मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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छोडनेकी आवश्यकता पडेगी और न भूमि पूँजीपतियोंके ही हाथ जायगी ।
विकेन्द्रीकरण सरकारी लक्ष्य होनेपर पूँजी और भूमि सभीके केन्द्रीकरणपर
प्रतिबन्ध रहेगा । सरकारीकरणके यन्त्रमे सबका खात्मा हो जानेके खतरेकी अपेक्षा
सापेक्ष एवं सीमित नियन्त्रण सबको ही सुखकर होगा । रूसका अनुभव प्रामाणिक
नहीं कहा जा सकता । रूसी प्रचारद्वारा भले ही रूस स्वर्ग बन गया हो, परन्तु
वस्तुस्थिति इसके सर्वथा विपरीत है ।
मशीनोके अधिक व्यवहार करनेसे चेतन प्राणी भी स्वय एक जड मशीन बन
जाता है । पराधीनता भी बढती जाती है—'सर्वं परवशं दुःखं सर्वमात्मवशं सुखम्' (मनु)
—पराधीनता ही सब दुःख है, स्वाधीनता ही सब सुख है । मशीनोद्वारा सब कामसे
छुट्टी पाकर मनुष्य शिक्षा आदि प्राप्त करनेमे समय लगायेगा । पर वह भोग-
विलासमे समय न गँवायेगा—यह कौन कह सकता है ? फिर शिक्षा-सस्कृतिके लिये
भी तो कोई मशीन निकाली ही जाती है और तब बेकारी भी और अधिक बढ
सकती है । श्रेणी-चेतना यदि सङ्घर्षके लिये ही अपेक्षित होगी तो कोई भी
बुद्धिमान् सङ्घर्षको हानिकारक ही समझेगा । समझौता, सामञ्जस्य, समन्वय ही
समाजके लिये अपेक्षित है । धर्मनियन्त्रित रामराज्य तो मुख्य रूपसे महायन्त्रोपर
प्रतिबन्ध लगानेके पक्षमे ही है । जबतक इसमे विलम्ब है तबतक अन्य औद्योगिक
विकास एवं खेतीके विकासका संतुलन रखा जायगा ।
सरकारीकरण होनेके पहले किसान अपनी जमीनमे खेती करनेमे स्वतन्त्र
है । मजदूर तो वह तब बनेगा जब सब खेतोका सरकारीकरण हो जायगा ।
इसीलिये भारतका वर्तमान किसान-मण्डल भूमि-सम्बन्धी सरकारी नीतिसे चिन्तित
है । वह सरकारीकरण नीतिका विरोध करनेके लिये प्रस्तुत है । कम्युनिष्टोके तर्क
वस्तुस्थितिके विरुद्ध हैं । किसानोका प्रतिनिधि-संगठन भी कम्युनिज्ममे वास्तविक
नहीं हो पाता; क्योकि वहाँ स्वतन्त्र मत व्यक्त करना, स्वतन्त्र लेख प्रकाश करने
आदिकी किसी प्रकारकी सुविधा नहीं है । कम्युनिष्ट सरकार जैसा चाहती है, वैसे
ही प्रतिनिधि-संगठनका नाटक किसानोको भी करना पडेगा । फिर भी अधिनायकत्व
मजदूरोँका ही होगा, किसानोका नही ।
मार्क्सवादी पूँजीवादके दोषोका वर्णन करते हुए मशीनोपर लाञ्छन लगाते हैं
कि 'मशीनोके कारण ही अनेक प्रकारकी बेकारी फैली, स्वाधीन उद्योग-धंधे
नष्ट हो गये । कारीगरोको मजदूर बना डाला गया', किंतु स्वय कम्युनिष्ट उन
मशीनोका मोह नहीं छोड सकते । समान वितरणके नामपर मशीनोके दोष
छिपानेका प्रयत्न करते हैं, रही-सही स्वाधीनताको समाप्त करके व्यक्तियोको
तानाशाही शासनका नगण्य कल-पुर्जा बना देना चाहते ह ।