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सर्वकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३१६ * मत्स्यपुराण *
मध्ये तु भास्करं विद्याल्लोहितं दक्षिणेन तु।
उत्तरेण गुरुं विद्याद् बुधं पूर्वोत्तरेण तु॥ ११
पूर्वेण भार्गवं विद्यात् सोमं दक्षिणपूर्वक।
पश्चिमेन शनिं विद्याद् राहुं पश्चिमदक्षिणे।
पश्चिमोत्तरतः केतुं स्थापयेच्छुक्लतण्डुलैः ॥ १२
भास्करस्येश्वरं विद्यादुमां च शशिनस्तथा।
स्कन्दमङ्गारकस्यापि बुधस्य च तथा हरिम् ॥ १३
ब्रह्माणं च गुरोर्विद्याच्छुक्रस्यापि शचीपतिम्।
शनैश्चरस्य तु यमं राहोः कालं तथैव च ॥ १४
केतोर्वै चित्रगुप्तं च सर्वेषामधिदेवताः ।
अग्निरापः क्षितिर्विष्णुंरिन्द्र ऐन्द्री च देवता ॥ १५
प्रजापतिश्च सर्पाश्च ब्रह्मा प्रत्यधिदेवताः ।
विनायकं तथा दुर्गां वायुराकाशमेव च।
आवाहयेद् व्याहृतिभिस्तथैवाश्विकुमारको ॥ १६
संस्मरेद् रक्तमादित्यमङ्गारकसमन्वितम्।
सोमशुक्रौ तथा श्वेतौ बुधजीवौ च पिङ्गलौ।
मन्दराहू तथा कृष्णौ धूम्रं केतुगणं विदुः ॥ १७
ग्रहवर्णानि देयानि वासांसि कुसुमानि च।
धूपामोदोऽत्र सुरभिरुपरिष्टाद् वितानिकम्।
शोभनं स्थापयेत् प्राज्ञः फलपुष्पसमन्वितम्॥ १८
गुडौदनं रवेर्दद्यात् सोमाय घृतपायसम्।
अङ्गारकाय संयावं बुधाय क्षीरषष्टिकम् ॥ १९
दध्योदनं च जीवाय शुक्राय च घृतौदनम्।
शनैश्चराय कृसरामजामांसं च राहवे।
चित्रौदनं च केतुभ्यः सर्वैर्भक्ष्यैरथार्चयेत्॥ २०
प्रागुत्तरेण तस्माच्च दध्यक्षतविभूषितम्।
चूतपल्लवसंच्छन्नं फलवस्त्रयुगान्वितम् ॥ २१
पञ्चरत्नसमायुक्तं पञ्चभङ्गसमन्वितम्।
स्थापयेदव्रणं कुम्भं वरुणं तत्र विन्यसेत् ॥ २२
गङ्गाद्याः सरितः सर्वाः समुद्रांश्च सरांसि च।
गजाश्वरथ्यावल्मीकसङ्गमाद्ध्रदगोकुलात् ॥ २३
श्वेत चावलोंद्वारा वेदीके मध्यमें सूर्यकी, दक्षिणमें
मंगलकी, उत्तरमें बृहस्पतिकी, पूर्वोत्तरकोणपर बुधकी,
पूर्वमें शुक्रकी, दक्षिणपूर्वकोणपर चन्द्रमाकी, पश्चिममें
शनिकी, पश्चिम-दक्षिणकोणपर राहुकी और पश्चिमोत्तरकोणपर
केतुकी स्थापना करनी चाहिये। इन सभी ग्रहोंमें सूर्यके
शिव, चन्द्रमाके पार्वती, मंगलके स्कन्द, बुधके भगवान्
विष्णु, बृहस्पतिके ब्रह्मा, शुक्रके इन्द्र, शनैश्चरके यम,
राहुके काल और केतुके चित्रगुप्त अधिदेवता माने गये
हैं। अग्नि, जल, पृथ्वी, विष्णु, इन्द्र, ऐन्द्री देवता,
प्रजापति, सर्प और ब्रह्मा-ये सभी क्रमशः प्रत्यधिदेवता
हैं। इनके अतिरिक्त विनायक, दुर्गा, वायु, आकाश और
अश्विनीकुमारोंका भी व्याहृतियोंके उच्चारणपूर्वक आवाहन
करना चाहिये। उस समय मंगलसहित सूर्यको लाल
वर्णका, चन्द्रमा और शुक्रको श्वेतवर्णका, बुध और
बृहस्पतिको पीतवर्णका, शनि और राहुको कृष्णवर्णका
तथा केतुको धूम्रवर्णका जानना और ध्यान करना
चाहिये। बुद्धिमान् यज्ञकर्ता जो ग्रह जिस रंगका हो, उसे
उसी रंगका वस्त्र और फूल समर्पित करे, सुगन्धित धूप
दे, ऊपर सुन्दर चंदोवा लगा दे। पुनः फल, पुष्प
आदिके साथ सूर्यको गुड़ और चावलसे बने हुए अन्न
(खीर)-का, चन्द्रमाको घी और दूधसे बने हुए
पदार्थका, मंगलको गोझियाका, बुधको क्षीरषष्टिक (दूधमें
पके हुए साठीके चावल)-का, बृहस्पतिको दही-
भातका, शुक्रको घी-भातका, शनैश्चरको खिचड़ीका,
राहुको अजा नामक वृक्षके फलके गूदाका और केतुको
विचित्र रंगवाले भातका नैवेद्य अर्पण करके सभी
प्रकारके भक्ष्य पदार्थोंद्वारा पूजन करे ॥१०-२०॥
वेदीके पूर्वोत्तरकोणपर एक छिद्ररहित कलशकी
स्थापना करे, उसे दही और अक्षतसे सुशोभित, आमके
पल्लवसे आच्छादित और दो वस्त्रोंसे परिवेष्टित करके
उसके निकट फल रख दे। उसमें पञ्चरत्न डाल दे और
उसे पञ्चभंग (पीपल, बरगद, पाकड़, गूलर और आमके
पल्लव)-से युक्त कर दे। उसपर वरुण, गङ्गा आदि
नदियों, सभी समुद्रों और सरोवरोंका आवाहन तथा
स्थापन करे। विप्रेन्द्र! धर्मज्ञ पुरोहितको चाहिये कि
वह हाथीसार, घुड़शाल, चौराहे, बिमवट, नदीके संगम,