मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 757, कुल 866 में से
संदर्भ में पढ़ें४४४ मार्क्सवाद और रामराज्य
किसी भी व्याप्तिज्ञानमें अनुकूल तर्क होना आवश्यक है । 'जहाँ-जहाँ
धूम होता है, वहाँ-वहाँ वह्नि होता है' यह व्याप्ति प्रसिद्ध है । परंतु यहाँ भी 'यदि
धूम वह्निव्यभिचरित हो जाय तो क्या हो' इस आक्षेपका समाधान यह है कि 'तब
धूमको वह्निजन्य न होना चाहिये ।' परंतु धूमकी वह्निजन्यता प्रत्यक्ष ही है ।
प्रत्यक्ष विरोध ही तर्ककी अवधि है । अनुकूल तर्कके बिना कतिपय स्थलीय
सहचार दर्शनमात्रसे व्याप्तिका निश्चय नहीं हो सकता, इस तरह उत्पादन-
शक्तियोंका परिवर्तन होनेपर भी विचारों, सिद्धान्तों यथा समाजमे परिवर्तन न हो
तो क्या हानि है ? इसका समाधान आवश्यक है । पर इस सम्बन्धमें मार्क्सवादी कुछ
भी उत्तर नहीं दे पाते । जिस प्रकार भ्रममें पूर्वप्रमाकी हेतुताका प्रश्न उठता
है, अर्थात् पहले सर्पकी प्रमा ( यथार्थ ज्ञान ) होती है, तब सर्पका संस्कार होता
है, तभी अज्ञान, सादृश्य, सस्कार आदिसे रस्सीमें सर्प-भ्रम होता है । अतः कहा
जा सकता है कि आरोप्य प्रमा आरोपका हेतु है । परंतु यहाँ यह प्रश्न होता है कि
आरोप्य प्रमाके बिना ही यदि भ्रम-प्रमा साधारण आरोप्य संस्कारसे ही आरोप हो
तो क्या हानि है ? यहाँ अनुकूल तर्क न होनेसे प्रमा और आरोपका कार्य-कारण-
भाव सिद्ध नहीं होता । इसी प्रकार विचार एवं सिद्धान्तमें परिवर्तन प्रमाणके आधार-
पर होता है । प्रमा किसी भी सम्पत्ति-विपत्ति, अमीरी, गरीबी हालतके परतन्त्र नहीं
होती । पुरुषकी परिस्थिति इच्छा या स्वयं पुरुष प्रमापर प्रभाव नही डाल सकते ।
सहस्रों प्रयत्नोंसे भी प्रमाणजन्य प्रमामें हेर-फेर नहीं हो सकता । प्रमाणकी
उपस्थितिमें प्रमेयकी प्रमिति होती ही है, न कोई प्रमितिको रोक सकता है, न कोई
उसमें रद्दोबदल ही कर सकता है । प्रमाणमूलक विचारों, सिद्धान्तोंमें और तन्निष्ठ
लोगोंके तदनुसारी आचारोंमे कोई हेर-फेर नही हो सकता ।
हाँ, कई प्रकारकी परिस्थितियाँ ऐसी अवश्य होती हैं जिनमें प्राणियोंका शास्त्र-
सम्बन्ध और परम्परा टूट जाती है । तब नये ढंगके अपूर्ण या अर्धपूर्ण विचार
अथवा सिद्धान्त उत्पन्न होते हैं। अकालों, दुष्कालों या युद्धोंके कारण किंवा भौगोलिके
उथल पुथलके कारण अथवा देशान्तर गमनके कारण प्राचीन शिक्षा तथा सदाचार-
परम्पराका सम्बन्ध टूटनेसे फिर विश्रृङ्खलता हो जाती है । जैसे प्राचीन कालके
क्षत्रिय लोग विजयके उद्देश्यसे देशान्तरोंमें गये । वहाँ उनका अपने धर्म, संस्कृति-
के आचार्यों तथा विद्वानोंसे सम्बन्ध टूट गया । फिर उनके आचारोंमें परिवर्तन
हुआ और शिक्षा, विचार तथा सिद्धान्तोंमें परिवर्तन होते होते उनके मूल
स्वरूपमे पर्याप्त परिवर्तन हो गया—
शनकैस्तु क्रियालोपादिमाः क्षत्रियजातयः ।
वृषलत्वं गता लोके ब्राह्मणादर्शनेन च ॥
( मनु० १० । ४३ )
यह कहाँ जा चुका है कि शिक्षा, समागमके अनुसार ही बुद्धि होती
है, तदनुसार ही इच्छा और तदनुसार ही प्रयत्न होता है । प्राणी जैसे लोगोंका
सद्भाव करता है, जैसे लेगोंका सेवन करता है और जैसा बननेकी इच्छा करता