मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअपनी बपौती—मिल्कियतपर अधिकार रहेगा । अपने विचारका प्रचार करने,
सगठन, प्रेस-पत्र आदि स्थापित करनेकी सबको छूट होगी, अर्थात् व्यष्टि एव समष्टि
सभीको लौकिक, पारलौकिक अभ्युत्थान एव परम निःश्रेयस प्राप्त करानेकी
सुविधा उपस्थित की जायगी । समष्टि व्यष्टिका उपोद्वलक होगा । व्यष्टि
समष्टिके अविरोधेन आत्मोन्नतिका लिये प्रयत्न करते हुए समष्टि-सेवामें स्वेच्छासे
ही प्रवृत्त होंगे । जैसे कुटुम्बका विश्वासभाजन, ईमानदार, निष्पक्ष, सर्वहितैषी व्यक्ति
गृहपति (घरका पुरखा) होता है, इसी प्रकार मण्डल, राज्य, राष्ट्र एव विश्वका
पालन करनेवाले व्यक्तियो या व्यक्ति-समूहोको भी सबका विश्वासभाजन, निष्पक्ष,
सर्वहितैषी एव ईमानदार होना अनिवार्य होगा । फिर भी यह भूलना न चाहिये
कि परिवार बन जानेपर भी परिवारके सदस्योमें लडाई होती है, ग्राम बन जानेपर
भी ग्रामीणोंमें लडाई होती है, राष्ट्र बननेपर भी राष्ट्रके भीतर सब उपद्रव होते
हैं । रूसमें भी एक दूसरेको हटाकर अधिकारारूढ होनेका प्रयत्न करते ही हैं,
उसी तरह आगे भी यह सघर्ष रहेगा । अतः जबतक अविवेक, अविचार,
अभिमान, अधर्मको रोकनेके लिये सत्य एवं सात्विक अहिंसा, सत्य, अस्तेय,
ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह आदि गुणो तथा शास्त्रो एवं आध्यात्मिक जीव-ब्रह्मादिकी
भावना दृढ न होगी, तबतक कुटुम्बका भी सगठन असम्भव है, विश्व-सगठनकी
बात तो दूर है ।
वस्तुतः इस मार्गसे ही राष्ट्र एवं विश्वका सघटन सम्भव है । रामराज्यका
तो 'वसुधैव कुटुम्बकम्'का सिद्धान्त है ही । किं बहुना, अनन्तकोटि ब्रह्माण्डात्मक
विश्वको ममताका आस्पद बनाकर अभेद-भावना करके उसे आत्मस्वरूप समझना
एक उदात्त उपासना है । फलतः तदनुसार चेष्टा ठीक ही है । समष्टि-अविरोधेन
राष्ट्र, समाज या व्यक्तिका अपने विकासकी स्वाधीनता होनेसे उनपर जिम्मेदारी
होगी, अपनी हानि और लाभकी बाते सोचना, आलस्य-प्रमादका छोडना,
सावधानी-तत्परताके साथ पुरुषार्थके लिये अग्रसर होना सम्भव हो सकेगा ।
तभी विश्वकी उन्नति और शान्ति होगी । तानाशाही-शासन यन्त्रका कल-पुर्जा बन
जानेसे सभी व्यक्ति या देश जड-यन्त्रवत् हो जायेंगे । उनका विकास रुक जायगा ।
समाजवादी कहते हैं कि 'अपने लाभके लिये ही परिश्रम करना, शक्तिसचय
करना, यह मनुष्यकी प्रकृति नहीं है—यह तो एक अभ्यास है, जो मनुष्यकी
परिस्थितियोके अनुसार बन जाती है । प्राचीन कालमे युद्ध होनेपर हारनेवाले
व्यक्तियोको मारकर खा जाते थे । बलवान् कमजोरोंके धन, स्त्रियाँ आदि छीन
लेते थे । स्त्रियोंके लिये राजा लोग चढाई करते थे । उस समय समाजका यही
अभ्यास था, परतु आजका मनुष्य इसे नहीं सहन कर सकता । असभ्य लोगोंमें
आज भी लूटपाट चलती रहती है, परतु आज मनुष्यका स्वभाव बदल गया है ।