सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

पृष्ठ 589, कुल 866 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 589

८३० मार्क्सवाद और रामराज्य
दण्ड ही सब प्रजाका शासक एव रक्षक है। सबके सोनेपर दण्ड ही जागता
है। विद्वानोने दण्डको ही धर्म कहा है। विचारपूर्वक प्रयुक्त हुआ दण्ड प्रजाका
अनुरञ्जन करनेवाला और अविचारित दण्डे प्रजाका विनाशक होता है। यदि
राजा आलस्य छोड़कर दण्डका विधान न करे तो बलवान् प्राणी दुर्बलोंको वैसे-ही
पकाकर खा जायें, जैसे लोग मछलियोको भूनकर खा जाते हैं। कौवा पुरोडाश
खाने लग जाय, कुत्ता हवि चाटने लग जाय—किसी पदार्थपर किसीका स्वत्व न
रहे और छोटे-बड़े तथा बड़े-छोटे हो जायें। सभी वर्ण दूषित हो जायें, मर्यादाएँ
भङ्ग हो जायें और सारे ससारमें उथल-पुथल मच जाय—
दण्डः शास्ति प्रजाः सर्वा दण्ड एवाभिरक्षति।
दण्डः सुप्तेषु जागर्ति दण्डं धर्मं विदुर्बुधाः॥
समीक्ष्य स धृतः सम्यक् सर्वा रञ्जयति प्रजाः।
असमीक्ष्य प्रणीतस्तु विनाशयति सर्वतः॥
यदि न प्रणयेद् राजा दण्डं दण्ड्येष्वतन्द्रितः।
शूले मत्स्यानिवापक्ष्यन् दुर्बलान् बलवत्तराः॥
अद्यात्काकः पुरोडाशं श्वा च लिह्याद् हविस्तथा।
स्वाम्यं च न स्यात् कस्मिंश्चित् प्रवर्तेताधरोत्तरम्॥
दुष्येयुः सर्ववर्णाश्च भिन्द्येरन् सर्वसेतवः।
सर्वलोकप्रकोपश्च भवेद् दण्डस्य विभ्रमात्॥
( मनु ७ । १८-२१; २४ )
राजा दण्डका ठीक-ठीक विधान करनेवाला, सत्यवादी, विचारपूर्वक
काम करनेवाला, बुद्धिमान् धर्म, अर्थ, और कामका ज्ञाता होना चाहिये, ऐसा मनु
आदि धर्मशास्त्रकारोका मत है—
तस्याहुः संप्रणेतारं राजानं सत्यवादिनम्।
समीक्ष्यकारिणं प्राज्ञं धर्मकामार्थकोविदम्॥
( मनु० ७ । २६ )
दण्ड बड़ा तेजस्वी है। अजितेन्द्रिय लोग ठीक-ठीक उसका विधान नही
कर सकते । वह धर्मविचलित राजाको बन्धु-बान्धवोंसहित नष्ट कर देता है ।
तथा दुर्ग, राज्य, स्थावर-जङ्गम जगत्, आकाशचारी देवगण और ऋषिगणको भी
पीड़ित करता है। राजा या शासकको न्यायपूर्वक अपने राज्यकी प्रजाका पालन करना
चाहिये । शत्रुओको उग्र दण्ड देना चाहिये । मित्रोके साथ छल-कपटका व्यवहार
नहीं करना चाहिये । प्रेमीजनो और सज्जनोंके साथ सहिष्णुता रखनी
चाहिये । ऐसा व्यवहार करनेवाला राजा भले ही कोषरहित हो, उसका
यश ऐसा फैलता है, जैसे जलपर तैल-बिन्दु । राजाको चाहिये कि वह
पवित्र विद्वान्, ब्राह्मण एवं वृद्धोंकी नित्य सेवा करे। ऐसा करनेसे राक्षस भी राजाका