मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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है ? द्वन्द्वमात्रमें ही नहीं, किसी भी दर्शनमे किसी वस्तुको समझने, पहचाननेके
लिये अपेक्षित अङ्गोपाङ्गका ज्ञान सम्पादित किया जाता है । किसी रोगको समझनेके
लिये उसके निदान, आहार-विहार, देश-काल, साक्षात् या परम्परासे प्रभाव
डालनेवाले पदार्थों तथा घटनाओपर विचार किया ही जाता है । इसी प्रकार
सम्बन्धित सभी घटनाओके सम्बन्धमे विचार किया ही जाता है । प्रकृतिकी
अविराम गति और प्राचीनका तिरोभाव, नवीनका आविर्भाव आदि कल्पनाएँ
सांख्योकी ही हैं । इसी आविर्भाव-तिरोभावको निर्माण तथा ध्वंस कहा जा
सकता है । अवश्य ही सांख्यके मतानुसार सत्का ही आविर्भाव-तिरोभाव होता
है, अत्यन्त असत्का नहीं—
नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः । ( गीता २ । १६ )
यह कोई द्वन्द्वमानका नया दृष्टिकोण नहीं है । सभी विचारक किसी भी
घटनामे आविर्भाव-तिरोभावके विचारको आदर देते हैं ।
जिसकी आयति (भविष्य) उत्तम होती है, वही महत्त्वपूर्ण होता है । इसीलिये
द्वितीयाके चन्द्रका वन्दन किया जाता है, क्योकि वह उत्तरोत्तर वर्धमान दशामें
रहता है । आयतिशून्य पूर्णिमाका पूर्ण चन्द्र भी इतना माङ्गलिक नहीं माना जाता,
क्योकि उसके अभ्युदयके दिन समाप्त हो चुके होते हैं, अब उसका उत्तरोत्तर
ह्रास ही होनेवाला है—‘प्रतिपच्चन्द्रमिव प्रजाः’ । फिर भी यह नही कहा जा सकता
कि जो ह्रासको प्राप्त हो रहा है, अब उसका विकास होगा ही नही । देखते ही हैं
कि जिस चन्द्रमाका ह्रास होता है, उसीका पुनः विकास होता है । जिस समुद्रमे भाटा
आता है, उसमें पुनः ज्वार आता है । अनेक बार मनुष्यकी रुग्णता और पुनः
स्वस्थता होती है। माली हालतमे भी बिगाड, सुधार होता रहता है । पृथ्वी
अनेक बार अनुर्वरा हो जाती है, उपज घट जाती है; पुनः उपचारसे उर्वरा
बनायी जाती है ।
मार्क्स तथा लेनिनकी भविष्यवाणी थी कि ‘मजदूरोंद्वारा ही क्रान्ति होगी ।
किसान सामान्य पूँजीवादी भले ही संख्यामें अधिक हो और गरीब भी हों;
तब भी वे कभी वर्धमान, विकासमान नहीं हैं, अतः उनकी कभी उन्नति
होनेवाली नहीं।’ पर चीन और भारतमें ठीक इसके विपरीत हुआ, यहाँ
किसानों, मध्यवर्गों, सामान्य उत्पादन साधनवालों अर्थात् साधारण पूँजीपतियो-
द्वारा ही क्रान्ति हुई । इतना ही नहीं, भारतमें तो शान्तिपूर्ण अहिंसात्मक
आन्दोलनद्वारा पर्याप्त सफलता मिली है, जिसकी मार्क्सवादमे कल्पना भी नही हो
सकती । परिवर्तनसम्बन्धी एजिल्सकी बात अध्यात्मवादीके लिये कोई नवीन वस्तु
नहीं है । हाँ, आत्मा कूटस्थ होनेसे अपरिवर्तनशील है, वह सब परिवर्तनोका द्रष्टा