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सर्वकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

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पृष्ठ 325
  • अध्याय ९३ *
    ३१५
    तिरानबेवाँ अध्याय
    शान्तिक एवं पौष्टिक कर्मों तथा नवग्रह-शान्तिकी विधिका वर्णन *
    सूत उवाच
    सूतजी कहते हैं - ऋषियो ! पूर्वकालकी बात है,
    वैशम्पायनमासीनमपृच्छच्छौनकः
    पुरा ।
    एक बार सुखपूर्वक बैठे हुए वैशम्पायनजीसे शौनक ने
    सर्वकामाप्तये नित्यं कथं शान्तिकपौष्टिकम् ॥ १
    पूछा- 'महर्षे ! सम्पूर्ण कामनाओंकी अविचल सिद्धिके
    लिये शान्तिक एवं पौष्टिक कर्मोंका अनुष्ठान किस प्रकार
    वैशम्पायन उवाच
    करना चाहिये ?' ॥ १ ॥
    श्रीकामः शान्तिकामो वा ग्रहयज्ञं समारभेत् ।
    वैशम्पायनजीने कहा- ब्रह्मन् ! लक्ष्मीकी कामनावाले
    अथवा शान्तिके अभिलाषी तथा वृष्टि, दीर्घायु और
    वृष्ट्यायुः पुष्टिकामो वा तथैवाभिवरन् पुनः ।
    पुष्टिकी इच्छासे युक्त मनुष्यको ग्रहयज्ञका समारम्भ करना
    येन ब्रह्मन् विधानेन तन्मे निगदतः शृणु ॥ २
    चाहिये। वह ग्रहयज्ञ जिस विधानसे करना चाहिये, उसे
    मैं बतला रहा हूँ, सुनिये। मैं सम्पूर्ण शास्त्रोंका अवलोकन
    सर्वशास्त्राण्यनुक्रम्य संक्षिप्य ग्रन्थविस्तरम् ।
    करनेके पश्चात् विस्तृत ग्रन्थको संक्षिप्तकर पुराणों एवं
    ग्रहशान्तिं प्रवक्ष्यामि पुराणश्रुतिचोदिताम् ॥ ३
    श्रुतियोंद्वारा आदिष्ट इस ग्रहशान्तिका वर्णन कर रहा हूँ।
    पुण्येऽह्नि विप्रकथिते कृत्वा ब्राह्मणवाचनम् ।
    इसके लिये ज्योतिषी ब्राह्मणद्वारा बतलाये गये पुण्यमय
    दिनमें ब्राह्मणद्वारा स्वस्तिवाचन कराकर ग्रहों एवं
    ग्रहान् ग्रहाधिदेवांश्च स्थाप्य होमं समारभेत् ॥ ४
    ग्रहाधिदेवोंकी स्थापना करके हवन प्रारम्भ करना चाहिये।
    ग्रहयज्ञस्त्रिधा प्रोक्तः पुराणश्रुतिकोविदैः ।
    पुराणों एवं श्रुतियोंके ज्ञाता विद्वानोंने तीन प्रकारका
    प्रथमोऽयुतहोमः स्याल्लक्षहोमस्ततः परम् ॥ ५
    ग्रहयज्ञ बतलाया है। पहला दस हजार आहुतियोंका,
    उससे बढ़कर दूसरा एक लाख आहुतियोंका तथा सम्पूर्ण
    तृतीयः कोटिहोमस्तु सर्वकामफलप्रदः ।
    कामनाओंका फल प्रदान करनेवाला तीसरा एक करोड़
    अयुतेनाहुतीनां च नवग्रहमखः स्मृतः ॥ ६
    आहुतियोंका होता है। दस हजार आहुतियोंवाला ग्रहयज्ञ
    नवग्रहयज्ञ कहलाता है। इसकी विधिका, जो पुराणों एवं
    तस्य तावद्विधिं वक्ष्ये पुराणश्रुतिभाषितम् ।
    श्रुतियोंमें बतलायी गयी है, मैं वर्णन कर रहा हूँ।
    गर्तस्योत्तरपूर्वेण
    वितस्तिद्वयविस्तृताम् ॥ ७
    (यजमान मण्डपनिर्माणके बाद) हवनकुण्डकी पूर्वोत्तर
    दिशामें देवताओंकी स्थापनाके लिये एक वेदीका निर्माण
    वप्रद्वयावृतां वेदिं वितस्त्युच्छ्रितसम्मिताम् ।
    कराये, जो दो बीता लम्बी-चौड़ी, एक बीता ऊँची, दो
    संस्थापनाय देवानां चतुरस्रामुदङ्मुखाम् ॥ ८
    परिधियोंसे सुशोभित और चौकोर हो। उसका मुख
    अग्निप्रणयनं कृत्वा तस्यामावाहयेत् सुरान् ।
    उत्तरकी ओर हो। पुनः कुण्डमें अग्निकी स्थापना करके
    उस वेदीपर देवताओंका आवाहन करे। इस प्रकार उसपर
    देवतानां ततः स्थाप्या विंशतिर्द्वादशाधिका ॥ ९
    बत्तीस देवताओंकी स्थापना करनी चाहिये ॥ २-९ ॥
    सूर्यः सोमस्तथा भौमो बुधजीवसितार्कजाः ।
    सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि,
    राहुः केतुरिति प्रोक्ता ग्रहा लोकहितावहाः ॥ १०
    राहु, केतु - ये लोगोंके हितकारी ग्रह कहे गये हैं।
  • यह पाँच आथर्वण कल्पों - नक्षत्र, वैतान, संहितार्विध, अङ्गिरस एवं शान्तिकल्पमेंसे प्रथम एवं पाँचवें शान्तिकल्पका
    समन्वित रूप है और अथर्वपरिशिष्ट, याज्ञवल्क्यस्मृति १ । २९५-३०८, वृद्धपाराशर ११, पद्मपुराण, सृष्टिखण्ड ८२-८६, नारदपुराण
    १। ५१, भविष्यपुराण, अग्निपुराण २६४-७४ आदिमें भी प्राप्त है। मत्स्यका पाठ बहुत अशुद्ध है। उपर्युक्त ग्रन्थोंकी सहायतासे इसे
    पूर्णतया शुद्ध कर लिया गया है। इनकी कई बातें शान्ति-संग्रहों और ज्योतिषग्रन्थोंमें भी आयी हैं।