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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

पृष्ठ 71, कुल 866 में से

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पृष्ठ 71

५८ मार्क्सवाद और रामराज्य
रूसोकी प्राकृतिक स्थितिमें 'मनुष्य नेक, सुखी, सीधे, चिन्तारहित, स्वस्थ,
शान्तिप्रिय, एकान्तप्रिय एवं सन्तुष्ट थे । कोई निजी घर न था और न सम्पत्ति ही
थी । विवाह-प्रथा भी नहीं थी और न कुटुम्ब ही था । भूमिके उत्पादनसे ही
भौतिक इच्छाओकी पूर्ति हो जाती थी । पूर्ण समानता, स्वतन्त्रता व्यापक थी। कोई
वस्त्र-समस्या भी न थी।' उसके मतानुसार 'प्राकृतिक युगमें आधुनिक बुराइयाँ नहीं
थीं, परन्तु आधुनिक भलाइयाँ भी न थीं। संक्षेपमें वह एक नेक जगलीकी भाँति
था । प्राकृतिक मनुष्योको न्याय, अन्याय और मृत्युका भी ज्ञान नहीं था । उसमे
बुराई समाजके सम्पर्कसे ही आयी।' उसके मतानुसार 'नैतिकता समाजकी देन है।'
हॉब्सके विचारोंका उसने खण्डन किया था ।
भारतीय आर्ष इतिहासके अनुसार हॉब्स और रूसो दोनोकी ही प्राकृतिक
स्थितिका वर्णन असंगत है; क्योंकि अपने यहाँके मतानुसार सत्त्वगुणके विकासके
समय नैतिकता और सभ्यता थी । सत्त्व-ह्रासके पश्चात् हॉब्सका चित्रण ठीक ही है।
'असमानताका जन्म' पुस्तकमें उसने बताया है कि 'एक मनुष्यने एक भूमिके
टुकडेको घेरा और कहा कि 'यह मेरा है।' उसने अन्य भोले मनुष्योंसे उस टुकड़ेपर
अपना अधिकार स्वीकार करवाया । उसके अनुसार यह मनुष्य ही सभ्यताका
जन्मदाता बना । उसी तरह अन्य मनुष्योने भी धीरे-धीरे भूमिके टुकड़ोंको अपनाया
और दूसरोंसे अपना स्वामित्व स्वीकार करवाया । इस तरह व्यक्तिगत सम्पत्ति
और असमानता ही सभ्यताकी जन्मदात्री है।'
वस्तुतः कई शब्दोंका दुर्भाग्य भी कभी आया करता है । उनका अर्थ
सुन्दर होते हुए भी अधिकांश लोगोद्वारा उनका प्रयोग कभी बुरे अर्थोंमें होने
लगता है । 'सम्प्रदाय' 'साम्राज्य' 'सभ्यता' आदि शब्द इसी ढंगके हैं । इनका
अर्थ बहुत श्रेष्ठ होनेपर भी पाश्चात्त्य देशोंमें इनका बहुत दुरुपयोग हुआ और
इनका 'फिरकापरस्ती' 'शोषण' एवं 'असमानता' आदिमें प्रयोग होने लगा ।
वस्तुतः समष्टि, व्यष्टि, अभ्युदय एवं परम निःश्रेयस, अपवर्गके अनुकूल ज्ञान-क्रिया-
सम्पन्न शिष्ट व्यक्ति या समाज ही सभ्य कहा जाता है । तदनुकूल परम्परा ही
सम्प्रदाय एव उसका व्यवस्थापक ही धर्मनियन्त्रित साम्राज्य था । रामराज्यका
साम्राज्य इसी कोटिका था । तभी केवल मनुष्योंके लिये ही नही किंतु पशु-पक्षीयोंको
भी वहाँ सरल-सस्ता न्याय मिलता था । रूसोके अनुसार 'उसी असमानताकी रक्षाके
लिये पुलिस सरकार आवश्यक हुई । इन सबके द्वारा अमीरोंके अत्याचारोको स्थायी
बननेमें सहायता मिली । समाजके जन्मसे ही दुःख एव दरिद्रताका जन्म हुआ ।
समाज और सभ्यताकी वृद्धिसे गरीबी, भूख, शोषण, हत्या, बीमारीकी वृद्धि हुई ।
रूसोने अपनी 'सामाजिक अनुबन्ध' (सोशल कण्ट्रैक्ट ) पुस्तकमें लिखा है कि
'मनुष्य स्वतन्त्र जन्मा परंतु सभी ओर जंजीरोंसे जकड़ा हुआ ।' उसकी