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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

क्षुद्राः सन्ति सहस्रशो स्वभरणव्यापारमात्रोद्यताः ।
स्वार्थो यस्य परार्थ एव स पुमानेकः सतामग्रणीः ॥ (सुभाषितावलि २८५)
हाब्सके अनुसार हत्याके भयसे मनुष्यका व्यक्तिगत स्वतन्त्रताका परित्याग कर
एक अनियन्त्रित शासकके शरण होना वैसा ही लगता है, जैसे एक जंगली बिल्ली-
से डरकर खूँखार हिंस्र शेरकी शरण जाना । रूसोका कहना है कि ‘स्वतन्त्रता प्रकृतिकी
देन है । स्वतन्त्रताका परित्याग मनुष्यताका ही परित्याग है ।’ हाब्सका सिद्धान्त
न तो प्राचीन धार्मिक लोगोंने ही माना और न जडवादियोने ही। उसके मतानुसार
‘राज्यका अधिकार ईश्वरीय, धार्मिक एवं पैतृक भी नहीं और न जनतान्त्रिक
ही है ।’ वस्तुतः पाश्चात्य दर्शनकार अपनी परिस्थितियोसे ऊँचे उठकर विचार
कर ही नहीं सके । इसीलिये हाब्सने अपनी भीरु प्रकृतिके अनुसार ही भयमूलक
ही सिद्धान्त भी स्थापित किया ।
जान लॉक
जान लॉक (१६३२-१७०४) भी समझौतावादी था। उसे सीमित राजतन्त्रमें
विश्वास था । उसका पिता ‘प्यूरिटन’ सम्प्रदायका अनुयायी था । ‘लॉक’ १६८८ की
रक्तहीन क्रान्तिका दार्शनिक माना जाता है। इंग्लैंडके जेम्स द्वितीयके पदच्युत होनेपर
विलियम और मेरीको राज्यपदके लिये निमन्त्रित किया गया । ‘बिल आफ राइटस्’ और
‘ऐक्ट आफ सैट्लमन्ट’ नियमोंद्वारा कार्यपालिका संसद्के अधीन बनी । संसद्का
राज्यकोष, राज्यनीति तथा सेनापर पूर्ण नियन्त्रण स्थापित हुआ । इसी रक्तहीन
क्रान्तिके द्वारा संसद् सत्ताधारी बनी और राजा केवल वैधानिक रह गया । यह
एक प्रकारसे जनवादका आरम्भ हुआ । लॉक भी प्राकृतिक स्थिति और राज्यकी
स्थिति मानता है। उसके मतानुसार ‘मनुष्य विवेकशील एवं सामाजिक प्राणी है। सत्य
बोलना अच्छा, झूठ बोलना पाप है’—इत्यादि नैसर्गिक नियमोंका पालन वह आवश्यक
समझता था । इन्हीं सब हेतुओंसे प्राणी शान्ति, स्वतन्त्रता एवं भ्रातृताकी ओर
प्रवृत्त होता है। उसके मतानुसार ‘स्रष्टाने भूमि एव विविध पदार्थ सर्वसामान्यक
प्रदान किया है । साथ ही श्रमशक्ति भी प्रदान की है । इसीके द्वारा सामान्य
वस्तुओमेसे कुछको अपने उपयोग योग्य बनाता है । वही उसकी निजी सम्पत्ति
होती है । उदाहरणार्थ नदीका पानी सर्वसामान्य वस्तु है । पर जब एक मनुष्य
श्रमद्वारा उसकी कुछ मात्रा लाकर अपने घरमे रखता है, तो वह उसकी व्यक्तिगत
सम्पत्ति होती है। श्रमके मिश्रणसे ही कोई वस्तु व्यक्तिगत सम्पत्ति बनती है ।
प्राकृतिक मनुष्य एक विवेकशील सामाजिक तथा नैतिक प्राणी था । वह नैतिकतापूर्ण
नैसर्गिक नियमोका अनुयायी था । हाब्सके विपरीत लॉकके मतानुसार मनुष्य
एक दूसरेके व्यक्तित्व एव व्यक्तिगत सम्पत्ति और अधिकारका आदान-प्रदान
करते थे । वह स्थिति सुख, शान्ति, स्वतन्त्रता और भ्रातृत्वकी थी । लॉकका
यह मत भारतीय भावनासे मिलता है । भारतीय दृष्टिकोणके अनुसार पहले यद्यपि
राज्य, राजा, दण्ड-विधान नहीं था, परंतु कोई दण्डनीय भी नहीं था । सभी परस्पर

५४ मार्क्सवाद और रामराज्य
एक दूसरेके पोषक थे, कोई किसीका शोषक नहीं था । सभी धर्मनियन्त्रित थे ।
धर्मयुक्त होकर सब आपसमे ही काम चला लेते थे ।
न वै राज्यं न राजासीन्न च दण्ड्यो न दाण्डिकः ।
धर्मेणैव प्रजाः सर्वा रक्षन्ति स्म परस्परम् ॥
( महा० शा० प० ५९ । १४ )
‘जो जैसा करेगा वैसा पायेगा’—यह नैसर्गिक नियम प्रचलित था ।
लॉकके मतानुसार ‘कुछ दिनो बाद सुखमय न्यायपूर्ण जीवनमें बाधाएँ उत्पन्न
हो गयीं । व्यक्ति अज्ञानी और पक्षपाती हो गये । अध्ययनशून्य हो जानेसे उन्हे
नियमोंका ज्ञान नहीं रहा । सभी मनमाना नियम लागू करने लगे । अतः लिखित
नियमकी आवश्यकता पडी । एक निष्पक्ष न्यायाधीश अपेक्षित होने लगा । निर्णयको
कार्यान्वित करनेके लिये पुलिसकी भी आवश्यकता हुई । तब समझौता—
‘अनुबन्धद्वारा’ सभ्य समाजका निर्माण कराया ।’ लॉकके मतानुसार व्यक्तियोंने
अपने कुछ ही अधिकार सभ्य समाजको समर्पित किये । नैसर्गिक नियमोंके अनुसार
सभ्य समाजको नियम निर्माण करके निश्चित निष्पक्ष न्यायाधीश नियुक्त करने
एवं निर्णयको कार्यान्वित करनेका अधिकार दिया गया । परतु नैसर्गिक
नियमोंके लङ्घन तथा व्यक्तिगत सम्पत्तिपर आघात करनेका अधिकार उस
समाजको नहीं दिया गया ।’ लॉकने नैसर्गिक नियमोंको सर्वव्यापक एवं सर्वोपरि
बतलाया । व्यक्तिगत सम्पत्तिकी सुरक्षाके लिये ही व्यक्तिने सभ्य समाजकी स्थापना
की और असुविधासम्बन्धी उक्त तीनो अधिकारोका परित्याग किया तथा
बहुमतका निर्णय स्वीकार करनेका भी नियम स्वीकार किया । यह सभ्य समाज कुछ
व्यक्तियोका समूह था; परन्तु इस समूहको यह अनुभव हुआ कि वह असुविधाओ-
को दूर करनेमें असमर्थ है । कारण कि न तो सैकड़ो मनुष्य नियम ही निर्माण
कर सकते हैं और न न्यायालय और कार्यपालिकाका ही काम कर सकते हैं ।
इसीलिये सभ्य समाजने व्यवस्थापिका सभा और संसद्की स्थापना की । इसी
सभाको नियम-निर्माणका अधिकार दिया गया । सभ्य समाजके समान ही यह
सभा भी नैसर्गिक नियमों एवं व्यक्तिगत सम्पत्तिके अधिकारोका लङ्घन नहीं कर
सकती थी। नैसर्गिक नियमोंके अनुसार कानून बनाना ही उसका काम था ।
व्यवस्थापिका सभाकी बैठकें स्थायी नहीं होती थीं; किंतु आवश्यकताओंके
अनुसार होती थीं । इसीलिये संसद्ने एक स्थायी कार्यपालिकाकी स्थापना की ।
इसका कार्य नियमोंको कार्यान्वित करना था । कुछ परिस्थितियोंमें वह नियम-
निर्माणमें भी भाग लेती थी । संसद्द्वारा नियुक्त न्यायाधीश नैसर्गिक नियमोपर
आश्रित लिखित नियमोंके अनुसार निर्णय करते थे । इस प्रकार संसद्, कार्य-
पालिका, न्यायपालिका—राज्यके इन तीनो अङ्गोंकी स्थापना हुई ।

जान लॉक ७५
युद्ध एवं शान्ति-सम्बन्धी कार्योंको कार्यपालिकाके जिम्मे किया गया
और न्यायाधीशकी नियुक्ति संसद्के जिम्मे, परंतु न्यायपालिकाको
कार्यपालिकाका अङ्ग माना गया । उस तरह शक्ति विभाजनकी बात
भी आ जाती है । इसीके अनुसार फ्रांसके लेखक मांटेस्क्यूने 'व्यक्तिगत
स्वतन्त्रता'का समर्थन किया । लाककी राज्य-संस्था स्वामी नहीं, किंतु एक
सेवक है । उसे जनस्वीकृतिकी आवश्यकता थी । व्यक्ति और उसकी सम्पत्ति
अर्थात् जीवनस्वतन्त्रता और सम्पत्तिकी सुरक्षा तथा नैसर्गिक नियमोंको लिपिबद्ध
करना उसका कर्तव्य था । राजाके मनमाने शासन करने एवं संसद्के कार्यक्रम
एवं निर्वाचनमें हस्तक्षेप करने, देशको विदेशी सत्ताके अधीन करने, संरक्षण-
कार्यमें असफल होने आदिकी हालतमें कार्यपालिकाका विरोध किया जा सकता है
एवं उसे हटाया जा सकता है । लाकके मतानुसार 'संसद् यद्यपि राज्यका प्राण
है तथापि उसे भी नैसर्गिक नियमोंके विपरीत नियम-निर्माणका अधिकार नहीं।
संसद् न मनमाने नियम बना सकती है, न नियम बनानेका भार किसी व्यक्ति या
संस्थाको दे सकती है । ऐसी स्थितिमें नागरिक-समाजद्वारा उसे पदच्युत करके
दूसरी संसद् बनायी जा सकती है।' लाक किसी राजाका जन्मसिद्ध असाधारण
अधिकार नहीं मानता था और निरपेक्ष राजाका अपने मुकदमेमें स्वयं न्यायाधीश
माननेको सर्वथा न्यायरहित मानता था । राजाको सभी अधिकार जनताद्वारा
मिले होते हैं । जनता अन्यायी राजासे अपने दिये हुए अधिकारोंको वापस ले
सकती है । उसके मतमें नागरिक समाज ही सर्वोत्कृष्ट संस्था है । नागरिक
लोगोंको सदा अधिकार रहता है कि नियमोल्लङ्घन करनेवाले राजा या संसद्को
वैधानिक ढंगसे अथवा हिंसाद्वारा अलग कर दे ।
लॉकके मतानुसार 'सर्वोत्कृष्ट सत्ता जनतामें ही निहित होती है, परंतु
स्वतन्त्रताके लिये सतर्कता अत्यावश्यक है।' उसके विचारसे 'सतर्कता स्वतन्त्रताकी
भगिनी है । शासनके कार्योंको देखते रहना, उसमें त्रुटि होनेपर विरोध करना आवश्यक
है । जनता एक सुप्तसत्ताधारी है । किन्हीं विशेष परिस्थितियोंमें ही वह अपनी सत्ताका
प्रयोग करती है। इस मतसे समाज ही सर्वश्रेष्ठ है । शासक उसीके प्रति उत्तरदायी होता
है और नैतिक नियमोंके परतन्त्र होता है। सरकार एक संरक्षकमात्र है, भोक्ता नहीं ।
जैसे किसी अभिभावकको किमी बालकके शिक्षणके लिये कुछ रुपया दिया जाता
है, तो वह उसका उसी कार्यमें विनियोग कर सकता है, उसे स्वयं भोग
नहीं सकता । इसी प्रकार राजा राज्यका भोक्ता नहीं, किंतु संरक्षक मात्र है। इसमें
विभिन्न वर्गोंके समन्वयमें कोई बाधा नहीं पड़ती।' हूकर, वर्क आदि भी इसी
विचारधाराके थे ।

भारतीय राजनीतिमे सदासे ही समाजको सर्वश्रेष्ठ माना जाता है और उसमें
वर्णाश्रमधर्मका समन्वय है । शासक धर्म एवं समाजके प्रति उत्तरदायी हैं । शासन
बदलते रहते हैं पर समाज और धर्म नहीं बदलते । राज्यके नियम धर्मशास्त्रोंके ही
अनुकूल हो सकते हैं । व्यक्तिगत वैध सम्पत्तिपर आघात अन्याय माना जाता है ।
लॉक समाजको सत्ताधारी मानता है, साथ ही व्यक्तिको भी उच्चस्थान देता है ।
वह राजाको व्यक्तिका सेवक मानता है । इस सिद्धान्तको सेवाइनने बेमेल बताया ।
लॉकके अनुसार राज्यकार्य सुरक्षातक ही सीमित है । उसे नैतिकता-शिक्षा आदिके
कामोंमें हाथ नहीं डालना चाहिये ।' यह विचारधारा धर्मनियन्त्रित रामराज्यकी
ही है; क्योंकि उसमें शिक्षा, सम्पत्ति एवं धर्मको सदा ही स्वतन्त्र रहना उचित
समझा जाता है । राज्यलक्ष्मी चपला होती है । वह कभी देवता और कभी दानवके
हाथ भी जा सकती है । उसके हाथमें शिक्षा-सम्पत्ति एवं धर्मके जानेसे व्यक्ति
और समाज सदाके लिये नष्ट हो जायेंगे । उसीके बलपर व्यक्ति एव समाज
शासनोंमें रद्दोबदल कर सकते हैं । संसद्के नामसे न सही परंतु नीतिशास्त्र एवं
मन्त्रिमण्डलकी व्यवस्था सदासे ही धर्म नियन्त्रित शासनतन्त्रमें थी ।
आजकल समझा जाता है कि 'मानव-जातिका इतिहास उन्नतिका ही इति-
हास है।' अतः लॉकका यह कथन कि 'व्यक्ति पहलेसे ही नैतिक है उसे
नैसर्गिक नियमोका ज्ञान था' संगत नहीं है । यदि ऐसा ही था तो उसने
प्राकृतिक स्थितिका त्याग क्यों किया ? उसमें असुविधा, अनैतिकता क्यों आयी ?
उसे समाजकी आवश्यकता क्यों पडी ? अतः नैतिकता, शिक्षा आदि सब समाजकी
या व्यक्तिकी देन माननी चाहिये, परंतु रामराज्यके अनुसार इसका समाधान
सरल है । जैसा कि कहा जा चुका है कि 'सत्त्व एवं धर्मके ह्राससे नैतिकतामें एवं
ज्ञानमें कमी आयी, तभी राज्यकी अपेक्षा हुई । इस पक्षमें व्यक्ति और समाजकी
स्थिति और सम्बन्ध सदा उसी ढंगका होता है जैसे वृक्ष एवं वनका, सैनिको एवं
सेनाका । निरीश्वर जडवादके अनुसार ही 'उत्तरोत्तर विकास हो रहा है। पूर्वज लोग
असभ्य, अज्ञानी एव जगली थे।' ईश्वरवादीके यहाँ तो विज्ञानपूर्वक विश्वकी सृष्टि
है। अतः सृष्टि-कालमें लोग आजकी अपेक्षा अधिक ज्ञानशक्ति एव नैतिकतासे पूर्ण
थे। युग-ह्रासके अनुसार सत्त्व एव शक्तिका ह्रास होनेसे ही विभिन्न प्रकारकी
असुविधाएँ हुईं ।
धर्मनियन्त्रित शासनतन्त्रमे जनवाद एव राजतन्त्रका समन्वय है, विरोध नहीं ।
धर्मशास्त्र सभीपर लागू होता है । अन्यथा लॉकके मतानुसार 'व्यक्ति कभी नैसर्गिक
नियमोके हननके नामपर विरोध करते और नागरिकता स्वीकार करने न करनेमें
स्वतन्त्र होते' तब तो राज्यका चलाना ही कठिन हो जाता । 'श्रम-मिश्रणसे ही धन

व्यक्तिगत होता है' लाकका सम्पत्ति सम्बन्धी यह सिद्धान्त सी०एच० ड्राइवर (C.H
Driver) के मतानुसार 'एक अस्फुटित बम' के समान था। रेकार्डो आदिने तो श्रम-
द्वारा ही वस्तुका मूल्य निर्धारित किया। मार्क्स ने भी श्रमको ही आधार मानकर अपना
मत खड़ा किया है। परंतु धर्म-नियन्त्रित शासनकी दृष्टिमे यह सिद्धान्त भी त्रुटिपूर्ण है।
क्योंकि पद्मरागमणि, वज्रमणि आदिका मूल्य उनके गुणोंपर अवलम्बित होता है, श्रमपर
नहीं। इसके साथ ही यह भी समझ लेना आवश्यक है कि भूमि आदि अनेक वस्तुओमें
श्रमयोग बिना भी पितृ-पितामहादि-परम्परासे स्वत्व प्राप्त होता है। तब भी धर्म-
नियन्त्रित व्यक्ति, समाज एव राज्यद्वारा तथा उचित वितरणद्वारा आर्थिक सन्तुलन
बना रहता था। अतः बेकारी, भुखमरीका प्रश्न ही नहीं उठता था। धर्म-नियन्त्रित
व्यक्ति सब एक दूसरेके पोषक ही होते हैं, शोषक नहीं होते ।

रूसोके विचार

१७८९ की फ्रान्सकी राज्यक्रान्तिका प्रवर्त्तक रूसो ( १७१२-७८ ) दस वर्षकी
अवस्थामें ही एक पादरीके यहाँ नौकरी करने लगा। बुरी आदतोंके कारण वहाँसे
उसे हटा दिया गया। बादमें वह दूसरी नौकरीमें लग गया। वहाँ वह पूरा झूठा, चोर
और आवारा बन गया। उसे मित्रोमे सदा ही सहायता मिलती रही। बादमें एक धनाढ्य
स्त्रीके सहारे उसे पढनेकी सुविधा मिली। फिर वह गरीबोमें रहने लगा। वहाँ उसने
शराबकी दूकान की, नौकरानीसे मैत्री करली और बिना विवाहके ही पाँच बच्चे पैदा
किये। पीछे १७४९ में उसने 'विज्ञान और कलाकी उन्नतिसे नैतिकताकी वृद्धि हुई या
अवनति' इस विषयपर निबन्ध लिखकर पारितोषिक प्राप्त किया। इसी निबन्ध
लिखनेके प्रसगसे उसके जीवनमें परिवर्तन हुआ। उस निबन्धमें उसने बताया कि
'विज्ञान और कलाकी वृद्धिसे नैतिकताकी वृद्धि नहीं हुई, प्रत्युत पतन हुआ।'
पश्चात् उसने अनेक पुस्तके लिखीं और आवारा रूसो एक दार्शनिक बन गया।
१७५४ में असमानताके जन्मपर उसने पुस्तक लिखी। इसमें उसने प्राकृतिक स्थिति
और राज्यका जन्म बतलाया। एक लेखमें उसने 'आदर्श सामान्य इच्छा' और
'आदर्श राज्य' का वर्णन किया। अपनी शिक्षासम्बन्धी पुस्तकमें उसने 'धर्मप्रभा-
वित शिक्षा' का विरोध किया। इससे तात्कालिक पादरियो एवं सरकारने उसका
विरोध किया। रूसोके समयमें किसानोंकी दशा बहुत शोचनीय थी। मध्यम वर्गमें
निराशा एवं उदासीनता छायी हुई थी। रूसोके मतानुसार 'मानवमें भावनाका
स्तर विवेकसे भी ऊँचा है।' उसके अनुसार 'आधुनिक सभ्यताने मनुष्यको
अनैतिक एवं व्यभिचारी बनाया है। सभ्यताके पूर्व व्यक्तिका जीवन आदर्शमय
था।' उस समयके अन्य विचारक कुशलताको महत्त्व देते थे, परंतु रूसोने
स्वतन्त्रताको सर्वोच्च स्थान दिया। वह राजतन्त्रका कट्टर विरोधी था, सुतरा गरीबोँ
और किसानोंका आदर्श दार्शनिक था।

५८ मार्क्सवाद और रामराज्य
रूसोकी प्राकृतिक स्थितिमें 'मनुष्य नेक, सुखी, सीधे, चिन्तारहित, स्वस्थ,
शान्तिप्रिय, एकान्तप्रिय एवं सन्तुष्ट थे । कोई निजी घर न था और न सम्पत्ति ही
थी । विवाह-प्रथा भी नहीं थी और न कुटुम्ब ही था । भूमिके उत्पादनसे ही
भौतिक इच्छाओकी पूर्ति हो जाती थी । पूर्ण समानता, स्वतन्त्रता व्यापक थी। कोई
वस्त्र-समस्या भी न थी।' उसके मतानुसार 'प्राकृतिक युगमें आधुनिक बुराइयाँ नहीं
थीं, परन्तु आधुनिक भलाइयाँ भी न थीं। संक्षेपमें वह एक नेक जगलीकी भाँति
था । प्राकृतिक मनुष्योको न्याय, अन्याय और मृत्युका भी ज्ञान नहीं था । उसमे
बुराई समाजके सम्पर्कसे ही आयी।' उसके मतानुसार 'नैतिकता समाजकी देन है।'
हॉब्सके विचारोंका उसने खण्डन किया था ।
भारतीय आर्ष इतिहासके अनुसार हॉब्स और रूसो दोनोकी ही प्राकृतिक
स्थितिका वर्णन असंगत है; क्योंकि अपने यहाँके मतानुसार सत्त्वगुणके विकासके
समय नैतिकता और सभ्यता थी । सत्त्व-ह्रासके पश्चात् हॉब्सका चित्रण ठीक ही है।
'असमानताका जन्म' पुस्तकमें उसने बताया है कि 'एक मनुष्यने एक भूमिके
टुकडेको घेरा और कहा कि 'यह मेरा है।' उसने अन्य भोले मनुष्योंसे उस टुकड़ेपर
अपना अधिकार स्वीकार करवाया । उसके अनुसार यह मनुष्य ही सभ्यताका
जन्मदाता बना । उसी तरह अन्य मनुष्योने भी धीरे-धीरे भूमिके टुकड़ोंको अपनाया
और दूसरोंसे अपना स्वामित्व स्वीकार करवाया । इस तरह व्यक्तिगत सम्पत्ति
और असमानता ही सभ्यताकी जन्मदात्री है।'
वस्तुतः कई शब्दोंका दुर्भाग्य भी कभी आया करता है । उनका अर्थ
सुन्दर होते हुए भी अधिकांश लोगोद्वारा उनका प्रयोग कभी बुरे अर्थोंमें होने
लगता है । 'सम्प्रदाय' 'साम्राज्य' 'सभ्यता' आदि शब्द इसी ढंगके हैं । इनका
अर्थ बहुत श्रेष्ठ होनेपर भी पाश्चात्त्य देशोंमें इनका बहुत दुरुपयोग हुआ और
इनका 'फिरकापरस्ती' 'शोषण' एवं 'असमानता' आदिमें प्रयोग होने लगा ।
वस्तुतः समष्टि, व्यष्टि, अभ्युदय एवं परम निःश्रेयस, अपवर्गके अनुकूल ज्ञान-क्रिया-
सम्पन्न शिष्ट व्यक्ति या समाज ही सभ्य कहा जाता है । तदनुकूल परम्परा ही
सम्प्रदाय एव उसका व्यवस्थापक ही धर्मनियन्त्रित साम्राज्य था । रामराज्यका
साम्राज्य इसी कोटिका था । तभी केवल मनुष्योंके लिये ही नही किंतु पशु-पक्षीयोंको
भी वहाँ सरल-सस्ता न्याय मिलता था । रूसोके अनुसार 'उसी असमानताकी रक्षाके
लिये पुलिस सरकार आवश्यक हुई । इन सबके द्वारा अमीरोंके अत्याचारोको स्थायी
बननेमें सहायता मिली । समाजके जन्मसे ही दुःख एव दरिद्रताका जन्म हुआ ।
समाज और सभ्यताकी वृद्धिसे गरीबी, भूख, शोषण, हत्या, बीमारीकी वृद्धि हुई ।
रूसोने अपनी 'सामाजिक अनुबन्ध' (सोशल कण्ट्रैक्ट ) पुस्तकमें लिखा है कि
'मनुष्य स्वतन्त्र जन्मा परंतु सभी ओर जंजीरोंसे जकड़ा हुआ ।' उसकी

'एमिल' पुस्तकमें भी ऐसे ही विचार हैं। आधुनिक लोग भी मानते हैं कि 'उसकी
अपनी व्यक्तिगत अनुभूतिका ही यह चित्रण है। अपमान और दुःखकी प्रतिक्रिया-
स्वरूप ही उसने यह विचार व्यक्त किया है।' सुतरां इसमें तात्त्विक कल्पनाकी
अपेक्षा प्रतिक्रियाकी भावना ही अधिक है। उसका विश्वास था कि 'वह नेक
था; किंतु समाजकी परिस्थितियोंने उसे अपंग बनाया।' उसने 'सामाजिक अनु-
बन्ध' में लिखा है कि किस प्रकार एक ऐसी संस्था स्थापित हो जिसमें प्रत्येक व्यक्ति
अन्य व्यक्तियोंके साथ संघटित होते हुए भी केवल अपनी-अपनी इच्छाका पालन करे,
अर्थात् स्वतन्त्रता सुरक्षित रखते हुए कैसे सुव्यवस्था स्थापित की जाय। किंतु
गणराज्यीय दृष्टिकोणसे बिना इच्छाओंपर नियन्त्रण किये अर्थात् बिना उन्हें सीमित
बनाये कोई भी संघटन हो ही नहीं सकता। समान उद्देश्यकी पूर्तिके लिये एक
सूत्रमें सबके मन और इच्छाओंका आबद्ध होना ही वास्तविक संघटन है।
कहा जाता है कि 'हूसोकी समस्या स्वतन्त्रता और सुव्यवस्थाका समन्वय
थी। इसकी पूर्तिके लिये उसने परम्परागत अनुबन्धका प्रयोग किया। हॉब्सके
अनुसार वह व्यक्तियोंद्वारा अपने सभी अधिकारोंका समर्पण आवश्यक समझता
था और लॉक

६० मार्क्सवाद और रामराज्य
कर्तव्यपरायणता, स्वतन्त्रता, आत्मोत्थान, सम्पत्ति, नैतिकता और न्याय-अन्यायका
ज्ञान राज्यद्वारा ही सम्भव है।' यह सब व्यक्तिवादका उत्तर था।
यहाँ भी रूसोके कथनमें पूर्वापरविरोध है। एक ओर वह समाज और
सभ्यताको तथा राज्यसरकार आदि संस्थाओंको गरीबी, भुखमरी, अत्याचार-
का सहायक मानता है। उसके पहले व्यक्तिको नैतिक एवं नेक मानता है और
दूसरी ओर राज्यके बिना व्यक्तियोको मक्खीतुल्य बतलाता है। रूसो आदर्शराज्यको
ही सत्ताधारी मानता था। अर्थात् इस राज्यकी सामान्य इच्छाको सत्ताधारी मानता था।
लाकका राज्य संरक्षक मात्र था, सत्ताधारी नहीं। हॉब्सका 'दीर्घकाय' ही सब कुछ था।
रूसोने अपने जनवादी राज्यको एक अवयवीकी भाँति माना है। 'सत्ताधारी जनसभा या
धारासभा इसका सिर है। नियम एव परम्परा मस्तिष्क; न्यायाधीश, सरकारी
कर्मचारी मस्तिष्कके स्नायु, व्यापार-व्यवसाय और कृषि मुख और उदर; आय रक्त
और नागरिक शरीरके अङ्गोकी भाँति है। राज्य एवं नागरिकोके सम्बन्ध अवयव
एव अवयवीके सम्बन्धके तुल्य हैं। अवयवोकी सुव्यवस्था अवयवीकी सुव्यवस्थापर
एव अवयवीकी सुव्यवस्था अवयवोंकी सुव्यवस्थापर निर्भर है। अर्थात् राज्य एवं
नागरिकोकी सुव्यवस्था एवं प्रगति अन्योन्याश्रित है।' उसके अनुसार 'सामान्य
इच्छा सदा ही नागरिकोकी सामान्य इच्छाका प्रतिनिधित्व करेगी और वह उनके
स्थायी हितका प्रतिनिधित्व करेगी।' इसी आधारपर रूसोने यह भी कहा था कि
'नागरिक सदा ही राज्यहितमें व्यक्तिगत हित देखेगा, सदा राज्यकी सामान्य
इच्छाके अनुसार ही सोचेगा। ऐसा न करनेवाला नागरिक भ्रान्त है। ऐसे भ्रान्तको
राज्यकी इच्छाका अनुसरण करनेके लिये बाध्य किया जायगा, अर्थात् उसे स्वतन्त्र
होनेके लिये राज्यद्वारा बाध्य किया जाना चाहिये।'
वस्तुतः यह सामान्य इच्छा एक प्रत्यक्ष जनवादी संघ हॉब्सके दीर्घकायके
ही तुल्य सर्वसर्वा है और वह निरपेक्ष है। मनुष्यकी सद्भावनापर रूसोका
अटूट विश्वास था। उसके अनुसार 'राजनीति और प्रचारकोद्वारा विशुद्ध मनुष्य
प्रवञ्चनामें डाला जाता है। राजनीतिक दल, समाचारपत्र आदि यन्त्र ऐसी प्रवञ्चनाके
स्रोत है। ये यन्त्र नागरिकोंको कृत्रिमरूपसे सख्याओमें विभक्त कर देते हैं। दलोकी
इच्छासे उनके सदस्य प्रभावित भी होते हैं। इन दलों या यन्त्रोद्वारा कई सामान्य
इच्छाएँ बन जाती हैं। अतः ऐसे राजनीतिक दल या सङ्घ आदर्श सुव्यवस्थामें
अनावश्यक ही नहीं, किंतु बाधक भी होते हैं। इनके न रहनेपर राज्य और
नागरिकोंमें सीधा सम्बन्ध रहता है। नागरिक सदा ही दल या सस्थाओकी अपेक्षा
राज्यके हितमें ही अपना हित समझेगे। वे सामान्य इच्छाके अनुसार जीवन-यापन
करना ठीक समझते हैं।' इसीलिये रूसो 'अद्वैतवादी दार्शनिक' समझा जाता है।
'संघों, दलोंको समाप्त करनेके लिये उनकी संख्या बहुत बढ़ा देनी चाहिये। इससे

रूसोके विचार ६१
वे स्वयं अस्तित्वहीन हो जाते हैं।' रूसो प्राचीन नैसर्गिक स्वतन्त्रताकी प्राप्ति
सम्भव नहीं समझता था। परंतु एक उच्च नैतिक नागरिक स्वतन्त्रताकी प्राप्ति
सम्भव मानता था।
उसके मतानुसार 'नागरिकोंकी सभा ही नियमनिर्णयकी अधिकारिणी है,
प्रतिनिधि-सभा नहीं। नियमोंको कार्यान्वित करनेके लिये कार्यपालिका होती है। कार्य-
पालिका नागरिकोंकी सभाके प्रति पूर्ण उत्तरदायी होती है। यह कार्यपालिका ही सरकार
होती है।' रूसोके मतानुसार 'ऐसा जनवाद अपने सदस्योंसे स्थायी सतर्कताकी
आशा रखता है। यद्यपि ऐसे जनवादको सदा ही खतरा रहता था। उसका आदर्श
वाक्य था 'मैं खतरनाक स्वतन्त्रताको शान्ति पूर्ण दासत्वसे अच्छा समझता हूँ।'
ऐसे नागरिक ही इस व्यवस्थाको स्थायी बना सकते हैं।" रूसोका यह ऐतिहासिक
वाक्य है कि 'जनवाणी ही देववाणी है।' उसने सामान्य इच्छाको निरपेक्ष, अदेय,
अविभाज्य, स्थायी एवं सत्य माना है। उसने हॉब्सकी 'निरपेक्षता' और लॉक-
की 'जनस्वीकृति' का मिश्रण किया है। उसने हॉब्सकी निरपेक्षताको जनवादी रूप
और लॉककी जनस्वीकृतिको सक्रिय रूप दिया। रूसोकी पुस्तकोमें क्रान्तिकी
ज्वाला धधक उठी, परंतु वह स्वयं क्रान्तिकारी नहीं था। उसने १७५२ के
अपने एक भाषणमें कहा कि 'क्रान्तिको उतना ही भयानक मानना चाहिये,
जितना कि उन बुराइयोंको—जिन्हें क्रान्ति दूर करना चाहती है।' उसने जेनेवाके
नागरिकोंको लिखा था कि 'आप स्वतन्त्रता अवश्य प्राप्त कीजिये, परंतु मानव-
हत्याके विरुद्ध दासताको पसंद कीजिये।' नियम बनानेका कार्य किसी राष्ट्रके
सम्पूर्ण नागरिकोंद्वारा हो सकना सम्भव नहीं होता। जनताद्वारा निर्वाचित प्रति-
निधियोंद्वारा ही वह सम्भव होता है। अतः प्रतिनिधिसभाका विरोध भी रूसोका
अयौक्तिक है। 'सभ्य समाजने व्यक्तिको दुखी, अनैतिक, व्यभिचारी बनाया'
यह भी रूसोकी धारणा भ्रान्तिपूर्ण है। विशिष्ट विचारशील लोग ही मार्गदर्शक हो
सकते हैं।
राब्सपीयरने रूसोको 'राज्यक्रान्तिका देवता' घोषित किया था। रूसो
व्यक्तिवादका समर्थन करते हुए पूर्ण अराजकतावादी स्वतन्त्रताका समर्थक बन जाता
है और सभ्य समाजका कट्टर विरोधी प्रतीत होता है। वह स्वतन्त्रता, नैतिकता
एवं समाजका विरोध मानता था। इसी आधारपर फ्रांसीसियोंने तत्कालीन समाजका
विरोध किया, व्यक्तिगत सुरक्षाके लिये संघर्ष किया और क्रान्तिके पश्चात् 'राष्ट्रिय
सभा' की घोषणा हुई। यह विचारधारा भविष्यके व्यक्तिवादियोंकी पृष्ठभूमि बनी,
क्योंकि व्यक्तिवादी भी स्वतन्त्रता तथा समाजका परस्पर विरोध मानते थे।
वार्करने रूसोके लेखको 'व्यक्तिवादका प्राण' कहा, था, परंतु अन्यत्र रूसो अधि-
नायकवादका भी समर्थक प्रतीत होता है, जैसा पहले दिखाया जा चुका है कि

'राज्य बिना व्यक्ति मक्खी-तुल्य है।' राज्यद्वारा व्यक्तिको स्वतन्त्र होनेके लिये बाध्य
किया जाना वह ठीक मानता था। राज्यद्वारा निर्मित नागरिक धर्मका उल्लङ्घन
करनेवाले नागरिकको फाँसीका दण्ड देना उचित समझता था। इसीलिये व्हानने
रूसोको 'व्यक्तित्वका शत्रु' भी कहा है। हाँ, वह यह अवश्य कहता है कि 'सामान्य
इच्छाका स्रोत जनमत है।' एक तरफ वह कहता है—'मनुष्य जन्मा स्वतन्त्र परन्तु
सभी ओर जंजीरोंसे जकड़ा हुआ'। और उसी पुस्तकमें राज्यकी निरपेक्षताका भी
वर्णन करता है। उसका यह भी कहना है कि 'पूर्ण स्वतन्त्रता किसी ही देशमें
सम्भव है, सब जगह नहीं।' वह स्वतन्त्रताका जलवायुसे भी घनिष्ठ सम्बन्ध
मानता है। व्यक्तिगत सम्पत्तिको उसने समाज और राज्यकी धात्री बताया और उसे
ही दरिद्रता और दासताकी जननी भी। किन्तु वही अन्यत्र सम्पत्तिको भली वस्तु
भी बताता है। 'येमिल' में भी उसने व्यक्तिगत सम्पत्तिके आधारको न्याययुक्त
माना है। उसकी रक्षा राज्यका कर्तव्य बताया है और 'कार्सिका' पुस्तकमें कहा
है कि 'व्यक्तिगत सम्पत्तिका अन्त नहीं किया जा सकता है।' इस तरह कहा वह इस
'सम्पत्तिका शत्रु' प्रतीत होता है और कहीं उसका 'पुजारी'। इसी तरह कहीं
'स्वतन्त्रताका अग्रदूत' तो कहीं 'दासताका अग्रदूत'। जनवादके विपरीत वह सीमित
राजतन्त्रका भी समर्थक बना। कहीं शिक्षाकी स्वतन्त्रताको ठीक कहा तो कहीं उसका
राजतन्त्र होना ठीक कहा। कहीं कलाकी निन्दा की तो कहीं कलाकी प्रशंसा। कहा
जाता है कि 'रूसोका जीवन जैसे अव्यवस्थित था वैसा ही उसका दर्शन भी।'
रामराज्यकी दृष्टिमें खल प्राणीकी सम्पत्ति अवश्य शोषणका कारण होती
है; परन्तु शिष्ट-सभ्य, साधु पुरुषकी सम्पत्ति सदा ही परोपकारके काममें आती है।
व्यक्तिद्वारा समाज बनता है और समाजसे व्यक्तिको उन्नत होनेमें सुविधा प्राप्त
होती है। अतः व्यक्ति और समाजका विरोध नहीं, किन्तु समन्वय ही उचित है।
इसी तरह सभी लोग सब विषयके ज्ञाता नहीं हो सकते। सब विषयमें सबकी
सम्मति लेनेकी अपेक्षा जिस विषयका जो जानकार हो उस विषयमें ही उसकी
सम्मति लाभदायक होती है। अतः सम्पूर्ण नागरिक संघको नियमनिर्माणमें
लगाना व्यर्थ ही है। स्पष्ट ही है कि एक शिशु-चिकित्सामें एडवोकेट या
इंजीनियरकी सम्मति लेना व्यर्थ है। कुछ लोग इन सब बातोंको इसीलिये
महत्त्व देते हैं कि इनके द्वारा राज्यको ईश्वरीय संस्था माननेका अन्धविश्वास दूर
हुआ। वे लोग इस मान्यताको अवैज्ञानिक कहनेका भी साहस करते हैं। परन्तु यदि
विज्ञानका अर्थ सत्यज्ञान ही है तब तो युक्ति, तर्क और अपौरुषेय वेदादि शास्त्र-
सिद्ध ईश्वर एवं ईश्वरीय व्यवस्थाओंको अवैज्ञानिक कहना केवल साहसमात्र है।
राजनीतिशास्त्रोंके द्वारा वस्तुतः शाश्वत सत्य सिद्धान्तकी अभिव्यक्तिमात्र होती
है। मानवीय संस्थाकी अपेक्षा दैवी संस्थामें कहीं अधिक जानकारी प्राप्त करना

रुसोके विचार ६७
आवश्यक होता है । मध्यकालीन यूरोपीय लोगोंका यह विश्वास कि 'ईश्वरका
प्रतिनिधित्व करनेवाला अत्याचारी शासक भी मान्य होना चाहिये, क्योंकि पापी
नागरिकोंको दण्ड देनेके लिये ईश्वरने दुष्ट शासनकी नियुक्ति की है' अप्रामाणिक
है । शास्त्रोंका स्पष्ट मत है कि मात्स्यन्यायसे पीड़ित जनताकी माँगपर ही विशिष्ट
शक्ति एवं गुणसम्पन्न शासक ईश्वरद्वारा नियुक्त हुआ था । जनरञ्जन करना
उसका परम कर्तव्य है । अतः जनवादका धर्म नियन्त्रित रामराज्य जैसे शासनमें
पूर्ण उपयोग है । केवल व्यक्तियोंद्वारा जन्म होनेमात्रसे राज्य अच्छा नहीं हो
सकता । हॉब्सका दीर्घकाय राज्य व्यक्तियोंद्वारा होनेपर भी निरपेक्ष होनेसे लॉक
एवं रूसोने उसे हानिकारक बताया है । आधुनिक आलोचक ही 'सोशल कन्ट्राक्ट'
सामाजिक समझौता या इकरारनामाको अप्रामाणिक मानते हैं ।
बेन्थम आदिकोंका कहना है कि 'व्यक्तिको सङ्घोंमें रहना हितकर प्रतीत
होता है, इसीलिये फिर सब उपयोगिताकी दृष्टिसे राज्य बनाता है । कहा जाता है
कि राज्यको 'कृत्रिम संस्था माननेसे मनुष्य उसमें रद्दोबदल करना सम्भव
समझता है ।' परंतु 'राज्य ईश्वरीय संस्था है'—इसका यह अभिप्राय कदापि नहीं कि
उसमें गडबड़ी नहीं हो सकती और उसमें सुधार नहीं हो सकता ।
मनुष्यका शरीर ही ईश्वरीय है । हेगेलके अनुयायी मार्क्सने उसके
द्वन्द्ववादको 'द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद' का रूप दिया । हेगेल जैसे निरपेक्ष
आदर्श राजतन्त्रका समर्थक था, वैसे ही मार्क्सने भी सर्वहाराकी
अधिनायकताका समर्थन किया । रूसमें वही निरपेक्षता स्थिर हुई ।
कहा जाता है कि हेगेलवादी या मार्क्सवादी अधिनायकवादका रूसमें
बोलबाला है । इससे जनतन्त्र-वादका कोई मेल नहीं हो सकता है । सोवियत
रूसकी उन्नति अवश्य हुई है, परंतु व्यक्तिगत स्वतन्त्रता-जैसी बहुमूल्य वस्तु वहाँ
समाप्त हो गयी । जब एक पक्षी भी सोनेके पिंजड़ेमें मीठे फल खाकर और
ठंडा पानी पीकर बंद रहना पसंद नहीं करता, बल्कि आजादीसे खट्टे फल
खाकर और खारा पानी पीकर भी स्वतन्त्र रहना ही पसंद करता है, तब क्या
मनुष्य उस पक्षीसे भी गया बीता है जो ऐसी स्वतन्त्रता पसंद करेगा ?
मार्क्सवादियोंके अनुसार राज्य दो ही प्रकारका होता है—एक सर्वहाराका
अधिनायकत्व और दूसरा पूँजीपतियोंका अधिनायकत्व । रूसी राज्य राजनीति-
शास्त्रकी परम्पराके विपरीत भी है । प्रजातन्त्रके अङ्ग—भाषण, कार्य, संगठन
आदिकी स्वतन्त्रताका वहाँ कोई मूल्य नहीं है । सोवियत व्यवस्थाके विरुद्ध वहाँ
कोई मत व्यक्त नहीं कर सकता और न कोई संगठन ही हो सकता है । फिर

६४ मार्क्सवाद और रामराज्य
भी मार्क्सवादी रूसी राज्यको पूर्णजनतन्त्रवादी कहनेकी धृष्टता करते हैं ।
जॉन लॉककी जन-स्वीकृतिका भी रूसमें कोई महत्त्व नहीं है । एकदलीय व्यवस्था
ही वहाँ सब कुछ है ।
स्टालिनके मतानुसार पूँजीवादी देशोंमें भिन्न-भिन्न वर्गोंके वर्गीय अर्थैक्यका
प्रतिनिधित्व राजनीतिक दलोंद्वारा होता है अर्थात् एक राजनीतिक दल एक वर्गके
या कुछ वर्गोंके अर्थैक्यका प्रतिनिधित्व करता है । सोवियत रूसमें वर्गोंका अन्त
हो गया है, अतः वहाँ राजनीतिक दलोंकी आवश्यकता ही नहीं है; परंतु
राज्य-शास्त्रमें राजनीतिक दल जनतन्त्रके प्राणतुल्य माने जाते हैं । उन्हें वर्गीय
संस्था कहकर अनावश्यक बतला देना जनतन्त्रीय विचारके विपरीत है । विरोधी
दलकी अनुपस्थितिमें वास्तविक जनवाद असम्भव ही है । फिर 'वर्गका अन्त हो
गया' यह तो तभी विदित हो सकता है, जब भाषण, प्रकाशन और संगठनकी
स्वाधीनता हो । मार्क्सवादियोंके अनुसार 'सर्वहाराका अधिनायकत्व संक्रमणकालकी
ही वस्तु है । अन्तमें उत्पादन, वृद्धि एवं सुव्यवस्थाके द्वारा राज्यका अत्यन्त
लोप होकर वर्गविहीन, राज्यविहीन समाजकी स्थापना होगी ।' परंतु स्टालिनने
बतलाया है कि 'सोवियत राज्य पूँजीवादी राज्योंसे घिरा हुआ है । शायद
एंगेल्सको, जिसने राज्यलोपकी बात कही है, अन्तर्राष्ट्रिय परिस्थितिका
अनुमान नहीं था।' मार्क्सवादी ऐतिहासिक मास्कोके मुकदमोंको सोवियतविरोधी
षड्यन्त्रोंका प्रतीक बतलाकर कहते हैं कि 'सोवियत राज्यको शस्त्रास्त्र-सम्पन्न
गुप्तचर पुलिस सेनासे पूर्ण दृढ़ बनाना ही आवश्यक है ।' अतः राज्यलोपकी
कल्पना मनोराज्यमात्र रह गयी ।
चाणक्यने ठीक ही कहा है कि शक्ति-मदसे बड़ा कोई मद नहीं है ।
'प्रभुता पाइ काहि मद नाही' यह तुलसीदासजीकी उक्ति भी सभी व्यवस्थाओंपर
लागू होती है । धर्मनियन्त्रित रामराज्य-प्रणाली ही ऐसी व्यवस्था है, जिसमें
राज्यमदका संचार नहीं हो पाता । राज्यमदका पान कर वे ही मत्त होते हैं जिन्होने
साधु-सभाका सेवन नहीं किया—
जे अचवँत नृप मातहिं तेई । नाहिन साधुसभा जंहिं सेई ॥
भरत-जैसे साधु पुरुषोंको तो विधि-हरि-हर-पद पानेपर भी मद नहीं हो '
सकता है । क्या कभी नगण्य तक्र-बिन्दुसे क्षीर-समुद्र फट सकता है—
भरतहि होइ न राजमद विधि हरि हर पद पाइ ।
कबहुँ कि काँजी सीकरनि क्षीर सिंधु बिनसाइ ॥

महाभारतमें सामाजिक अनुबन्ध ६५
अस्तु । धर्महीन सोवियत-शासन शक्ति-मदका अपवाद नहीं कहा जा सकता।
समाजवादी ढाँचेमें आर्थिक सत्ताका तो अन्त हो गया, परन्तु सर्वहारा-दलके
अधिनायकत्वमें राजनीतिक तथा सामाजिक सत्ताका अन्त नहीं होता । नये
सत्ताधारी शक्तिमदके अपवाद नहीं होते । क्रान्तिके उपरान्त ये शक्तिशाली व्यक्ति
अपने स्थानोंसे अलग नहीं होना चाहते। फलतः न जनतन्त्र ही सम्भव होता है
और न राज्यका लोप ही । मार्क्सवादी कहते हैं कि 'राष्ट्रियता भी
पूँजीवादका ही परिणाम है । सर्वहाराकी क्रान्तिमें सभी प्रकारके शोषणोंका
अन्त होता है, फिर राष्ट्रिय शोषण भी नहीं रहेगा।' परन्तु क्या सोवियत रूसमें
सभी शोषणोंका अन्त हो गया ? क्या अब वहाँ राष्ट्रियता समाजवादी ढाँचेमें नहीं
पनप रही है ? मार्क्सवादके अनुसार विश्वक्रान्तिके अन्तमें भी राज्य तो आवश्यक
होगे ही । फिर इन राज्योंका परस्पर सम्बन्ध क्या होगा ? यदि मध्यकालीन पोप
या सम्राट्‌के तुल्य एक ही अधिनायक या शासक संचालक होगा तब तो उसकी
अपेक्षा एक धर्मनियन्त्रित राम-जैसा सार्वभौम राजा या राज्योंके धर्मनियन्त्रित
प्रतिनिधियोंकी सभाद्वारा संचालन हो तो भी क्या हानि है ?
महाभारतमें सामाजिक अनुबन्ध
महाभारत शान्तिपर्वमें शरशय्यास्थ भीष्मजीने अन्य धर्मोंके साथ राजधर्म-
का भी उपदेश किया है । उसमें उन्होंने अराजकताको बड़ा पाप बताया है और
कहा है कि 'राज्यस्थापनाके लिये उद्यत बलवान्‌के सामने सबको ही झुक जाना
चाहिये । अराजक राज्यको दस्यु नष्ट कर देते हैं—‘अनिन्द्रमवलं राज्यं दस्यवो-
ऽभिभवन्त्युत ।' अराजक राज्य निर्वीर्य होकर नष्ट हो जाते हैं । अराजकतासे अधिक
कोई पाप नहीं ।
अराजकाणि राष्ट्राणि हतवीर्याणि वा पुनः ।
न हि पापात् परतरमस्ति किंचिदराजकात् ॥
(शा० प० राजा० ६७ । ७)
कुछ लोग भीष्मद्वारा वर्णित मात्स्यन्यायकी हाब्सकी प्राकृतिक स्थितिसे तुलना
करते हैं । कहा जाता है कि जिस युगमें मनुष्य प्राकृतिक जीवन व्यतीत
करता था, वह 'स्टेट आफ नेचर' (प्राकृतिक दशा) है। जिसमें प्राकृतिक युगके
बन्धनसे मुक्त होकर सामाजिक जीवनमें प्रवेश करता है, उसे 'स्टेट आफ सोसाइटी'
कहते हैं और जिसमें राज्य निर्माण करके राजनीतिमें प्रवेश करता है, वह है
'स्टेट आफ पोलिटिकल सोसाइटी' । जैसे जलमें प्रबल मत्स्य निर्बल मत्स्योंका
भक्षण कर लेता है, वैसे ही प्रबल मनुष्य दूसरे निर्बल मनुष्योंके वित्त-कलत्र आदि
सब कुछ छीन लेते हैं, एक दूसरेकी हत्या कर देते हैं—
सा० र० ५—

६६ मार्क्सवाद और रामराज्य
अराजकाः प्रजाः पूर्वं विनेशुरिति नः श्रुतम्।
परस्परं भक्षयन्तो मत्स्या इव जले कृशान्॥
(शा० प० ६७।१७)
इसे ही 'लाजिक आफ फिश' (मात्स्यन्याय) कहते हैं। इसी मात्स्यन्यायसे
पीड़ित होकर मनुष्योंने एकत्र होकर सदाचारसम्बन्धी कुछ नियम बनाये।
जैसे कठोर वाणी, पर-स्त्री, पर-धन-हरण आदिके त्यागका नियम बनाया गया।
इससे काम, क्रोध, लोभ, मोहादिसे छुटकारा मिलता है और मनुष्य घृणित
नारकीय यातनामय, भयभीत एव सशङ्क क्षणिक जीवनसे हटकर सभ्य जीवनमे
प्रवेश करता है।
वाक्शूरो दण्डपरुषो यश्च स्यात् पारजायिकः।
यः परस्वमथादद्यात् त्याज्या नस्तादृशा इति॥
समये यांस्ततश्चक्रुः समयानिति नः श्रुतम्। (शां०प० ६७अ०)
हाब्सने भी 'स्टेट आफ नेचर' (प्राकृतिक राज्य) का इसी प्रकार वर्णन
किया है, परंतु हाब्सके अनुसार मनुष्यमें केवल भय-वृत्ति थी। इसी भयसे बचनेके
लिये स्वार्थमयी वृत्तिसे राज्यका विकास हुआ। परंतु भीष्मके अनुसार लोभ,
मोह, काम, क्रोध, मद, मत्सर—ये छः प्रधान आसुरी वृत्तियाँ मात्स्यन्यायके
कारण हैं। अतः इन सबसे छुटकारा पाना सामाजिक जीवन-निर्माणका उद्देश्य है।
इन वृत्तियोंपर विजय प्राप्त करना ही सभ्यता है।
पर ये सामाजिक नियम (मारल लाज) ही बने रहे, वास्तविक नियम (पाजिटिव
लॉ) न बन सके; क्योकि उन नियमोंका पालन करनेके लिये विवश करनेवाली
कोई सत्ता न थी। जनताकी स्वीकृतिमात्र ही उसका आधार था। भीष्मका यह
समाज निर्माण सामाजिक अनुबन्ध या पारस्परिक समझौता था, किंतु नियम-
निर्माणके बाद उन नियमोंका कोई नियामक न होनेसे पालन न हो सका। लोग
मनमानी उन नियमोंका उल्लङ्घन करने लगे, तब उन्हें एक शासककी आवश्यकता
हुई। जिसके नियन्त्रण या दण्ड-भयसे प्रजाको नियम-पालनके लिये विवश होना
पड़े। एतदर्थ प्रजाने ब्रह्माके पास जाकर विनय की कि एक राजा या शासकके
बिना हमलोग नष्ट हो जायेंगे, अतः हमलोगोंके लिये कोई समर्थ योग्य शासक
दीजिये, जिसका कि हमलोग सम्मान करे और वह हमलोगोंका रक्षण करे।
सहितास्तास्तदा जग्मुरसुखाताः पितामहम्।
अनीश्वरा विनश्यामौ भगवंश्चीश्वरं दिश॥
यं पूजयेम सम्भूय यश्च नः प्रतिपालयेत्। (शा०प०६७।२०-२१)
तब ब्रह्माने प्रजाके सामने अष्टलोकपालोंके दिव्य प्रताप, तेज आदिसे युक्त
मनुको प्रस्तुत किया। परंतु मनुने शासक बनना अस्वीकार कर दिया और कहा
कि राज्य चलानेमें पापका डर रहता है, राज्य चलाना बहुत कठिन काम है।

राजाको दण्ड देना पड़ता है। विशेषतः मिथ्याचारमें संलग्न प्रजाका पालन तो
बहुत ही कठिन है। इसपर प्रजाने कहा कि 'तुम डरो मत, दण्ड देना पाप नहीं
वह तो पाप करनेवालोंके पापोंका ही फल है और हमलोग पशु तथा सुवर्णके
लाभका पचासवाँ भाग तथा धनका दसवाँ भाग राजकोष-वृद्धिके लिये तुम्हें देने
रहेंगे। उत्तम वस्तु तुम्हें भेंट की जायगी। शस्त्रोंमें सुसज्जित शूर तुम्हारा अनुसरण
करेंगे। इस तरह तुम दुष्प्रधर्ष और प्रतापयुक्त होकर विजयी होओगे। राज्यमे
सुरक्षित होकर प्रजा जो पुण्यकर्म करेगी, उस धर्मका चतुर्थांश भी तुम्हें मिलता
रहेगा। इस तरह सुखमे प्राप्त धन, धर्म एवं बलसे उपबृंहित होकर तुम हमलोगोंका
उसी तरहसे पालन करोगे, जैसे इन्द्र देवताओंका। तुम सूर्यकी भाँति चमकते हुए
विजयके लिये प्रस्थान करो। शत्रुओंका मान-मर्दन करो, तुम्हारी सदा जय होगी।'
तमब्रुवन् प्रजा मा भैः कर्तृ नेनो गमिष्यति ।
पशूनामधिपञ्चाशद्धिरण्यस्य तथैव च ॥
धान्यस्य दशमं भागं दास्याम कोषवर्धनम् ।
मुख्येन शस्त्रपत्रेण ये मनुष्या प्रधानतः ॥
भवन्तं तेऽनुयास्यन्ति महेन्द्रमिव देवताः ।
विजयाय हि निर्याहि प्रतपन् रश्मिवानिव ॥
मानं विधम शत्रूणां जयोऽस्तु तव सर्वदा ।
(शा० प० रा० ६७।२३-२५।२०)
इस तरह राजाका वरण करके प्रजाने राज्यका निर्माण किया। यहाँ सामाजिक
संघटन तथा सामाजिक नियमोंको स्थायी एवं अक्षुण्ण रखनेके लिये ही राज्यका
निर्माण हुआ है। अतः राजाको उतने ही अधिकार दिये गये हैं जितने कि उक्त
कार्यके लिये आवश्यक थे।
हॉब्सके कल्पनानुसार 'राजाको प्रजाने अपने सभी अधिकार नहीं सौंप।
अतएव हॉब्सके 'लिवियाथन' (दीर्घकाय) के तुल्य यह राजा निरङ्कुश नहीं था।
उसके अधिकार सीमित थे। यदि वह अधिकारोंका दुरुपयोग करे तो जनताको
उसे पदच्युत करनेका भी अधिकार था।' हॉब्सके अनुसार 'दीर्घकायका विरोध
करना कथमपि न्यायसंगत नहीं है।' परंतु भीष्मके अनुसार ऐसा नहीं। यहाँ
उद्धत वेन-जैसे राजाको प्रजाप्रतिनिधि ऋषियोंने पदच्युत ही नहीं, उसे
नष्ट भी कर दिया था। यही भीष्म-सम्मत सामाजिक समझौतेका सिद्धान्त या
सोशल कन्ट्रेक्टकी थ्योरी है।
कुछ लोग भीष्मद्वारा वर्णित मात्स्यन्यायके युगको हॉब्सका प्राकृतिक युग
ही मानते हैं, परंतु वस्तुस्थिति ऐसी नहीं है; क्योंकि भारतके अनुसार वस्तुतः
कृतयुगमें सभी प्रजा धर्मनिष्ठ तथा परम विवेक, विज्ञान, संयम-सम्पन्न थी। कालक्रम
से सत्त्वगुणके ह्रास होनेपर धर्म-ह्रास होनेसे रज तम एवं तदुद्भूत अधर्म बढनेपर

६८ मार्क्सवाद और रामराज्य
ही मात्स्यन्यायका आविर्भाव हुआ। मात्स्यन्यायकी स्थिति प्राकृतिक अवस्था नहीं
है। वह विकृतिभूत अवस्था है। शास्त्रीय सिद्धान्तानुसार विकासकी अपेक्षा
ह्रासका ही पक्ष तथ्य है। इसीलिये विष्णुके पुत्र ब्रह्मा सर्वज्ञ हुए । ब्रह्माके पुत्र
वशिष्ठ आदि भी सर्वज्ञकल्प हुए । जिनकी सृष्टि जितनी कारणके समीप थी,
उनमें उतनी ही स्वच्छता थी। फिर जितनी-जितनी कारणसे दूर होती गयी, उतनी
ही स्वच्छता होती गयी । अतः कारणके अव्यवहित समीपस्थ प्रजा
(प्राणी) सात्त्विक, धर्मात्मा, विचारशील तथा नियन्त्रित थी । वैसे भी
हर एक कृतयुगमें सत्त्वका विकास अधिक ही होता है। जैसे प्रत्येक ग्रीष्म,
हिम आदि ऋतुमे गर्मी, जाड़ा आदिका प्रादुर्भाव होता है । उसी तरह
कृतयुगमे सत्त्वका विशेषरूपसे विकास होता है । इस तरह मात्स्यन्यायकी
अवस्था विकार ही है, स्वाभाविक नहीं । इसीलिये दूसरे प्रसङ्गमें उसी
राजधर्ममें भीष्मने बतलाया है—
नियतस्त्वं नरव्याघ्र शृणु सर्वमशेषतः ।
यथा राज्यं समुत्पन्नमादौ कृतयुगेऽभवत् ॥
न वै राज्यं न राजासीन्न च दण्डो न दाण्डिकः ।
धर्मेणैव प्रजाः सर्वा रक्षन्ति स्म परस्परम् ॥
पाल्यमानास्तथान्योन्यं नरा धर्मेण भारत ।
खेदं परमुपाजग्मुस्ततस्तान् मोह आविशत् ॥
ते मोहवशमापन्ना मनुजा मनुजर्षभ ।
प्रतिपत्तिविमोहाच्च धर्मस्तेषामनीनशत् ॥
नष्टायां प्रतिपत्तौ च मोहवश्या नरास्तदा ।
लोभस्य वशमापन्नाः सर्वे भरतसत्तम ॥
अप्राप्तस्याभिमर्शं तु कुर्वन्तो मनुजास्ततः ।
कामो नामापरस्तत्र प्रत्यपद्यत वै प्रभो ॥
तांस्तु कामवशं प्राप्तान् रागो नामाभिसंस्पृशत् ।
रक्ताश्च नाभ्यजानन्त कार्याकार्ये युधिष्ठिर ॥
अगम्यागमनं चैव वाच्यावाच्यं तथैव च ।
भक्ष्याभक्ष्यं च राजेन्द्र दोषादोषं च नात्यजन् ॥
विलुप्ते नरलोके वै ब्रह्म चैव ननाश ह ।
नाशाच्च ब्रह्मणो राजन् धर्मो नाशमथागमत् ॥
नष्टे ब्रह्मणि धर्मे च देवांस्त्रासः समाविशत् ।
ते त्रस्ता नरशार्दूल ब्रह्माणं शरणं ययुः ॥
( महा० शां० प० राजधर्म० ५९।१३—२२ )

महाभारतमें सामाजिक अनुबन्ध ६९
'आदि कृतयुगमें जिस तरह राज्य उत्पन्न हुआ वह सुनो, उस समय
राज्य, राजा, दण्ड एवं दण्ड देनेवाला कुछ भी नहीं था। समस्त प्रजा धर्मके
अनुसार चलती थी और उसी धर्मसे परस्पर रक्षा कर लेती थी। (उस समय
अनन्त विद्याओंका उद्गमस्थान वेद तथा तदनुसारी आर्षशास्त्र सबको अभ्यस्त
थे। अतः धर्म, अर्थ, काम, मोक्षकी उचित विवेकपूर्वक सभी व्यवस्थाएं चल
रही थीं। सभ्यता, संस्कृति और ज्ञान-विज्ञानकी उन्नति पराकाष्ठापर पहुंची
थी। रूसो तथा मार्क्स आदिद्वारा कल्पित भविष्यके स्वर्णयुग उसके सामने
नगण्य थे।) धर्मनीतिसे अन्योन्य-पालन-संलग्न प्रजा कालक्रमसे खेद या
थकावटको प्राप्त हो गयी, फिर उसमें मोहका प्रवेश हुआ। मोहके कारण
स्मृतिभ्रंश हुआ और फिर धर्मका लोप होने लगा। स्मृतिभ्रंश होनेसे लोग
लोभके वश होकर विचारहीन हो गये और फिर रागकी प्रवृत्ति हुई और फिर
कामका प्रादुर्भाव हुआ। उससे कार्याकार्यका ज्ञान भी न रहा, फिर तो
अगम्यागमन, भक्ष्याभक्ष्य, वाच्यावाच्य, दोषादोषका विचार नष्ट हो गया।
ऐसी दशामें वेद जो कण्ठस्थ हो गये थे, विस्मृत हो गये। वेदके विस्मरणसे
वेदोक्त धर्मकर्मका भी लोप हो जाना स्वाभाविक था। (इससे स्पष्ट है कि पहले
वेदादि शास्त्रों एवं तदुक्त धर्म-कर्म, विवेक-विज्ञानोंका पूर्णरूपसे प्रकाश था।)
इस स्थितिको देखकर देवतालोग त्रस्त होकर ब्रह्माकी शरण गये और उस भयके
दूर करनेका उपाय पूछा।' ब्रह्माजीने सोच-विचारकर सबके कल्याणार्थ धर्म, अर्थ,
कामका बोधक तथा प्रापक एक लाख अध्यायोंका दण्डनीति-शास्त्र बनाकर
देवताओंको दिया। उसे सर्वप्रथम शंकरजीने ग्रहण किया। उनसे बृहस्पति,
शुक्र, इन्द्रादिने ग्रहण किया और उसका संक्षेप भी किया—
ततोऽध्यायसहस्त्राणां शतं चक्रे स्वबुद्धिजम्।
यत्र धर्मस्तथैवार्थः कामश्चैवाभिवर्णितः॥
उपकाराय लोकस्य त्रिवर्गस्थापनाय च।
नवनीतं सरस्वत्या बुद्धिरैषा प्रभाविता॥
(शां० प० ५९।२९, ७७)
यद्यपि यह शास्त्र भी वेदाभ्यासजन्य संस्कृत ब्रह्मबुद्धिसे प्रादुर्भूत होनेके
कारण वेदमूलक ही था, फिर भी उस परिस्थितिके लोगोंमें विशेषरूपसे प्रभावशाली
हुआ। प्रभुसम्मत वेदवाक्योंकी अपेक्षा सुहृद्-सम्मत वाक्योंके रूपमें व्यक्त होकर
यह अधिक उपकारी सिद्ध हुआ। फिर भी इसे पूर्णरूपसे कार्यान्वित करनेके
लिये दण्डकी अपेक्षा थी। दण्डसे युक्त होकर निग्रहानुग्रहद्वारा लोकरक्षणका
हेतु बनकर ही यह दण्डनीति प्रचलित हो सकती थी। अतः योग्य समर्थ
दण्डप्रणेता प्राप्त करनेके लिये देवता विष्णुके पास गये और उनसे
श्रेष्ठ शासक माँगा। भगवान् नारायणने उन्हें श्रेष्ठ लोकपालोंके दिव्य

७० मार्क्सवाद और रामराज्य
सद्गुणोसे सम्पन्न एक निर्दोष विरजा (रजोगुणसे रहित) राजा निर्माण करके दिया।
ततः संचिन्त्य भगवान् देवो नारायणः प्रभुः।
तैजसं वै विरजसं सोऽसृजन्मानसं सुतम्॥ (८८)
वह राजा प्रभुत्व-निरपेक्ष होकर त्याग-वैराग्यकी ही ओर रुचि रखता था।
उसका पुत्र कीर्तिमान् और पौत्र कर्दम हुआ। क्रमेण अग, फिर वेन राजा हुआ।
वह उत्पथगामी था। इसीलिये ऋषियोंने उसे पदच्युत कर दिया और अभिमन्त्रित
कुशोंसे मार डाला। उसका पुत्र पृथु हुआ। वह बहुत ही योग्य एवं धर्मात्मा
हुआ। उसने ऋषियोंसे प्रार्थना की कि मुझे आपलोग आज्ञा दें, क्या करूँ।
ऋषियोंने उससे प्रतिज्ञा करायी 'तुम नियत होकर, निःशङ्क होकर धर्मका आचरण
करो। स्वयं प्रिय, अप्रिय छोड़कर सब काम-क्रोध, लोभ एवं मानको दूरसे ही
त्यागकर सब प्राणियोंका समानरूपसे हिताचरण करो। जो भी धर्मसे विचलित हो
शास्त्रधर्मके अनुसार उसका निग्रह करो और यह भी प्रतिज्ञा करो कि मन, वचन,
कर्मसे तुम भौम ब्रह्म (पृथ्वीके ब्राह्मणो) की रक्षा करोगे। जो भी धर्मनीतियुक्त होगा,
निःशङ्क होकर उसका पालन करोगे और मनमानी कुछ न करोगे। यह भी
प्रतिज्ञा करो कि ब्राह्मणोंको प्राणदण्ड नहीं दोगे और सभी लोकोंको साङ्कर्यसे
बचाओगे।'
पृथुने वैसी ही प्रतिज्ञा की और कहा कि 'ब्राह्मण सदा ही हमारे नमस्य
होंगे।' इस तरह परस्पर वचनबद्ध होकर राज्य व्यवस्थित किया गया। इसे ही
'सोशल कन्ट्राक्टस' कहा जा सकता है। शुक्राचार्य पृथुके पुरोहित हुए। बालखिल्य
ऋषिगण मन्त्री हुए। देवताओ तथा इन्द्रके साथ विष्णुने पृथुका अभिषेक
किया। पृथुने प्रजाका रञ्जन किया और इसलिये वे राजा कहे गये—
तमब्रुवँस्तत्र देवास्ते ते चैव परमर्षयः।
नियतो यत्र धर्मो वै तमशङ्कः समाचर॥
प्रियाप्रिये परित्यज्य समः सर्वेषु जन्तुषु।
कामं क्रोधं च लोभं च मानं चोत्सृज्य दूरतः॥
यश्च धर्मात् प्रविचेलेल्लोके कश्चन मानवः।
निग्राह्यस्ते स्वबाहुभ्यां शश्वद् धर्ममवेक्षता॥
प्रतिज्ञां चाविरोहेस्व मनसा कर्मणा गिरा।
पालयिष्याम्यहं भौमं ब्रह्म इत्येव चासकृत्॥
यश्चात्र धर्मो नित्योक्तो दण्डनीतिव्यपाश्रयः।
नमशङ्कः करिष्यामि स्ववशो न कदाचन॥
अदण्ड्या मे द्विजाश्चेति प्रतिजानीहि हे विभो।
लोकं च सङ्करान् कृत्स्नं त्रातास्मीति परंतप॥

महाभारतमें सामाजिक अनुबन्ध ७१
पृथुरुवाच—
ब्राह्मणा मे महाभागा नमस्या पुरुषर्षभाः ।
पुरोधाश्चाभवत् तस्य शुक्रो ब्रह्ममयो निधिः ॥
स विष्णुना च देवेन शक्रेण विबुधैः सह ।
ऋषिभिश्च प्रजापालैः ब्राह्मणैश्चाभिषेचितः ।
रञ्जिताश्च प्रजाः सर्वास्तेन राजेति शब्द्यते ॥
(महा० शां० प० ५९ । १०३-११०, ११६, १२५)
कुछ लोग सत्ययुगके धर्मराज्यको लॉक या रूसोके प्राकृतिक युगसे तुलना
करते हैं और कहते हैं कि 'उस समय राज्यकी परिपाटीका ज्ञान लोगोंको नहीं
था । उस समयके मनुष्य राजनीतिक जीवनसे अनभिज्ञ थे ।' परंतु यह सर्वथा
असंगत है । वस्तुतः भीष्मद्वारा वर्णित कृतयुगके राज्य-विहीन प्रजाका वर्णन
अविवेक एवं अज्ञानमूलक न होकर धर्मज्ञानोत्कर्षमूलक था । रूसो एवं मार्क्स
जिस स्वर्णयुगको उन्नतिकी पराकाष्ठा मानते हैं, उनमें भी उत्कृष्ट कोटिकी
यह भीष्मोक्त स्थिति है । वह धर्मराज्य सर्वज्ञता, ब्रह्मनिष्ठताकी आधारभित्तिपर
स्थित था और राजदण्डादिसे मुक्त था, क्योंकि सभी विवेकी थे, वेद उन्हें
कण्ठस्थ थे । उन्हें कोई वस्तु अविदित थी, यह नहीं कहा जा सकता ।
शङ्का हो सकती है कि 'जब वे इतने ज्ञानसम्पन्न थे, तब इतने भीषण
अनाचारी होकर मात्स्यन्यायके शिकार कैसे हो गये ? इस बातका समाधान लॉक
एवं रूसोके मतसे भले न हो सके, किंतु धर्मवादी भीष्मके मतानुसार जीव अनादि
होता है । उसके कर्मकी परम्परा भी अनादि है । उन्हीं कर्मोंके अनुसार सत्त्व,
रज, तममें ह्रास-विकास होता रहता है । कालक्रमसे वैसे कर्मोंके उद्भूत होनेपर
खेद, तम, मोह, प्रतिपत्ति, विनाश, राग, काम, धर्मलोप आदिका विस्तार
हुआ और प्राणी पतित हो गया । आज भी हम देखते हैं कि कोई अच्छा
आदमी भी परिस्थितियो, घटनाओ और कर्मके वश होकर खराब हो जाता
है और कभी खराब आदमी अच्छा हो जाता है । जैसे मार्क्सके स्वर्णयुगकी
कल्पनामें 'राजा—राज्यादि नहीं होते' यह अज्ञतामूलक नहीं, किंतु विज्ञतामूलक
है । उसी तरह भीष्मके कृतयुगका राज्यादिविहीन धर्मराज्य अज्ञतामूलक नहीं
था, किंतु विज्ञतामूलक था । सुतरां लॉकके 'सिविल गवर्नमेंट' पुस्तकमें वर्णित
'ओरिजिनल स्टेट आफ नेचर' और भीष्मके धर्मराज्यमें पर्याप्त अन्तर है ।
हॉब्सके प्राकृतिक युगसे तो इसका महान् भेद है ही । हाँ, हॉब्सके प्राकृतिक
युगका भीष्मके विकृत युगके मात्स्यन्यायसे कथंचित् मेल बैठता है ।
रूसोके प्राकृत युगका मनुष्य भावुक था । विवेकहीन होनेके कारण उसे
सुख-दुःख नहीं होता था । परंतु भीष्मका आदिम पुरुष पूर्ण विवेकी तथा

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सुखी था । भारतीय शास्त्रोंमें कहा गया है कि दो ही ढंगके पुरुष सुखी
रह सकते हैं—एक अत्यन्त विवेकहीन मूढ, दूसरा परम विवेकी तत्त्ववेत्ता । दूसरे
सभी लोग मध्यवर्ती दुःखी ही रहते हैं ।
यश्च मूढतमो लोके यश्च बुद्धेः परंगतः ।
द्वाविमौ सुखमेधेते क्लिश्यत्यन्तरितो जनः ॥
(श्रीमद्भा० ३ । ७ । १७)
रूसोका ‘प्राकृत पुरुष’ पहली कोटिका था, भीष्मका ‘कृतयुगी पुरुष’ दूसरी
कोटिका । लॉक एवं रूसोका ‘प्राकृत स्वर्ण युगसे पतित, समाजके पुरुष’ तथा हाब्सका
‘प्राकृतिक पुरुष’ अपनी सुख-शान्तिके लिये आपसी विचारसे ही राज्यनिर्माण करते
हैं, परंतु भीष्मके ‘धर्मराज्यसे पतित मनुष्य’ ब्रह्माकी शरण जाकर राजनीति शास्त्र प्राप्त
करते हैं और विष्णुसे योग्य शासक प्राप्त करते हैं । फिर उससे समझौता करते
हैं कि वह कभी भी नीतिशास्त्रके नियमोंका उल्लङ्घन नहीं करेगा । रूसोद्वारा कथित
राज्यकी आधारशिला लोगोंकी ‘सामान्येच्छा’ है, किंतु भीष्मके राज्यकी आधारशिला ब्रह्मा-
द्वारा निर्मित ‘विधिशास्त्र’ । इस तरह भीष्मके राज्यका आधार पवित्र एवं श्रेष्ठतम विधि है।
भीष्मके दोनो ही वर्णनोंकी एकवाक्यता करके ही उनकी व्यवस्था
समझी जा सकती है । दोनो वर्णनोंका दो अर्थ मानना सर्वथा असंगत है ।
दोनोकी एकवाक्यतासे यही निष्कर्ष निकलता है कि प्रथम कृतयुगमें वेदादि
शास्त्र तथा तदुक्त ज्ञान-विज्ञानसम्पन्न मनुष्य राजादि विहीन धर्मराज्यमें ही
रहते थे । सब धर्म नियन्त्रित वेदज्ञ तथा धर्म-ब्रह्मज्ञ थे । सब सुखी, शान्त,
सन्तुष्ट एवं विविध वैभवोंसे पूर्ण थे । कालक्रमसे प्राक्तन कर्मानुसार आसुरी
वृत्तियोंका जागरण हुआ । दैवी वृत्तियोंके अभिभव हो जानेसे उनका पतन हुआ
और फिर उस अवस्थासे खिन्न होकर पुनः धर्मनियन्त्रित राज्यकी स्थापनाके
लिये ब्रह्माकी रायमें राजनीति-शास्त्र ग्रहण किया । फिर उसे पूर्णरूपसे कार्यान्वित
करनेके लिये विष्णुसे राज्य प्राप्त किया और उसको तथा अपनेको वचनबद्ध
करके सीमित शर्तोंके साथ सामाजिक समझौता या सोशल-कंट्राक्ट-थ्योरीके
अनुसार धर्म-नियन्त्रित राजाका राज्य स्थापित किया ।
व्यक्तिवाद
यद्यपि सभी सिद्धान्तोंमें व्यक्तिगत स्वतन्त्रताको महत्त्व दिया जाता है, किंतु
व्यक्तिवादमें व्यक्तिको सर्वोच्च स्थान दिया गया है । इस मतमें न्याय एवं
सुरक्षाके अतिरिक्त व्यक्तिकी स्वतन्त्रतामें समाज या राज्यका हस्तक्षेप ही नहीं
होना चाहिये। इसीलिये व्यक्तिवादी राज्यमें व्यक्तिको निजी, सामाजिक तथा आर्थिक
विषयोंमें स्वतन्त्र छोड़ देना चाहिये । इसीको ‘यद्भाव्य-नीति’ कहा जाता है ।
यह पूँजीवादियोंके संघर्षकी देन है । सामन्तशाही प्रतिबन्धोंके मिटाने, स्वतन्त्र