का क्रमानुसार वर्णन किया गया। देवों
के प्रिय एवं पवित्र विमानों एवं उनके विभिन्न भेदों का दोषहीन वर्णन जिस प्रकार
प्राचीन ऋषियों ने किया, जिसका प्रथमतः ब्रह्मा ने उपदेश दिया, उसे संक्षिप्त करके
मय ने यहाँ प्रस्तुत किया।।९३-९४।।
व्याख्यात्मक टिप्पणी
१. चार तल वाले भवन
चार तल वाले भवनों का वर्णन मानसार ( अ. २२-३० ) एवं शिल्परत्न ( पूर्व.
अ. ३७ ) में प्राप्त होता है
२. मकरतोरण ( श्लोक ५० )
मकरतोरण का उल्लेख शिल्परत्न ( पू. अ.-२३.१२-१३ ) में प्राप्त होता है,
जो इस प्रकार है—
पञ्चवक्त्रसमायुक्तं पार्श्वयोर्मकरास्यकम्।
मध्ये पूरिमसंयुक्तं नानाचित्रसमन्वितम्।।
नानालङ्कारसंयुक्तं यत्तन्मकरतोरणम्।
देवद्विजनृपाणां तु शस्तं मकरतोरणम्।।
यह तोरण देवालय एवं ब्राह्मणों के गृह के अनुकूल कहा गया है।
अथ त्रयोविंशोऽध्यायः
( प्राकारपरिवारविधानम् )
✵ तत्र प्राकारविधानम् ✵
रक्षार्थं च विमानानां शोभार्थं च तथाऽधुना ।
परिवारनिवेशार्थं प्राकारं प्रोच्यते बुधैः ॥१॥
चारदीवारी एवं सहायक देवपरिवार के स्थान का विधान—बुद्धिमान
ऋषियों ने देवालय की रक्षा के लिये, शोभा के लिये एवं परिवार ( सहायक देव,
सेवकवर्ग ) के लिये प्राकार का वर्णन जिस प्रकार किया गया है, उसका वर्णन अब
किया जा रहा है॥१॥
✵ प्राकारमानम् ✵
कृत्वा चतुष्पदं मूलप्रासादस्य तु विस्तृतम् ।
आद्यं सालं महापीठं पदैः षोडशभिर्युतम् ॥२॥
मण्डूकाख्यं द्वितीयं स्यान्मध्यं भद्रमहासनम् ।
चतुर्थं सुप्रतीकान्तं पञ्चमं चेन्द्रकान्तकम् ॥३॥
प्राकार का मान—प्रधान देवालय की चौड़ाई को चार पद में बाँटना चाहिये।
प्रथम साल ( प्राकार ) की संज्ञा 'महापीठ' है एवं इसमें सोलह पद होते हैं। द्वितीय
साल की संज्ञा 'मण्डूक' ( चौंसठ पद ), मध्य साल ( तृतीय ) की संज्ञा 'भद्रमहासन'
( एक सौ छत्तीस पद ), चतुर्थ 'सुप्रतीकान्त' ( चार सौ चौरासी पद ) एवं पाँचवें की
संज्ञा 'इन्द्रकान्त' ( एक हजार चौबीस पद ) होती है ( ये पाँच प्रकार होते हैं )।
एवं युग्मपदैर्युक्तमयुग्मैरथ वक्ष्यते ।
एकमाद्यं विमानं स्यादाद्यं सालं तु पीठकम् ॥४॥
द्वितीयं स्थण्डिलं सालं मध्यं चोभयचण्डितम् ।
सुसंहितं चतुर्थं स्यादीशकान्तं तु पञ्चमम् ॥५॥
( उपर्युक्त प्राकारभेद ) युग्म संख्या वाले पदों के अनुसार वर्णित हैं। अब असम
संख्या के अनुसार ( प्राकार ) वर्णन किया जा रहा है। विमान ( देवालय ) का मात्र
एक पद होता है। प्रथम साल 'पीठ' ( नौ पद ), दूसरा 'स्थण्डिल' ( उनचास पद ),
२८४ मयमतम्
मध्य साल ( तृतीय ) 'उभयचण्डित' ( एक सौ उनहत्तर पद ) संज्ञक, चौथा 'सुसंहित'
( चार सौ इकतालीस ) संज्ञक एवं पाँचवाँ 'ईशकान्त' ( नौ सौ इकसठ पद ) संज्ञक
होता है।।४-५।।
चतुरस्त्रीकृते तेन मुखायाममिहोर्ध्वतः ।
पादाधिकमथाध्यर्धं पादोनद्विगुणं क्रमात् ॥६॥
द्विगुणं द्विगुणार्धं च त्रिगुणं वा चतुर्गुणम् ।
मुखायाममिति प्रोक्तं प्राकाराणां विशेषतः ॥७॥
चतुष्कोण क्षेत्र के अग्र भाग की लम्बाई का वर्णन ऊपर किया जा चुका है। यह
लम्बाई ( मन्दिर के चौड़ाई की ) क्रमशः सवा, डेढ़, तीन चौथाई एवं दुगुनी होती है।
प्राकारों के अग्र भाग की लम्बाई दुगुनी, ढाई गुनी, तीन गुनी या चार गुनी कही गई
है।।६-७।।
क्षुद्राणामल्पहर्म्याणां स्वव्यासार्धप्रमाणतः ।
अन्तर्मण्डलकं कुर्यात् सत्रिहस्तं तु तत्समम् ॥८॥
द्वितीयं हि तृतीयं तु तस्मात् पञ्चकराधिकम् ।
तस्मात् ससप्तहस्तं तु तत्समं स्याच्चतुर्थकम् ॥९॥
छोटे मन्दिरों में भी अत्यन्त छोटे मन्दिर की चौड़ाई के डेढ़ भाग की दूरी पर
( प्रथम प्राकार ) 'अन्तर्मण्डल', उसके आगे उतनी ही दूरी तीन हाथ पर दूसरा प्राकार,
उससे पाँच हाथ दूरी पर तीसरा प्राकार, उससे सात हाथ की दूरी पर चौथा प्राकार एवं
नौ हाथ की दूरी पर पाँचवाँ प्राकार होना चाहिये।।८-९।।
नवहस्तसमायुक्तं तत्समं पञ्चमं भवेत् ।
मध्यमानां स्वतारार्धमन्तर्मण्डलमिष्यते ॥१०॥
तत्समं पञ्चहस्तेन संयुक्तं स्याद् द्वितीयकम् ।
सप्तहस्ताधिकं तस्मात् सालमुक्तं तृतीयकम् ॥११॥
नवहस्ताधिकं तस्माच्चतुर्थं सालमीरितम् ।
एकादशकरैर्युक्तं तत्समं पञ्चमं भवेत् ॥१२॥
( छोटे मन्दिर के ) मध्यम कोटि के देवालय की चौड़ाई के आधे माप की दूरी
पर अन्तरमण्डल की रचना की जाती है। दूसरा प्राकार पाँच हाथ की दूरी पर होता
है। तीसरा साल ( प्राकार ) सात हाथ की दूरी पर, चतुर्थ साल नौ हाथ की दूरी पर
एवं पाँचवाँ ग्यारह हाथ की दूरी पर होना चाहिये।।१०-१२।।
त्रयोविंशोऽध्यायः 卐 प्राकारपरिवारविधानम् २८५
उत्तमानां स्वतारार्धमाद्यं सालं प्रकीर्तितम् ।
तत्समं सप्तहस्तेन संयुक्तं स्याद् द्वितीयकम् ।।१३।।
नवहस्ताधिकं तस्मात् तृतीयं सालमुच्यते ।
तस्मादेकादशाधिक्यं तत्समं तु चतुर्थकम् ।।१४।।
त्रयोदशकरैर्युक्तं तत्समं पञ्चमं भवेत् ।
एवं क्षुद्राल्पमध्यानामुत्कृष्टानां प्रकीर्तितम् ।।१५।।
(छोटे देवालयों के) उत्तम श्रेणी के देवालयों का प्रथम साल उसकी चौड़ाई के
आधे माप की दूरी पर होना चाहिये। दूसरा साल सात हाथ की दूरी पर, तीसरा नौ
हाथ की दूरी पर, चौथा ग्यारह हाथ की दूरी पर एवं पाँचवाँ तेरह हाथ की दूरी पर
होना चाहिये। इस प्रकार अत्यन्त छोटे, क्षुद्र-मध्यम एवं क्षुद्र-उत्तम कोटि के देवालय
के सालों (प्राकारों) का वर्णन किया गया।।१३-१५।।
एतेन कारयेद् धीमान् पूर्वोक्तेन क्रमेण वा ।
प्राकारं परितस्तस्मान्मुखायामं तु पूर्ववत् ।।१६।।
भित्त्यभ्यन्तरमानेन मानयेन्मानवित्तमः ।
भित्तिमध्येन बाह्येन कैश्चिदुक्तं तु सूरिभिः ।।१७।।
बुद्धिमान व्यक्ति को इस विधि से या पूर्वोक्त क्रम से चारो ओर प्राकार की रचना
करनी चाहिये। इसके मुखभाग की लम्बाई पूर्व-वर्णित रखनी चाहिये। माप के ज्ञाता
भित्ति के भीतर से माप लेते हैं। कुछ विद्वानों के अनुसार भित्ति के मध्य से एवं कुछ
के अनुसार भित्ति के बाहर से माप लेना चाहिये।।१६-१७।।
✺ प्राकारभित्तिः ✺
अन्तर्मण्डलभित्तेश्च विष्कम्भं सार्धहस्तकम् ।
तस्मात् त्रित्र्यङ्गुलाधिक्याद् द्विहस्तान्तं यथाक्रमम् ।।१८।।
पञ्चानामपि सालानां विष्कम्भं परिगृह्यताम् ।
तत्तद्विष्कम्भमानेन त्रिगुणं वा चतुर्गुणम् ।।१९।।
प्राकारोदयमुद्दिष्टं स्वाष्टांशोनाग्रविस्तरम् ।
अन्तर्मण्डल की भित्ति का विष्कम्भ (मोटाई) डेढ़ हाथ होना चाहिये। इसके
आगे के प्राकारों के विष्कम्भों का माप तीन-तीन अङ्गुल बढ़ाते हुये दो हाथ तक
क्रमानुसार ले जाना चाहिये। पाँचों सालों (प्राकारों) का विष्कम्भ इस प्रकार ग्रहण
करना चाहिये। उनके विष्कम्भ-मान से उनकी ऊँचाई तीन गुनी या चार गुनी अधिक
२८६ मयमतम्
होनी चाहिये। अग्र भाग ( ऊपरी भाग ) का विस्तार ( मूल से ) आठ भाग कम होना
चाहिये।।१८-१९।।
उत्तरान्तोचिता वाऽपि कुम्भमण्ड्यन्तकोदयाः ॥२०॥
मसूरकादिवर्गाढ्याः खण्डहर्म्याभिमण्डिताः ।
ऋजुभित्तियुता वाऽपि बुद्बुदार्धेन्दुशीर्षकाः ॥२१॥
प्राकार की ऊँचाई उत्तर के अन्त तक या ( स्तम्भ के ) कुम्भ या मण्डि तक
रखनी चाहिये। प्राकार को मसूरक से युक्त एवं खण्डहर्म्य से सुसज्जित होना चाहिये।
यह भित्ति सीधी हो अथवा बुद्बुद ( गोल सजावटी बिन्दु ) या अर्धचन्द्र उसके शीर्ष भाग
पर सुसज्जित होना चाहिये।।२०-२१।।
क्षुद्राल्पानां तु सालानां भित्तिर्हस्तप्रमाणतः ।
सार्धहस्ताद्विधार्यावत् पूर्ववद् वर्धयेत् क्रमात् ॥२२॥
( छोटे देवालयों के ) सबसे छोटे मन्दिर के सालों की भित्ति ( प्राकारों की
मोटाई ) हस्त-प्रमाण से होती है। इसे डेढ़ हाथ से प्रारम्भ होकर पूर्व-वर्णित रीति
( तीन-तीन अङ्गुल ) से क्रमानुसार बढ़ाना चाहिये।।२२।।
सोत्तरा वाजनच्छत्रशीर्षाभाः सालभित्तयः ।
भित्तिव्याससमोत्तुङ्गं पादार्धाधिकमेव वा ॥२३॥
तदुच्चे रुद्रभागेऽप्यग्निमोक्षोऽक्षिशिवांशकैः ।
उत्तरं वाजनाब्जं च क्षेपणं च यथाक्रमम् ॥२४॥
ऋजुभित्तियुतं ह्येतत् खण्डहर्म्याभिमण्डितम् ।
अधिष्ठानादिवर्गाढ्यं निर्गमोद्गमसंयुतम् ॥२५॥
प्राकार-शीर्ष उत्तर, वाजन एवं छत्र से युक्त होता है। इसकी ऊँचाई भित्ति की
चौड़ाई के बराबर, सवा भाग या डेढ़ भाग अधिक होनी चाहिये। ऊँचाई को ग्यारह
भागों में बाँटना चाहिये। तीन भाग से उत्तर, तीन भाग से वाजन, दो भाग से अब्ज
एवं तीन भाग से क्षेपण की क्रमानुसार योजना करनी चाहिये। भित्ति ( का बाहरी भाग )
सीधा अथवा खण्डहर्म्य से युक्त हो सकता है। यह अधिष्ठान से प्रारम्भ होकर ( ऊँचाई
पर ) निर्गम से युक्त होता है।।२३-२५।।
✳ आवृतमण्डपम् ✳
एकद्वित्रितलोपेतं कुर्यादावृतमण्डपम् ।
अभ्यन्तरे बहिष्ठात्तु ऋजुभित्तियुता भवेत् ॥२६॥
त्रयोविंशोऽध्यायः 卐 प्राकारपरिवारविधानम् २८७
अधोभूमित्रिभागे तु द्विभागं चोर्ध्वभूमिकम्।
तत्पादाष्टांशहीनं वा बहिर्भित्त्युन्नतं भवेत् ॥२७॥
मालिकाकृतिरेवं वा महावारयुतं तु वा।
भित्ति के भीतरी भाग में एक, दो या तीन तल से युक्त आवृतमण्डप का निर्माण
करना चाहिये। भित्ति बाहर से सीधी होती है। निचले तल के तीन भाग में से दो भाग
के बराबर ऊपरी तल का मान रखना चाहिये। अथवा यह चतुर्थांश या आठवाँ भाग
हीन हो सकता है। या इसकी ऊँचाई बाहरी भित्ति के बराबर हो सकती है। यह मालिका
की आकृति वाली या महावारं ( बड़ा बरामदा ) से युक्त होती है।।२६-२७।।
मानान्तं बाह्यभित्त्युच्चमधो धूमेः स्थलान्तकम् ॥२८॥
मूलसङ्गोत्तरान्तं वा प्रस्तरान्तमथापि वा।
खण्डहर्म्योत्तरान्तं वा शिखरान्तोन्नतं तु वा ॥२९॥
बाह्य भित्ति की सबसे अधिक ऊँचाई प्रधान देवालय की निचली भूमि के स्थल-
भाग से उत्तर पर्यन्त, प्रस्तर तक, खण्डहर्म्य के उत्तर तक अथवा शिखर पर्यन्त हो
सकती है।।२८-२९।।
मण्डपं द्वितलं वैकतलं वाऽपि तदावृतम्।
अधिष्ठानादिवर्गाढ्यं समं वाष्टांशहीनकम् ॥३०॥
त्रिपादं वा विशेषेण सालाधिष्ठानतुङ्गतः।
द्विगुणं चरणोत्तुङ्गं षडष्टांशोनमेव वा ॥३१॥
दो या एक तलयुक्त मण्डप ( देवालय ) के चारो ओर हो सकता है। यह
अधिष्ठान से युक्त, उसके बराबर ऊँचा, आठ भाग कम या तीन चौथाई ऊँचा हो
सकता है। मण्डप के स्तम्भ ( अधिष्ठान से ) दुगुने ऊँचे या ( दुगुने से ) आठ या
छः भाग कम ऊँचे हो सकते हैं।।३०-३१।।
✹ सालशीर्षालङ्कारः ✹
उक्षं वा भूतरूपं वा कर्तव्यं सालशीर्षके।
मूलजन्मतलं हस्तमात्रोच्चं जन्मसालातः ॥३२॥
प्राकार के शीर्षभाग के अलङ्करण—साल ( प्राकार ) के शीर्षभाग पर वृषभ
या भूतों का स्वरूप अङ्कित करना चाहिये। मूल देव-भवन का जन्मतल ( अधिष्ठान )
साल के जन्म से एक हाथ ऊँचा रखना चाहिये।।३२।।