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मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

पृष्ठ 307, कुल 395 में से

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पृष्ठ 307

अथ त्रयोविंशोऽध्यायः
( प्राकारपरिवारविधानम् )
✵ तत्र प्राकारविधानम् ✵
रक्षार्थं च विमानानां शोभार्थं च तथाऽधुना ।
परिवारनिवेशार्थं प्राकारं प्रोच्यते बुधैः ॥१॥
चारदीवारी एवं सहायक देवपरिवार के स्थान का विधान—बुद्धिमान
ऋषियों ने देवालय की रक्षा के लिये, शोभा के लिये एवं परिवार ( सहायक देव,
सेवकवर्ग ) के लिये प्राकार का वर्णन जिस प्रकार किया गया है, उसका वर्णन अब
किया जा रहा है॥१॥
✵ प्राकारमानम् ✵
कृत्वा चतुष्पदं मूलप्रासादस्य तु विस्तृतम् ।
आद्यं सालं महापीठं पदैः षोडशभिर्युतम् ॥२॥
मण्डूकाख्यं द्वितीयं स्यान्मध्यं भद्रमहासनम् ।
चतुर्थं सुप्रतीकान्तं पञ्चमं चेन्द्रकान्तकम् ॥३॥
प्राकार का मान—प्रधान देवालय की चौड़ाई को चार पद में बाँटना चाहिये।
प्रथम साल ( प्राकार ) की संज्ञा 'महापीठ' है एवं इसमें सोलह पद होते हैं। द्वितीय
साल की संज्ञा 'मण्डूक' ( चौंसठ पद ), मध्य साल ( तृतीय ) की संज्ञा 'भद्रमहासन'
( एक सौ छत्तीस पद ), चतुर्थ 'सुप्रतीकान्त' ( चार सौ चौरासी पद ) एवं पाँचवें की
संज्ञा 'इन्द्रकान्त' ( एक हजार चौबीस पद ) होती है ( ये पाँच प्रकार होते हैं )।
एवं युग्मपदैर्युक्तमयुग्मैरथ वक्ष्यते ।
एकमाद्यं विमानं स्यादाद्यं सालं तु पीठकम् ॥४॥
द्वितीयं स्थण्डिलं सालं मध्यं चोभयचण्डितम् ।
सुसंहितं चतुर्थं स्यादीशकान्तं तु पञ्चमम् ॥५॥
( उपर्युक्त प्राकारभेद ) युग्म संख्या वाले पदों के अनुसार वर्णित हैं। अब असम
संख्या के अनुसार ( प्राकार ) वर्णन किया जा रहा है। विमान ( देवालय ) का मात्र
एक पद होता है। प्रथम साल 'पीठ' ( नौ पद ), दूसरा 'स्थण्डिल' ( उनचास पद ),