मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहै, अन्यथा परिवर्तनका अस्तित्व भी कैसे सिद्ध होगा ? बाह्य वस्तुओंमें मन
एवं मानसिक परिवर्तनोंके होनेपर भी सर्वसाक्षी अपरिवर्तित ही रहता है ।
सच्ची बात तो यह है कि मार्क्सवादियोने भारतीय दर्शनोंकी गम्भीरता ही नहीं
समझी । वे अध्यात्मवादके नामपर बहुत-सी अनर्गल बातें कहते हैं । अध्यात्म-
वादी सामान्य-वृद्धिरूप विकास नहीं मानते, किंतु बादलोंके सङ्घर्षसे या ऋणात्मक,
धनात्मक विद्युत्-धाराओंके सम्पर्कसे एकाएक महान् प्रकाश-जैसा द्रुतगामी
प्रकाशरूप विकास भी मानते हैं । जलका बर्फ बन जाना और वाष्प बन जाना
यह कौन नहीं जानता ? इसे एक अवस्थासे दूसरी अवस्थाकी कुदान कही जाय
या क्रमवर्धन परिमाणात्मक परिवर्तनोंके संग्रहका परिणाम कह लिया जाय अथवा
सीधी भाषामें परिणामविशेष कह ले, कोई विशेष अन्तर नहीं पडना ।
इसी तरह विकासकी गति उत्तरोत्तर अग्रगति, ऊर्ध्वगतिकी ओर अवश्य होती
है, परंतु जिनका इतिहास क्षुद्रतम है, उन्हीं लोगोंके लिये ऐसी अनुभूति होती
है । जिनके यहाँ वर्तमान सृष्टिका ही इतिहास अरबों वर्षोंका है, फिर अनन्त सृष्टि-
संहारोंका इतिहास भी जिनके सामने है, उनके लिये तो चन्द्रमाके ह्रास-विकासके
तुल्य, सूर्यके उदय-अस्तकी तरह दिन रात, जन्म-मरण, समुद्रके ज्वार-भाटा, सोने-
जागने तथा ग्रीष्म, वर्षा, शरद्, हेमन्त, शिशिर, वसन्त ऋतुके परिवर्तनके तुल्य
सृष्टि-प्रलयकी परम्परा चलती है ।
संसारके सबसे प्राचीन ग्रन्थ अपौरुषेय अनादि वेद कहते हैं—
सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत । ( तै० आ० १० । १ । १४ )
‘धाताने यथापूर्व ही सूर्य-चन्द्रका निर्माण किया ।’ महादार्शनिक भगवान्
श्रीकृष्ण गीतामें कहते हैं—
‘भूतग्राम. स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते ।’ ( ८।१९ )
ये वे ही भूतग्राम पुनः उत्पन्न होकर प्रलीन होते हैं । यह प्रपञ्च प्रवृत्ति
निरुद्देश नहीं है । जड प्रकृतिका स्वतन्त्र कोई उद्देश्य नहीं होता । उद्देश्य चेतन-
का ही होता है । अनादि अविद्या काम-कर्मबद्ध जीवोंको भोग एवं अपवर्ग सम्पादन
करना ही प्रकृतिप्रवर्तनका ईश्वरीय उद्देश्य है ।
मार्क्सीय विचार-धाराका आधार इतिहास लघुतम है । जिसमें कुछ
शताब्दियोसे ही मनुष्य ससारकी उत्पत्ति, वर्गसघर्षके इतिहासका प्रारम्भ और
कुछ ही शताब्दियोंमें वर्गसघर्षके इतिहासकी समाप्ति भी हो जाती है । मार्क्सके
मतानुसार कम्युनिष्ट राज्य होते ही वर्ग-सघर्षकी समाप्ति हो जाती है । इस वर्ग-
सघर्षके भी विकासकी उत्तरोत्तर प्रगति क्यो नहीं होती, यह तो वे ही जान सकते
हैं । यदि किसी भी सिद्धान्तके विरोधी कुछ लोग हो सकते हैं और उनकी संख्या