मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजानकर दोष मिटाना न्यायसङ्गत है । परंतु मार्क्स पुनरुत्थानका विरोधी है;
उसके मतानुसार दोष मिटाना मुख्य नहीं, किंतु दोषवान्को ही मिटाना ठीक
है । अतएव वह शोषण मिटानेके पक्षमें नहीं है, किंतु शोषकवर्गका ही
मिटाना आवश्यक समझता है । वह वर्गोंका विरोध अमिट मानता है, परंतु
व्यावहारिक बात यह है कि संसारके कल-पुर्जोंमे दोष आते हैं, शरीर एवं मस्तिष्कमे
दोष आते हैं; इसी प्रकार मनुष्यसमूहमे भी दोष आते हैं । दोषोके मिटानेके
विधान भी हैं । चिकित्साशास्त्र दोष ही मिटानेके लिये है । उत्थान-पतन
ससारका स्वभाव है । जिसका उत्थान हुआ, उसका पतन भी हो
सकता है । जिसका पतन हुआ, उसका पुनरुत्थान भी हो सकता है—
'नीचैर्गच्छत्युपरि च दशा चक्रनेमिक्रमेण।' (मेघदूत) चक्रके अरेके समान कभी
नीचे और कभी ऊपर जाना-आना लगा ही रहता है। सूर्य-चन्द्रकी उदयास्तपरम्परा
भी विचारणीय है । शास्त्रीय दृष्टिसे उपजीव्य-विरोध एक मुख्य दोषोमे है, जिसमे
कार्यद्वारा कारणका विरोध उपजीव्य-विरोध समझा जाता है । जैसे पितासे
उत्पन्न पुत्रका पितृ-घातक होना उपजीव्य-विरोध है । उपकारके प्रति कृतज्ञता
मानवताका सर्वप्रथम लक्षण है ।
मार्क्सके अनुसार 'पूँजीवादी सभ्यता एवं संस्कृतिका आधार एकमात्र अर्थवाद
ही होता है । इसके अनुसार पुरानी सभ्यता एवं सम्बन्धोंका अन्त हो जाता है ।
पिता-पुत्र, पत्नी-पति, शिक्षक-शिष्य आदिकोंके परम्परागत सम्बन्ध टूट
जाते हैं, केवल अर्थमूलक ही सबके सम्बन्ध हो जाते हैं । इससे परम्पराके
आड़मे वर्गसंघर्षको छिपनेका अवकाश नहीं होता । वर्गसंघर्ष सीधा और
स्पष्ट हो जाता है, जो कि सर्वहारा क्रान्तिमे अत्यन्त आवश्यक है ।'
वस्तुतः जिसे मार्क्सवादी गुण कहते हैं, विचारकोंकी दृष्टिमे वह दोष है ।
धार्मिक, सांस्कृतिक परम्पराओके नष्ट हो जाने तथा सर्वत्र अर्थकी प्रधानता हो
जानेसे मनुष्य शुद्ध पशु ही बन जायगा । पिता-पुत्रका, पति-पत्नीका सम्बन्ध
धर्ममूलक न होकर अर्थमूलक होना क्या गुण है ? पैसेके लाभकी सम्भावना
न होनेपर पत्नी पतिको छोड़ दे, पुत्र पिताको छोड़ दे, शिष्य गुरुको पैसेके लोभ-
से मार दे—क्या यह सभ्यता भी मानव-सभ्यता कही जा सकती है ? क्षमा,
दया, स्नेह, वात्सल्य, पातिव्रत्य आदि वे पवित्र गुण हैं, जिनके सामने अर्थका
कुछ भी महत्त्व नहीं । पिताके आज्ञानुसार राज्य छोड़कर रामका वनमें जाना,
रामसे परित्यक्ता होनेपर भी सीताका पतिव्रता बनकर रहना, भरतादि भ्राताओंकी
भ्रातृवत्सलता आदिके सामने अर्थवादकी नगण्यता स्पष्ट बतलाती है कि असाधु-
की ही अर्थ-सम्पत्ति इस दानव-युगको ला सकती है । साधु (सत्) पुरुषोंकी
अर्थ-सम्पत्ति तो धर्म, सभ्यता एवं परम्पराकी रक्षाका ही कारण बनती है ।