सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

पृष्ठ 92, कुल 866 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 92

कम-से-कम होनी चाहिये । जैसे व्यक्ति स्वास्थ्य की दृष्टिसे आरोग्य स्थितिको ही चाहता
है, वैसे ही उपयोगिताकी दृष्टिसे स्वच्छता, स्वतन्त्रता चाहता है। अतः सत्ताधारी
उपयोगिताकी दृष्टिसे व्यवस्थापकको कम-से-कम नियम बनाने चाहिये ।' 'बेन्थम' के
अनुसार व्यवस्थापकको नियम निर्माणके पूर्व इसपर विचार करना चाहिये कि
नियमद्वारा जो कार्य रोके जाते हैं, वे समाजके लिये विकार हैं कि नहीं ? उदाहरणार्थ
—चोरी । साथ ही प्रस्तावित नियम विकारात्मक कार्यसे कम विकार है या अधिक ?
जैसे १००० रु० की चोरीके समक्ष तीन मासका कारागार कम विकार है या
ज्यादा ? अतः केवल चोरी आदि रोकनेके लिये ही नियम ठीक है । यह नागरिक-
की स्वतन्त्रतामें सहायक है । समाजके कुछ लोग स्वतन्त्रताका दुरुपयोग करते हैं ।
वे ही आदर्शभूत स्वतन्त्र-परिस्थितिमें बाधक होते हैं । इसलिये राज्यको नियम-
द्वारा उसका नियन्त्रण आवश्यक होता है । अतः राज्य आवश्यक है । परन्तु राज्य-
का संचालन अपरिवर्तनशील तथा नैसर्गिक नियमोंद्वारा होना ठीक है । व्यक्तिके
आर्थिक एवं सामाजिक विषयोंमें हस्तक्षेप करनेसे उपयोगिताकी वृद्धि सम्भव नहीं
होती । प्राकृतिक बहुमूल्य उपयोगिता-वृद्धिके लिये शान्तिस्थापनके क्षेत्रमे ही
राज्यको नियम-निर्माण करना चाहिये । इस विषयमें भी नियम-निर्माण उप-
योगिताके मानदण्डसे ही होना चाहिये ।'
वस्तुतः भारतीय दर्शनके अनुसार केवल लौकिक सुखप्राप्ति एव दुःख-निवृत्ति-
की दृष्टिसे ही कार्य नहीं किया जाता है । नैयायिकोंने दुःख-निवृत्तिको ही अन्तिम
ध्येय बताया है । सुख-प्राप्ति एव उसके रागको दुःख ही बतलाया है और कहा है
कि कुपित फणी ( नाग ) के फणातपत्रकी छायामें विश्रामके तुल्य ही सुखमें
विश्राम है । वेदान्तके अनुसार भी लौकिकप्रिय ( सुख ) अप्रिय (दुःख) से अतीत
होनेसे परम पुरुषार्थस्वरूप अपवर्ग मिलता है । 'नैनं प्रियाप्रिये स्पृशतः' । तत्त्व-
साक्षात्कारकी स्थितिमें प्राणीको प्रिय-अप्रिय दोनों स्पर्श नहीं करते । उसी अभिप्राय-
से बुद्धिमान् संसार छोड़कर निरन्तर तपस्या करते हैं । परोपकारार्थ सब सुख
छोड़कर विविध यातनाओ-दुःखोको सहते हैं । अन्तमे प्राणतक दे देते हैं ।
बहुतसे लोग परार्थको ही स्वार्थ मानते हैं । अतः उन्हे परोपकारमे ही सुख होता
है । इसीलिये भारतीय शास्त्रोंने वास्तविक आत्महित एवं लोकहितको ही राज्यका
ध्येय माना है । हित और सुखमें पर्याप्त अन्तर होता है । परोपकारार्थ कष्ट-सहन
एव तपस्या सुख नही है, परंतु हित है । परदारपरवित्तापहरण सुखकर प्रतीत
होते हुए भी अहित है । कटु औषध सेवन, कठोर पथ्य-पालन, कुपथ्य परिवर्जन
दुःखकर प्रतीत होनेपर भी हित है । ज्वराक्रान्त प्राणीको उष्ण आतप सुखकर
प्रतीत होता है, तक्रादि कुपथ्य रुचिकर प्रतीत होता है, फिर भी वह अहित है ।
स्वतन्त्रता यद्यपि प्राणीमात्रको अभीष्ट है । मनुष्य ही नही किन्तु प्रत्येक प्राणी