मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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- अध्याय ९३ *
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तिरानबेवाँ अध्याय
शान्तिक एवं पौष्टिक कर्मों तथा नवग्रह-शान्तिकी विधिका वर्णन *
सूत उवाच
सूतजी कहते हैं - ऋषियो ! पूर्वकालकी बात है,
वैशम्पायनमासीनमपृच्छच्छौनकः
पुरा ।
एक बार सुखपूर्वक बैठे हुए वैशम्पायनजीसे शौनक ने
सर्वकामाप्तये नित्यं कथं शान्तिकपौष्टिकम् ॥ १
पूछा- 'महर्षे ! सम्पूर्ण कामनाओंकी अविचल सिद्धिके
लिये शान्तिक एवं पौष्टिक कर्मोंका अनुष्ठान किस प्रकार
वैशम्पायन उवाच
करना चाहिये ?' ॥ १ ॥
श्रीकामः शान्तिकामो वा ग्रहयज्ञं समारभेत् ।
वैशम्पायनजीने कहा- ब्रह्मन् ! लक्ष्मीकी कामनावाले
अथवा शान्तिके अभिलाषी तथा वृष्टि, दीर्घायु और
वृष्ट्यायुः पुष्टिकामो वा तथैवाभिवरन् पुनः ।
पुष्टिकी इच्छासे युक्त मनुष्यको ग्रहयज्ञका समारम्भ करना
येन ब्रह्मन् विधानेन तन्मे निगदतः शृणु ॥ २
चाहिये। वह ग्रहयज्ञ जिस विधानसे करना चाहिये, उसे
मैं बतला रहा हूँ, सुनिये। मैं सम्पूर्ण शास्त्रोंका अवलोकन
सर्वशास्त्राण्यनुक्रम्य संक्षिप्य ग्रन्थविस्तरम् ।
करनेके पश्चात् विस्तृत ग्रन्थको संक्षिप्तकर पुराणों एवं
ग्रहशान्तिं प्रवक्ष्यामि पुराणश्रुतिचोदिताम् ॥ ३
श्रुतियोंद्वारा आदिष्ट इस ग्रहशान्तिका वर्णन कर रहा हूँ।
पुण्येऽह्नि विप्रकथिते कृत्वा ब्राह्मणवाचनम् ।
इसके लिये ज्योतिषी ब्राह्मणद्वारा बतलाये गये पुण्यमय
दिनमें ब्राह्मणद्वारा स्वस्तिवाचन कराकर ग्रहों एवं
ग्रहान् ग्रहाधिदेवांश्च स्थाप्य होमं समारभेत् ॥ ४
ग्रहाधिदेवोंकी स्थापना करके हवन प्रारम्भ करना चाहिये।
ग्रहयज्ञस्त्रिधा प्रोक्तः पुराणश्रुतिकोविदैः ।
पुराणों एवं श्रुतियोंके ज्ञाता विद्वानोंने तीन प्रकारका
प्रथमोऽयुतहोमः स्याल्लक्षहोमस्ततः परम् ॥ ५
ग्रहयज्ञ बतलाया है। पहला दस हजार आहुतियोंका,
उससे बढ़कर दूसरा एक लाख आहुतियोंका तथा सम्पूर्ण
तृतीयः कोटिहोमस्तु सर्वकामफलप्रदः ।
कामनाओंका फल प्रदान करनेवाला तीसरा एक करोड़
अयुतेनाहुतीनां च नवग्रहमखः स्मृतः ॥ ६
आहुतियोंका होता है। दस हजार आहुतियोंवाला ग्रहयज्ञ
नवग्रहयज्ञ कहलाता है। इसकी विधिका, जो पुराणों एवं
तस्य तावद्विधिं वक्ष्ये पुराणश्रुतिभाषितम् ।
श्रुतियोंमें बतलायी गयी है, मैं वर्णन कर रहा हूँ।
गर्तस्योत्तरपूर्वेण
वितस्तिद्वयविस्तृताम् ॥ ७
(यजमान मण्डपनिर्माणके बाद) हवनकुण्डकी पूर्वोत्तर
दिशामें देवताओंकी स्थापनाके लिये एक वेदीका निर्माण
वप्रद्वयावृतां वेदिं वितस्त्युच्छ्रितसम्मिताम् ।
कराये, जो दो बीता लम्बी-चौड़ी, एक बीता ऊँची, दो
संस्थापनाय देवानां चतुरस्रामुदङ्मुखाम् ॥ ८
परिधियोंसे सुशोभित और चौकोर हो। उसका मुख
अग्निप्रणयनं कृत्वा तस्यामावाहयेत् सुरान् ।
उत्तरकी ओर हो। पुनः कुण्डमें अग्निकी स्थापना करके
उस वेदीपर देवताओंका आवाहन करे। इस प्रकार उसपर
देवतानां ततः स्थाप्या विंशतिर्द्वादशाधिका ॥ ९
बत्तीस देवताओंकी स्थापना करनी चाहिये ॥ २-९ ॥
सूर्यः सोमस्तथा भौमो बुधजीवसितार्कजाः ।
सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि,
राहुः केतुरिति प्रोक्ता ग्रहा लोकहितावहाः ॥ १०
राहु, केतु - ये लोगोंके हितकारी ग्रह कहे गये हैं। - यह पाँच आथर्वण कल्पों - नक्षत्र, वैतान, संहितार्विध, अङ्गिरस एवं शान्तिकल्पमेंसे प्रथम एवं पाँचवें शान्तिकल्पका
समन्वित रूप है और अथर्वपरिशिष्ट, याज्ञवल्क्यस्मृति १ । २९५-३०८, वृद्धपाराशर ११, पद्मपुराण, सृष्टिखण्ड ८२-८६, नारदपुराण
१। ५१, भविष्यपुराण, अग्निपुराण २६४-७४ आदिमें भी प्राप्त है। मत्स्यका पाठ बहुत अशुद्ध है। उपर्युक्त ग्रन्थोंकी सहायतासे इसे
पूर्णतया शुद्ध कर लिया गया है। इनकी कई बातें शान्ति-संग्रहों और ज्योतिषग्रन्थोंमें भी आयी हैं।