मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 729, कुल 866 में से
संदर्भ में पढ़ें४१६ मार्क्सवाद और रामराज्य
किसानोके शोषक होते हैं । इसीको मात्स्यन्याय कहते हैं । इसीको अन्त करनेके
लिये धर्मनियन्त्रित शासन धर्मराज्य या रामराज्य अपेक्षित होता है । मार्क्सवादी वर्ग-
संघर्ष, वर्गविध्वंसद्वारा समस्याका समाधान चाहते हैं। रामराज्यवादी धर्म, अहिंसा,
सत्य, सामञ्जस्य, समन्वयद्वारा तथा अचिकित्स्य अन्यायीको दण्डद्वारा वर्ग-
विद्वेष रोककर वर्गसद्भाव एव सामञ्जस्यद्वारा समस्याका समाधान चाहता है ।
वर्गके भीतर पुनः नये वर्ग सम्भव होते हैं । एक वर्गमें भी शतशः संघर्ष देखा
जाता है । अतः सद्भाव बिना कभी भी शोषण तथा अशान्तिका अन्त नही हो
सकता । अतः रामराज्यवादीकी धर्म नियन्त्रण अङ्गीकार बिना दूसरी गति नहीं है ।
जैसे शोषक-श्रेणीमें भी एक दूसरेके शोषक होते हैं, वैसे शोषित-श्रेणीके लोग भी
एक दूसरेके शोषक होते हैं । साँपके मुँहमें पड़ा हुआ मेढक शोषित-उत्पीड़ित ही
है, तो भी वह मच्छरोके खानेके लिये जीभ लपलपाता ही है । इस तरह शोषित
ही दूसरोंका शोषक होता है । मालिकका खैरख्वाह बड़ा कर्मचारी एक तरहका
मजदूर ही है । वही दूसरे मजदूरोको वेतन कम देकर कामके घंटोको बढ़ाकर
शोषण करता है । मार्क्सवादी मजदूरोके इस कार्यको अज्ञानमूलक कहकर समाधान
करते हैं । परन्तु कोई भी शोषण वस्तुतः अज्ञानमूलक ही होता है । अपने
स्वार्थके सामने जैसे बड़ा मजदूर समाजका हित भूल जाता है, वैसे ही अपने
स्वार्थके सामने पूँजीपति भी समाजके हितको भूल जाता है । इसी स्वार्थमूलक
अविवेकको मिटानेके लिये ईमानदारी तथा विवेककी आवश्यकता होती है ।
समाजवादी व्यवस्थामें भूमि, सम्पत्ति, उत्पादनके साधन सबपरसे स्वतन्त्रता
समाप्त हो जाती है। सरकारी वस्तु या सहकारिताके आधारपर होनेवाले उत्पादनोमें कोई
व्यक्ति इच्छानुसार उपयोग नहीं कर सकता । किसी अतिथिको भोजन कराना
हो या किसी समय जाड़ेकी रात काटनेके लिये धानकी भूसीकी ही आवश्यकता हो
तो भी अपनी वस्तु-जैसा उसका यथेष्ट विनियोग नहीं किया जा सकता । गेहूँ-
जौके खेतसे दम बाली या बजड़े, जुआर या मक्काके कुछ बाल भी शामिलात
खेतोंसे स्वतन्त्रतापूर्वक नहीं लिये जा सकते । शहरकी अपेक्षा गाँवोंमें यही
विशेषता है । वहाँ हर वस्तुके लिये दामकी अपेक्षा नहीं रहती । किसान स्वतन्त्रता-
पूर्वक वस्तु तैयार करता है । स्वतन्त्रतापूर्वक विनियोग करता है । सर्षप, वास्तुक,
पालक आदिके शाक इच्छानुसार पैदा किये जा सकते हैं । थोड़े ही खेत तथा
थोडी ही सम्पत्तिमें अपने कुटुम्बके उपयोगकी सब वस्तु तैयार कर ली जाती है—
तरुणं सर्षपशाकं नवोदनं पिच्छलानि च दधीनि ।
अल्पव्ययेन सुन्दरि ग्राम्यजनो मिष्टमश्नाति ॥
उसीमेंसे अन्नदान, वस्त्रदान, सुवर्ण-रजतदान, यज्ञ, तीर्थयात्रा सब कुछ
कर लेता है । समाजीकरणमें यह सब कुछ नहीं बन सकता । कुत्तोंको रोटी मिल